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    हाई कोर्ट ने दी अल्पसंख्यक स्कूलों को राहत, फीस रेगुलेशन को लेकर दिल्ली सरकार और LG को तलब

    Updated: Fri, 09 Jan 2026 04:23 PM (GMT+05:30)

    दिल्ली हाई कोर्ट ने अल्पसंख्यक स्कूलों की याचिकाओं पर दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल से जवाब मांगा है। ये याचिकाएं निजी स्कूलों में फीस वृद्धि के लिए सरका ...और पढ़ें

    दिल्ली हाई कोर्ट ने अल्पसंख्यक स्कूलों की याचिकाओं पर दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल से जवाब मांगा है। एआई जेनरेटेड सांकेतिक तस्वीर

    दिल्ली हाई कोर्ट ने अल्पसंख्यक स्कूलों की याचिकाओं पर दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल से जवाब मांगा है। एआई जेनरेटेड सांकेतिक तस्वीर

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    जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने शुक्रवार को अलग-अलग अल्पसंख्यक स्कूलों द्वारा दायर याचिकाओं के एक बैच पर दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल (LG) से जवाब मांगा। इन याचिकाओं में एक नोटिफिकेशन को चुनौती दी गई है, जिसमें प्राइवेट स्कूलों में फीस बढ़ाने के लिए सरकारी मंज़ूरी को ज़रूरी बनाया गया है।

    चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की बेंच ने नए कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल को नोटिस जारी किया और सुनवाई मार्च तक के लिए टाल दी। कोर्ट ने याचिकाकर्ता स्कूल मैनेजमेंट को छह हफ़्ते के अंदर अपना जवाब दाखिल करने की भी इजाज़त दी।

    बेंच ने कहा कि स्कूल 10 जनवरी की पिछली डेडलाइन के बजाय 20 जनवरी तक अपने द्वारा ली जाने वाली फीस को रेगुलेट करने के लिए स्कूल-लेवल कमेटियां बना सकते हैं। बेंच ने यह भी कहा कि स्कूल मैनेजमेंट द्वारा प्रस्तावित फीस कमेटी को जमा करने की आखिरी तारीख पहले तय की गई 25 जनवरी के बजाय 5 फरवरी तक बढ़ा दी जाएगी।

    अलग-अलग अल्पसंख्यक स्कूलों द्वारा दायर याचिकाओं में दिल्ली स्कूल एजुकेशन (फीस निर्धारण और विनियमन में पारदर्शिता) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।

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    खास बात यह है कि हाई कोर्ट ने गुरुवार को भी कई प्राइवेट स्कूलों द्वारा नोटिफिकेशन को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।

    अल्पसंख्यक स्कूलों ने तर्क दिया कि यह कानून भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30 का उल्लंघन करता है, जो सभी धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन का मौलिक अधिकार देता है। उन्होंने तर्क दिया कि अल्पसंख्यक स्कूलों को अपनी फीस तय करने का अधिकार है और सरकार केवल यह सुनिश्चित कर सकती है कि ली जाने वाली फीस बहुत ज्यादा न हो।

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    उन्होंने यह भी तर्क दिया कि सरकार से पहले मंज़ूरी लेना गलत है और यह नियम अनुच्छेद 30 का साफ उल्लंघन है। हालांकि, शिक्षा निदेशालय (DoE) की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू ने नए कानून का बचाव करते हुए कहा कि अनुच्छेद 30 की व्याख्या करने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले सरकार द्वारा रेगुलेटरी उपायों की इजाज़त देते हैं।

    याचिका में दिल्ली स्कूल एजुकेशन (फीस निर्धारण और विनियमन में पारदर्शिता) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। दिल्ली शिक्षा निदेशालय (DoE) द्वारा 24 दिसंबर, 2025 को जारी एक आदेश को भी चुनौती दी गई थी। आदेश में प्राइवेट बिना सरकारी मदद वाले स्कूलों को 10 जनवरी, 2026 तक एक स्कूल लेवल फीस रेगुलेशन कमेटी (SLFRC) बनाने का निर्देश दिया गया था।

    इस कमेटी में एक चेयरपर्सन, प्रिंसिपल, पांच माता-पिता, तीन टीचर और DoE का एक प्रतिनिधि शामिल होना ज़रूरी था। स्कूलों की तरफ से पेश हुए सीनियर वकील मुकुल रोहतगी ने तर्क दिया कि उन्होंने नए कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। रोहतगी ने दलील दी कि इस आदेश पर रोक लगाई जानी चाहिए क्योंकि यह एक्ट के खिलाफ है और इसलिए गैर-कानूनी है।

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