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    NCR में हर साल निकलता है 50 हजार टन बैटरी कचरा, CPCB की नई गाइडलाइंस से प्रदूषण पर लगेगी लगाम

    Updated: Thu, 30 Jul 2026 08:06 PM (IST)

    केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने प्रयुक्त बैटरियों के सुरक्षित निपटान के लिए सख्त दिशानिर्देश जारी किए हैं, लेकिन दिल्ली में वैज्ञानिक निस्ता ...और पढ़ें

    केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने प्रयुक्त बैटरियों के सुरक्षित निपटान के लिए सख्त दिशानिर्देश जारी किए हैं। इमेज एआई

    केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने प्रयुक्त बैटरियों के सुरक्षित निपटान के लिए सख्त दिशानिर्देश जारी किए हैं। इमेज एआई

    HighLights

    1. CPCB ने बैटरी निपटान के लिए सख्त दिशानिर्देश जारी किए।

    2. दिल्ली में वैज्ञानिक बैटरी रीसाइक्लिंग सुविधा का अभाव है।

    3. अवैध रीसाइक्लिंग पर नकेल कसने के लिए पंजीकरण अनिवार्य।

    संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) और इलेक्ट्रानिक्स के लगातार बढ़ रहे इस्तेमाल के बीच केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने प्रयुक्त बैटरियों के सुरक्षित निपटान के लिए सख्त दिशानिर्देश जारी कर दिए हैं। नए नियमों के तहत लिथियम-आयन और लेड-एसिड बैटरियों को अनियंत्रित रूप से नष्ट करने के बजाय वैज्ञानिक तकनीकों (जैसे हाइड्रोटेक्नोलाजी) से रीसायकल करना अनिवार्य कर दिया गया है, ताकि लिथियम, कोबाल्ट एवं लेड जैसे कीमती खनिजों को वापस प्राप्त किया जा सके।

    लेकिन इस राष्ट्रीय पहल के बीच जमीनी हकीकत यह है कि राजधानी में प्रयुक्त बैटरियों के वैज्ञानिक निस्तारण की कोई ठोस सुविधा ही मौजूद नहीं है। दिल्ली सरकार की होलंबी कलां में आधुनिक ''ई-वेस्ट इको पार्क'' लगाने की महत्वाकांक्षी योजना भी अभी तक कागजों में ही सिमटी हुई है। नतीजतन, पूरी व्यवस्था प्राइवेट रीसाइक्लरों के भरोसे चल रही है और गाइडलाइंस का सख्ती से पालन हो पाना आसान नहीं लग रहा।

    एनसीआर में हर साल 50 हजार मीट्रिक टन बैटरी कचरा

    कचरे के आंकड़े डराने वाले हैं। अकेले दिल्ली सहित एनसीआर में हर साल अनुमानत: 40,000 से 50,000 टन बैटरी कचरा उत्पन्न होता है। ई-वाहनों की लगातार बढ़ती बिक्री के कारण लिथियम-आयन बैटरी वेस्ट में सालाना 20 से 25 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। ऐसे में दिल्ली में सरकारी स्तर पर कोई प्लांट ना होने से यह भारी-भरकम ई-कचरा अनियंत्रित खतरे का रूप ले रहा है।

    गाइडलाइंस के तहत प्रदूषण रोकने के कड़े कदम

    5,000 टन से अधिक क्षमता वाली रीसाइक्लिंग इकाइयों को एक साल के भीतर स्वचालित मशीनें (आटोमेटेड ब्रेकिंग सिस्टम) लगानी होंगी।

    कारखानों के उत्सर्जन पर काबू पाने के लिए 30 मीटर ऊंची चिमनियां, विशेष एयर फिल्टर और प्रदूषण निरोधी सिस्टम लगाना अनिवार्य किया गया है। नियम तोड़ने पर भारी जुर्माना (पर्यावरण मुआवजा) लगाया जाएगा।

    सीसे के संपर्क में आने वाले श्रमिकों का साल में कम से कम एक बार रक्त जांच होगी। यदि खून में लेड का स्तर तय सीमा (42 माइक्रोग्राम प्रति डेसीलीटर) से अधिक पाया जाता है, तो उन्हें तुरंत गैर-लेड वाले काम में स्थानांतरित कर इलाज देना होगा।

    अवैध रीसाइक्लिंग पर नकेल और नागरिकों को लाभ

    दिल्ली का मायापुरी, सीलमपुर एवं मुरादाबाद जैसे इलाके बड़े स्क्रैप हब हैं, जहां पुरानी बैटरियों को अवैध रूप से खोलकर तेजाब या लेड निकाला जाता है। नई गाइडलाइंस के बाद सिर्फ सीपीसीबी के ईपीआर पोर्टल पर पंजीकृत रीसाइक्लर ही काम कर सकेंगे।

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    नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद और गुरुग्राम के औद्योगिक इलाकों में चल रही अवैध इकाइयों से निकलने वाला एसिड मिस्ट व लेड धुआं हवा को जहरीला बना रहा था। नए वायु मानक लागू होने से हवा की गुणवत्ता में सुधार की उम्मीद है।

    पुरानी इनवर्टर या ईवी बैटरियों को कबाड़ में फेंकने के बजाय पंजीकृत संग्रह केंद्रों को देना होगा। इससे नागरिकों को बैटरियों के उचित दाम (ईपीआर सर्टिफिकेट के तहत) मिलेंगे और पर्यावरण का नुकसान भी रुकेगा।

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