भवन चमके, लेकिन पढ़ाई राम भरोसे! शिक्षकों की कमी से हांफ रहे दिल्ली के सरकारी स्कूल
राजधानी के सरकारी स्कूलों में हजारों नियमित शिक्षकों के पद खाली हैं, जिससे लगभग हर चौथा शिक्षक अतिथि है और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर सवाल उठ रहे हैं। ...और पढ़ें

राजधानी के सरकारी स्कूलों में हजारों नियमित शिक्षकों के पद खाली हैं। इमेज एआई
HighLights
दिल्ली के सरकारी स्कूलों में हजारों नियमित शिक्षकों के पद खाली।
लगभग हर चौथा शिक्षक अतिथि, शिक्षा व्यवस्था उन्हीं पर निर्भर।
शिक्षकों पर गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ, विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित।
रीतिका मिश्रा, नई दिल्ली। राजधानी के सरकारी स्कूलों में नए भवन, स्मार्ट क्लास और डिजिटल शिक्षा के दावों के बीच सबसे बड़ी चुनौती अब भी शिक्षकों की उपलब्धता बनी हुई है। दैनिक जागरण की राजधानी के विभिन्न जिलों में की गई पड़ताल में सामने आया कि कई विद्यालयों में नियमित शिक्षकों के पद लंबे समय से खाली हैं।
उपलब्ध शिक्षकों पर भी गैर-शैक्षणिक कार्यों का अतिरिक्त बोझ है, जबकि बड़ी संख्या में स्कूल अतिथि शिक्षकों के सहारे संचालित हो रहे हैं। ऐसे में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर परिणाम के सरकारी दावों पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार दिल्ली सरकार के स्कूलों में करीब 44 हजार नियमित शिक्षक कार्यरत हैं। इनमें 28,366 प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक (टीजीटी), 13,106 स्नातकोत्तर शिक्षक (पीजीटी) और 2,957 प्राथमिक शिक्षक (पीआरटी) शामिल हैं। इसके बावजूद व्यवस्था को संभालने के लिए 15,495 अतिथि शिक्षकों की सेवाएं लेनी पड़ रही हैं।
यानी स्कूलों में लगभग हर चौथा शिक्षक अतिथि शिक्षक है। जानकारी के मुताबिक फिलहाल 6,787 नियमित शिक्षकों के पद रिक्त हैं। शिक्षा विभाग के अधिकारियों के मुताबिक सेवानिवृत्ति और नई नियुक्तियों के बीच लंबे अंतराल के कारण यह स्थिति बनी रहती है।
अतिथि शिक्षकों की भूमिका केवल सामान्य कक्षाओं तक सीमित नहीं है। स्कूलों में 1,301 विशेष शिक्षा के अतिथि शिक्षक दिव्यांग विद्यार्थियों को पढ़ा रहे हैं। इसके अलावा 474 अंशकालिक व्यावसायिक शिक्षक व समग्र शिक्षा योजना के तहत 450 से अधिक संविदा शिक्षक भी कार्यरत हैं। शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अतिथि शिक्षकों की सेवाएं हट जाएं तो अनेक विद्यालयों में नियमित कक्षाओं का संचालन प्रभावित हो सकता है।
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दैनिक जागरण की पड़ताल में पश्चिमी दिल्ली के निगम विद्यालयों में शिक्षकों की कमी गंभीर रूप से सामने आई। अधिकारियों के अनुसार केवल पश्चिमी जोन में ही 125 शिक्षकों के पद रिक्त हैं।
विडंबना यह है कि जो शिक्षक उपलब्ध हैं, उन्हें भी जनगणना, विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर), सर्वे और अन्य प्रशासनिक कार्यों में लगाया जाता है। कई विद्यालयों में लिपिकीय कार्य भी शिक्षकों से ही कराए जा रहे हैं। इससे कक्षा शिक्षण का समय प्रभावित होता है और विद्यार्थियों की पढ़ाई पर सीधा असर पड़ता है।
पूर्वी दिल्ली में भी तस्वीर अलग नहीं है। यमुनापार के करीब 60 सरकारी स्कूल शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। यमुना विहार स्थित एक सरकारी विद्यालय में संस्कृत शिक्षक का पद लंबे समय से खाली है। छात्रों का कहना है कि कई बार वैकल्पिक व्यवस्था से पढ़ाई कराई जाती है और पाठ्यक्रम समय पर पूरा नहीं हो पाता।
वहीं गोकलपुरी के सर्वोदय कन्या विद्यालय में हिंदी और संस्कृत दोनों विषयों के शिक्षकों की कमी है। यहां एक शिक्षक को करीब 70 विद्यार्थियों को पढ़ाना पड़ रहा है। अभिभावकों का कहना है कि कई बार दो कक्षाओं को एक साथ पढ़ाया जाता है।
दक्षिणी दिल्ली के तुगलकाबाद, मोलड़बंद, संगम विहार, नूर नगर, सराय जुलेना, जैतपुर और बदरपुर के सरकारी विद्यालयों में भी छात्र संख्या के मुकाबले शिक्षक कम हैं। कई कक्षाओं में एक शिक्षक पर 60 से 70 विद्यार्थी हैं। भीड़ कम करने के लिए कुछ विद्यालय दो शिफ्ट में संचालित किए जा रहे हैं।
वहीं, शिक्षकों की कमी के बीच 20 से 25 प्रतिशत स्टाफ की ड्यूटी एसआइआर जैसे गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाए जाने से नियमित पढ़ाई और प्रभावित हो रही है।
बाहरी दिल्ली के जहांगीरपुरी क्षेत्र में निगम के दो आमने-सामने स्थित विद्यालय भी शिक्षक अभाव से जूझ रहे हैं। छात्र संख्या अधिक होने के कारण उपलब्ध शिक्षकों पर अतिरिक्त बोझ है।
स्थानीय अभिभावकों का कहना है कि जब शिक्षकों को चुनाव, सर्वेक्षण या अन्य सरकारी कार्यों में भेज दिया जाता है तो नियमित कक्षाएं बाधित हो जाती हैं। बाहरी दिल्ली के कई ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी विद्यालयों में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है।
शिक्षा विभाग को हर वर्ष बड़ी संख्या में अतिथि शिक्षकों के पुनर्नियोजन के आदेश जारी करने पड़ते हैं। वर्ष 2026-27 के लिए भी गेस्ट टीचरों की पुनर्तैनाती और पुनर्नियोजन की प्रक्रिया शुरू की गई है।
इससे स्पष्ट है कि नियमित भर्ती के प्रयासों के बावजूद व्यवस्था अब भी बड़ी संख्या में अतिथि शिक्षकों पर निर्भर है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि भर्ती प्रक्रिया लंबी होने के कारण सेवानिवृत्ति और नई नियुक्ति के बीच रिक्तियां बनी रहती हैं।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए पर्याप्त और प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता पर जोर देती है। यदि प्रत्येक विद्यालय में विषयवार नियमित शिक्षक उपलब्ध नहीं होंगे और उपलब्ध शिक्षकों को लगातार गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाया जाता रहेगा तो इसका सबसे अधिक नुकसान विद्यार्थियों को होगा।