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    'पानी की तरह बहा दिए करोड़ों रुपये', दिल्ली में लगाए गए लाखों पेड़ों का PWD के पास नहीं कोई हिसाब

    Updated: Mon, 18 May 2026 02:30 PM (GMT+05:30)

    दिल्ली पीडब्ल्यूडी ने 2019 से सड़कों पर लगाए लाखों पौधों का थर्ड पार्टी ऑडिट नहीं कराया है, जिससे करोड़ों के खर्च और उनकी उत्तरजीविता दर का कोई हिसाब ...और पढ़ें

    दिल्ली में लोक निर्माण विभाग की बड़ी लापरवाही सामने आई है। एआई जनरेटेड

    दिल्ली में लोक निर्माण विभाग की बड़ी लापरवाही सामने आई है। एआई जनरेटेड

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    वी के शुक्ला, नई दिल्ली। दिल्ली की सड़कों को हरा-भरा बनाने के दावे हवा में तैर रहे हैं। लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) की एक बड़ी लापरवाही सामने आई है।

    विभाग ने साल 2019 के बाद से सड़कों के किनारे लगाए गए लाखों पौधों और पेड़ों का कोई थर्ड पार्टी ऑडिट (तीसरे पक्ष से जांच) नहीं कराया है। हरियाली बढ़ाने के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए गए, लेकिन धरातल पर कितने पेड़ जीवित बचे और कितने सूख गए, इसका कोई आधिकारिक डेटा विभाग के पास नहीं है।

    नियमों के मुताबिक, सड़कों पर पौधारोपण के बाद उनकी उत्तरजीविता दर (सरवाइवल रेट) जांचने के लिए स्वतंत्र एजेंसी से ऑडिट कराना अनिवार्य जरूरी होता है। सूत्रों की मानें तो पीडब्ल्यूडी के अधिकारी जानबूझकर इस ऑडिट से बच रहे हैं।

    आशंका जताई जा रही है कि ऑडिट न कराने के पीछे भ्रष्टाचार का बड़ा खेल हो सकता है। बिना ऑडिट के कागजों पर पेड़ों को जिंदा दिखाकर ठेकेदारों को भुगतान किए जाने का अंदेशा है।

    कई लाख पौधे लगाने का दावा किया

    पिछले 5 वर्षों में दिल्ली की प्रमुख सड़कों पर कई लाख पौधे लगाने का दावा किया गया है। लेकिन जब जमीनी हकीकत और जीवित पेड़ों की संख्या के बारे में पूछा जाता है, तो विभाग के पास कोई पुख्ता जानकारी नहीं होती। बिना ऑडिट के यह आंकलन करना पूरी तरह असंभव है कि जनता की गाढ़ी कमाई का जो पैसा पर्यावरण सुधार के नाम पर खर्च हुआ, उसका क्या नतीजा निकला।

    क्या होता है थर्ड पार्टी ऑडिट का महत्व?

    स्वतंत्र एजेंसी मौके पर जाकर हर एक पेड़ की जियो-टैगिंग और भौतिक सत्यापन होता। यदि पौधे मर जाते हैं, तो ठेकेदार या संबंधित अधिकारी पर जुर्माना लगाया जाता है। ऑडिट रिपोर्ट से पता चलता है कि पौधों को समय पर पानी और खाद मिल रही है या नहीं मिली है।

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    पीडब्ल्यूडी के इस रवैए से दिल्ली के पर्यावरण विशेषज्ञ भी चिंतित हैं। जानकारों का कहना है कि हर साल मानसून और अन्य अभियानों के तहत लाखों पौधे लगाने की घोषणाएं तो होती हैं, लेकिन देखरेख के अभाव में अधिकांश पौधे दम तोड़ देते हैं। ऑडिट न होने से अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत को बढ़ावा मिल रहा है, जिससे सरकारी खजाने को चपत लग रही है।

     

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