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    नाबालिग सौतेली बेटियों से दुष्कर्म: दिल्ली हाई कोर्ट ने पिता की 15 साल की सजा बरकरार रखी

    Updated: Mon, 27 Apr 2026 04:56 AM (IST)

    दिल्ली हाई कोर्ट ने नाबालिग सौतेली बेटियों से दुष्कर्म के मामले में पिता की 15 साल की कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि पीड़ित के ...और पढ़ें

    दिल्ली हाई कोर्ट ने सजा बरकरार रखी। फाइल फोटो

    दिल्ली हाई कोर्ट ने सजा बरकरार रखी। फाइल फोटो

    HighLights

    1. दिल्ली हाई कोर्ट ने पिता की 15 साल की सजा बरकरार रखी।

    2. नाबालिग सौतेली बेटियों से दुष्कर्म का गंभीर मामला था।

    3. मां की चुप्पी और फोरेंसिक रिपोर्ट भी अहम सबूत।

    जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। नाबालिग सौतेली बेटियों के साथ दुष्कर्म करने के मामले में पिता को ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी ठहराकर 15 साल की कठोर सजा देने के निर्णय को दिल्ली हाई कोर्ट ने बरकरार रखा है।

    न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव की पीठ ने कहा कि पीड़ित के बयान में छोटी-मोटी कमियों से अभियोजन पक्ष के मामले पर कोई असर नहीं पड़ता।

    मां ने भी अत्याचार को चुपचाप सहन किया

    पीठ ने यह भी कहा कि पीड़ितों की सगी मां ने भी शायद लड़कियों के साथ हो रहे इस अत्याचार को चुपचाप सहन कर लिया, क्योंकि जब उसे आरोपित के गलत कामों के बारे में पता चला, तब भी वह चुप रही और बच्चों को बचाने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए।

    पीठ ने कहा कि ऐसा लगता है कि पीड़िताओं की मा आगे कुआं, पीछे खाई वाली स्थिति में फंसी हुई थी, क्योंकि उसने अपने पहले पति (जो पीड़ितों का सगा पिता भी था) को छोड़ दिया था। वह न सिर्फ आरोपित के साथ रहने लगी थी, बल्कि उससे उसकी एक बेटी भी हुई थी।

    शायद इसी वजह से, आरोपित के साथ-साथ उस पर भी आरोप तय किए गए और मुकदमा चलाया गया, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने महिला को बरी कर दिया था।

    उक्त टिप्पणी के साथ ट्रायल कोर्ट के निर्णय काे चुनौती देने वाली सौतेले पिता की अपील याचिका को खारिज कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को आइपीसी की धारा 376 और पाक्सो अधिनियम की धारा-छह के तहत दोषी ठहराया गया था।

    छोटी-मोटी कमियों से विश्वसनीयता कम नहीं होती

    अदालत ने पीड़िताओं के बयान में विरोधाभास की अपीलकर्ता के तर्क को भी अदालत ने यह कहते हुए ठुकरा दिया कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में, अगर पीड़ित का बयान विश्वसनीय है, तो छोटी-मोटी कमियों से उसकी विश्वसनीयता कम नहीं होती।

    अदालत ने पाया कि पाया कि न सिर्फ पीड़िताओं का बयान भरोसे लायक है, बल्कि मकान मालिक के बयान व फाेरेंसिक रिपोर्ट से इस बात की पुष्टि होती है कि अपीलकर्ता ने ही यह अपराध किया था। पीठ ने कहा कि रिकार्ड पर पेश तथ्यों के अनुसार पीड़ित पिछले लगभग डेढ़ साल से यौन उत्पीड़न का यह भयानक दौर झेल रही थीं।

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