पीएम आवास के पास रहने वालों को कोर्ट का झटका, झुग्गी कैंपों को 15 दिनों के भीतर खाली करने का निर्देश
दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रधानमंत्री आवास के पास रेस कोर्स क्षेत्र में स्थित तीन झुग्गी कैंपों को 15 दिनों के भीतर खाली करने का निर्देश दिया है। ...और पढ़ें

दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रधानमंत्री आवास के पास रेस कोर्स क्षेत्र में स्थित तीन झुग्गी कैंपों को 15 दिनों के भीतर खाली करने का निर्देश दिया है। फाइल फोटो
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। रेस कोर्स इलाके में प्रधानमंत्री के आवास के पास तीन झुग्गी कैंप (भाई राम कैंप, डीआइडी कैंप और मस्जिद कैंप) निवासियों को दिल्ली हाई कोर्ट ने 15 दिनों के भीतर अपने कैंप खाली करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की पीठ ने सोमवार को झुग्गी कैंपों में रहने वाले को निर्देश दिया कि सरकारी अधिकारियों द्वारा दी गई दूसरी जगह पर चले जाएं।
पीठ ने पीएम आवास के पास सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कहा कि अगर झुग्गी कैंप में रहने वाले लोग कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं करते हैं, तो अधिकारियों को कार्रवाई करने की पूरी छूट होगी। पीठ ने कहा कि सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं के कारण निवासियों को दूसरी जगह बसाने का नीतिगत फैसला लिया था और कोर्ट को ऐसे मामलों में दखल देने की बहुत ज्यादा जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।
पीठ ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को पहली बार 29 अक्टूबर 2025 को बेदखली के नोटिस दिए गए थे और तब से काफी समय बीत चुका है। उक्त तथ्यों को देखते हुए अदालत ने याचिकाकर्ताओं को पंद्रह दिनों के भीतर अपने मौजूदा कैंप खाली करने का निर्देश दिया।
पीठ ने कहा कि अदालत का मानना है कि मौजूदा जियो-पालिटिकल घटनाओं को देखते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताएं याचिकाकर्ताओं को बेदखल करने के लिए ठोस कारण हैं।
अदालत ने उक्त निर्देश रेस कोर्स स्थित भाई राम कैंप, डीआइडी कैंप और मस्जिद कैंप के 29 निवासियों द्वारा दायर याचिकाओं पर राहत देने से इन्कार कर दिया। कैंप निवासियों ने अपनी बेदखली और बाहरी दिल्ली के सावदा घेवरा में बसाए जाने के फैसले को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि सैकड़ों परिवारों को उनके मौजूदा घरों से इतनी दूर ले जाने का बुरा असर पड़ेगा। वहीं, दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए बेदखली के फैसले का बचाव किया। सरकार ने कहा कि ये कैंप एक आपरेशनल एयर फोर्स स्टेशन के पास मौजूद संवेदनशील सैन्य ठिकानों से सटे हुए हैं।
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सरकार ने तर्क दिया कि नई जगह पर सीवर लाइनें, पानी की सप्लाई, पार्क और सड़कें पहले से ही मौजूद हैं और बाकी जरूरी ढांचागत सुविधाएं भी तैयार की जा रही हैं। अदालत को यह भी बताया गया कि सरकार ने पुनर्वास नियमों के तहत निवासियों द्वारा आमतौर पर दी जाने वाली 1.12 लाख रुपये की लाभार्थी हिस्सेदारी खुद उठाने पर सहमति जताई है और परिवारों को रखरखाव शुल्क चुकाने के लिए तीन महीने का समय दिया गया है।
दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद पीठ ने माना कि आश्रय और आजीविका का अधिकार संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत सुरक्षित है और जीवन के अधिकार से गहराई से जुड़ा हुआ है। हालांकि, पीठ ने कहा कि पुनर्वास नीतियों का अधिकारियों द्वारा पालन करने पर संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं होगा।
साथ ही पीठ ने सरकार को निर्देश दिया कि निवासियों के लिए शिक्षा, यात्रा, पानी और स्वच्छता सुविधाओं आदि को सुरक्षित करना सुनिश्चित करें। पीठ ने कहा कि अभी तक वैकल्पिक आवास के लिए आवंटन पत्र स्वीकार नहीं करने वाले याचिकाकर्ता इसे तुरंत प्राप्त कर लें।
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