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    दिल्ली में वाहनों से होने वाले प्रदूषण से निपटने में सरकार फेल, लोक लेखा समिति ने कमियों को किया उजागर

    Updated: Tue, 24 Mar 2026 06:40 AM (IST)

    दिल्ली विधानसभा की लोक लेखा समिति (पीएसी) ने अपनी रिपोर्ट में राष्ट्रीय राजधानी में वाहनों से होने वाले वायु प्रदूषण से निपटने के सरकारी दावों की पोल ...और पढ़ें

    पीएसी ने दिल्ली में वाहनों से होने वाले प्रदूषण से निपटने के सरकारी दावों की पोल खोली है।

    पीएसी ने दिल्ली में वाहनों से होने वाले प्रदूषण से निपटने के सरकारी दावों की पोल खोली है।

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    संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। दिल्ली विधानसभा की लोक लेखा समिति (पीएसी) ने राष्ट्रीय राजधानी में वाहनों से होने वाले वायु प्रदूषण से निपटने के सरकारी दावों की पोल खोल दी है। सोमवार को सदन में पेश अपनी तीसरी रिपोर्ट में, इस समिति ने प्रदूषण की निगरानी, सार्वजनिक परिवहन की बदहाली और उत्सर्जन मानकों को लागू करने में 'गंभीर प्रणालीगत कमियों' को उजागर किया है।

    यह रिपोर्ट 31 मार्च, 2021 को समाप्त हुए वर्ष के लिए सीएजी (कैग) द्वारा किए गए प्रदर्शन ऑडिट पर आधारित है। पीएसी ने परिवहन और पर्यावरण विभागों को इन खामियों को दूर करने के लिए तत्काल और समयबद्ध सुधारात्मक कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।

    प्रदूषण के आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल

    समिति ने पाया कि दिल्ली में स्थापित कई 'कंटीन्यूअस एम्बिएंट एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग स्टेशन'' (सीएएक्यूएमएस) केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ये स्टेशन सड़कों और पेड़ों के बहुत करीब हैं। इससे इनके द्वारा जुटाए गए आंकड़े और ''एयर क्वालिटी इंडेक्स'' (एक्यूआई) की सटीकता पर गंभीर संदेह पैदा होता है।

    हैरानी की बात यह है कि कई बार जरूरी प्रदूषकों का पूरा डेटा उपलब्ध न होने के बावजूद भी एक्यूआई की गणना की गई। समिति ने नोट किया कि राष्ट्रीय मानकों में शामिल होने के बावजूद किसी भी स्टेशन पर 'लेड' (सीसा) की मात्रा नहीं मापी जा रही थी।

    सार्वजनिक परिवहन का बुरा हाल: 11 हजार की जगह सिर्फ 6,750 बसें

    दिल्ली की परिवहन व्यवस्था पर प्रहार करते हुए पीएसी ने कहा कि शहर को लगभग 11,000 बसों की आवश्यकता है, लेकिन 2021 तक केवल 6,750 बसें ही उपलब्ध थीं। इनमें से भी एक बड़ी संख्या रखरखाव की कमी के कारण सड़कों से बाहर रही। रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में कुल 657 अधिसूचित रूटों में से 238 पर बसें नहीं चल रही थीं, जिससे ''लास्ट माइल कनेक्टिविटी'' की समस्या जस की तस बनी हुई है।

    कागजों पर सिमटी इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) नीति

    समिति ने दिल्ली सरकार की महत्वाकांक्षी ईवी नीति के क्रियान्वयन को भी 'सुस्त और बिखरा हुआ' बताया। आडिट अवधि के दौरान न तो 'ईवी बोर्ड' का गठन हुआ और न ही 'ईवी सेल' सक्रिय हुआ। चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और पार्किंग प्रबंधन में खामियों ने प्रदूषण कम करने की कोशिशों को कमजोर किया है।

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    नियमों की अनदेखी और भ्रष्टाचार के संकेत

    रिपोर्ट में पीयूसी (पीयूसीसी) प्रमाणपत्रों के वितरण में भी अनियमितता पाई गई। कई मामलों में बिना उचित टेस्ट वैल्यू के या मानक से अधिक धुआं छोड़ने वाले वाहनों को भी क्लीन चिट दे दी गई। इसके अलावा, दिल्ली में प्रवेश करने वाले बाहरी वाहनों का कोई ठोस डेटा उपलब्ध नहीं है और पुराने (उम्र पूरी कर चुके) वाहनों को कबाड़ करने की प्रक्रिया भी बेहद धीमी है।

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