विचाराधीन कैदियों की रिहाई पर SC के दिशानिर्देशों का हो पालन, एक सुनवाई के दौरान दिल्ली HC का निर्देश
दिल्ली हाई कोर्ट ने धोखाधड़ी के एक मामले में जमानत देते हुए महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने सभी जिला अदालतों, जेल अधिकारियों और डीएलएसए को सुप्री ...और पढ़ें

दिल्ली हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करने का आदेश दिया। फोटो: सांकेतिक
HighLights
हाई कोर्ट ने विचाराधीन कैदियों की रिहाई पर दिए निर्देश
अधिकतम सजा का एक-तिहाई समय काटने वालों को रिहा करें
पुलिस जांच पर सवाल उठाए, सह-आरोपी की गिरफ्तारी पर हैरानी
विनीत त्रिपाठी, नई दिल्ली। धोखाधड़ी के मामले में एक आरोपित को जमानत पर रिहा करने का आदेश देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने लंबे समय से जेल में कैदियों के संबंध में अहम निर्देश पारित किया।
न्यायमूर्ति गिरीश कथपालिया की पीठ ने दिल्ली के सभी जिला कोर्ट, जेल अधिकारियों और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को निर्देश दिया है कि वे पहली बार अपराध करने वाले उन लोगों को रिहा करने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सख्ती से पालन करें, जिन्होंने जेल में अपनी अधिकतम सजा का एक-तिहाई से ज्यादा समय काट लिया है।
आरोपित ऋषभ गहलोत की याचिका काे स्वीकार करते हुए अदालत ने इस तथ्य पर संज्ञान लिया कि अधिकतम सजा की अवधि का एक-तिहाई या कई बार उससे भी ज्यादा समय काटने के बाद भी आरोपित जेलों में तब भी बंद हैं।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का सख्ती से हो पालन
अदालत ने कहा कि अधिकारियों को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएनएस) की धारा 479 के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना चाहिए। इसके तहत लंबे समय से हिरासत में बंद कुछ आरोपितों की सशर्त रिहाई का प्रावधान करती है।
आरोपित ऋषभ पर एक महिला और उसकी बेटी के साथ धोखाधड़ी करने का आरोप है। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि ऋषभ ने कई मौकों पर मां-बेटी पैसे ठगे। आरोपित के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट के 2013 के फैसले में विचाराधीन कैदियों के संबंध में दिए गए निर्देशों के अनुसार उनका मुवक्किल जमानत पाने का हकदार है।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि कोर्ट उन पहली बार अपराध करने वालों को जमानत देंगे, जिन्होंने विचाराधीन कैदी के तौर पर अपनी अधिकतम सजा का एक-तिहाई समय जेल में काट लिया है।
अदालत ने नोट किया कि ऋषभ के खिलाफ अभी तक आरोप तय नहीं किए गए हैं और आगे की जांच अभी भी जारी थी। उक्त तथ्यों व परिस्थितियों को अदालत ने आरोपित ऋषभ को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।
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पुलिस की जांच व स्थिति रिपोर्ट पर अदालत ने उठाया सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने जांच की प्रामाणिकता पर भी सवाल उठाया। अदालत ने नोट किया कि जांच अधिकारी ने एक सह-आरोपित की आपत्तिजनक आडियो रिकार्डिंग को गलत तरीके से ऋषभ पर थोपकर कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश की थी।
पीठ ने कहा कि जांच एजेंसी के आचरण की निंदा की जाती है क्योंकि पुलिस ने एक गुमराह करने वाली स्थिति रिपोर्ट पेश की। कोर्ट ने सह-आरोपित नितिन को गिरफ्तार न किए जाने पर भी हैरानी जताई।
सह-आरोपित पर पीड़ितों को ठगने के लिए सीबीआइ अधिकारी होने का नाटक किया था। अदालत ने कहा कि दिल्ली पुलिस यह नहीं समझा पाई कि पांच आरोपितों में से केवल ऋषभ को ही क्यों गिरफ्तार किया गया।
पीठ ने कहा कि निश्चित तौर पर किसी आरोपित को गिरफ्तार करना है या नहीं, जांच अधिकारी का विशेषाधिकार है। लेकिन इस तरह के मौजूदा तथ्यों को देखते हुए, जांच एजेंसी का ऐसा आचरण कई अनुत्तरित सवाल खड़े करता है।