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    ज्ञान, संवाद और सृजन का उत्सव विश्व पुस्तक मेला 2026 शुरू, केंद्रीय शिक्षा मंत्री बोले-'किताबें सभ्यताओं की स्मृति'

    Updated: Sat, 10 Jan 2026 10:15 PM (GMT+05:30)

    केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने दिल्ली में विश्व पुस्तक मेले का उद्घाटन किया। उन्होंने पुस्तकों को ज्ञान और सभ्यताओं की स्मृति का वाहक बताय ...और पढ़ें

    नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में शनिवार को शुरू हुए विश्व पुस्तक मेले का उद्घाटन करने के बाद पुस्तकों का अवलोकन करते केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान,आरएसएस के संघ वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार व अन्य। ध्रुव कुमार

    नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में शनिवार को शुरू हुए विश्व पुस्तक मेले का उद्घाटन करने के बाद पुस्तकों का अवलोकन करते केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान,आरएसएस के संघ वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार व अन्य। ध्रुव कुमार

    HighLights

    1. धर्मेंद्र प्रधान ने दिल्ली विश्व पुस्तक मेले का उद्घाटन किया।

    2. 'भारतीय सैन्य इतिहास' थीम, कतर और स्पेन भागीदार।

    3. 'कुडोपाली की गाथा' का 13 भाषाओं में अनुवाद विमोचित।

    राज्य ब्यूरो, नई दिल्ली। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को भगवद्गीता का उल्लेख करते हुए कहा, 'ज्ञान से अधिक पवित्र इस संसार में कुछ भी नहीं है।' उन्होंने कहा कि पुस्तकें पीढ़ियों को जोड़ने वाली कड़ी हैं, जो सभ्यताओं की स्मृति को संजोती हैं और समाज को दिशा देती हैं। इस दिशा में विश्व पुस्तक मेला भारत की पठन संस्कृति का सबसे बड़ा लोक उत्सव है, जहां लेखक, प्रकाशक और पाठक एक साझा मंच पर संवाद करते हैं।

    'मात्र पुस्तक मेला नहीं यह विचारों का संगम है'

    भारत मंडपम में मेले का उद्घाटन करते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने कहा, यह आयोजन केवल पुस्तकों का मेला नहीं है, बल्कि विचारों का संगम, संवादों का उत्सव और सृजनशीलता का जीवंत मंच है। पिछले 53 वर्षों से निरंतर आयोजित हो रहा यह मेला आज विश्व प्रकाशन जगत का एक प्रतिष्ठित और विश्वसनीय मंच बन चुका है।

    पुस्तक मेले की थीम ‘भारतीय सैन्य इतिहास : शौर्य एवं प्रज्ञा@75’ तथा कतर और स्पेन जैसे देशों की भागीदारी का उल्लेख करते हुए शिक्षा मंत्री ने इसे सांस्कृतिक और साहित्यिक आयोजन के महत्व को और बढ़ाने वाला कहा।

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    विश्व पुस्तक मेले के थीम पवेलियन में कारगिल युद्ध में जीत के बाद झंडा फहराते सैनिकों को देखते बच्चें। ध्रुव कुमार

    स्पेन के संस्कृति मंत्री भी रहे मौजूद

    इस अवसर पर स्पेन के संस्कृति मंत्री अर्नेस्ट उर्तासुन डोमेनेक, कतर के संस्कृति मंत्री अब्दुल रहमान बिन हमद बिन जासिम बिन हमद अल थानी, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के अध्यक्ष प्रो. मिलिंद सुधाकर मराठे और निदेशक कर्नल युवराज मलिक सहित अन्य अतिथि भी उपस्थित रहे।

    शिक्षा मंत्री ने कतर और स्पेन के संस्कृति मंत्रियों के साथ ‘भारतीय सैन्य इतिहास: शौर्य एवं प्रज्ञा@75’ (हाल संख्या पांच) थीम पवेलियन तथा सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती और ‘वंदे मातरम्’ पर आधारित दो विशेष प्रदर्शनियों का भी उद्घाटन किया।

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    साथ ही, अंतरराष्ट्रीय पवेलियन, अतिथि देश पवेलियन (कतर), फोकस देश पवेलियन (स्पेन) और बाल मंडपम का भी भ्रमण किया।

    ‘कुडोपाली की गाथा’ का 13 भाषाओं में विमोचन

    केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने स्वतंत्रता संग्राम के अनसुने अध्यायों और संबलपुर की धरती पर हुए संघर्ष पर आधारित पुस्तक 'कुडोपाली की गाथा: 1857 की अनसुनी कहानी' के अनुवाद का भी विमोचन किया गया। यह पुस्तक बंगाली, असमिया, पंजाबी, मराठी, मलयालम, उर्दू सहित नौ भारतीय भाषाओं तथा एक अंतरराष्ट्रीय भाषा (स्पेनिश) में जारी की गई।

    इससे पूर्व यह कृति हिंदी, अंग्रेज़ी और ओड़िया में प्रकाशित हो चुकी थी। अब यह पुस्तक कुल 13 भाषाओं में उपलब्ध है। यह प्रयास वीर सुरेंद्र साईं और कुडोपाली के शहीदों की स्मृति को सम्मानित करने के साथ भारत की बहुभाषी और वैश्विक संवाद परंपरा को सुदृढ़ करता है।

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    विश्व पुस्तक मेले में प्रदर्शित भारतीय संविधान की प्रति देखती युवतियां। जागरण

    क्या था संबलपुर के कुडोपली का विद्रोह?

    संबलपुर के कुडोपली में हुआ यह विद्रोह क्षणिक प्रतिरोध नहीं था, बल्कि एक गुरिल्ला आंदोलन था, जो पीढ़ियों तक चला और सामूहिक स्मृति, स्थानीय नेतृत्व तथा असाधारण विद्रोही चेतना से प्रेरित रहा। दमन, गिरफ्तारियों और निर्वासन के बावजूद यह आंदोलन 1827 से 1862 तक औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध सबसे लंबे सशस्त्र विद्रोह के रूप में जारी रहा।

    पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले इस दुर्लभ प्रतिरोध का उदाहरण प्रस्तुत करती ‘द सागा ऑफ कुडोपली: अनसंग स्टोरी ऑफ 1857’ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन भूले-बिसरे नायकों को सामने लाती है, जिनकी कहानियां समय के साथ ओझल हो गई थीं।

    गुमनाम नायकों को पुन: स्मरण करने और उनका सम्मान करने का यह प्रयास प्रधानमंत्री के उस दृष्टिकोण के अनुरूप है, जिसमें भारत के अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों और उनकी स्थायी विरासत को पहचान और सम्मान देने पर बल दिया गया है।

    पहली बार प्रवेश नि:शुल्क

    10-18 जनवरी तक आयोजित हो रहे इस पुस्तक मेले में पहली बार सभी के लिए प्रवेश निःशुल्क रखा गया है। मेले में 35 से अधिक देशों के 1,000 से अधिक प्रकाशक भाग ले रहे हैं, 600 से अधिक कार्यक्रमों में, 1,000 से अधिक वक्ता शामिल हैं तथा 20 लाख से अधिक आगंतुकों के आने की अपेक्षा है।

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