World Book Fair 2026: डिजिटल दौर में युवाओं को भा रहा किताबों का संसार, मेले में बिता रहे घंटों समय
प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में युवा पीढ़ी किताबों के प्रति विशेष रुचि दिखा रही है। डिजिटल युग के बावजूद, वे भारतीय संविधान की प्रतियों ...और पढ़ें

लेखक शिव शंकर झा।
HighLights
युवा पीढ़ी भारतीय संविधान की प्रतियों में गहरी रुचि ले रही है।
प्रेम बिहारी नारायण रायजादा की लिखावट युवाओं को आकर्षित कर रही है।
मेले में प्रश्नोत्तरी और योग साहित्य भी लोकप्रिय हो रहे हैं।
शशि ठाकुर, नई दिल्ली। कहते हैं कि शब्द जब संस्कृति का लिबास पहनते हैं, तो दूरियां खुद-ब-खुद सिमट जाती हैं। भारत विविधताओं का देश है। ऐसे में भले ही बोलियां अलग हों और सोच के क्षितिज जुदा हो, लेकिन किताबों के पन्नों पर आकर यह तमाम मतभेद समाप्त हो जाते हैं। इसका जीवंत नजारा स्थानीय प्रगति मैदान में आयोजित पुस्तक मेले के हॉल नंबर दो में देखने को मिला। यहां आधुनिकता के दौर में भी पन्नों की खुशबू, अक्षरों का जादू के साथ भारतीय संविधान की प्रतियों को भी संजो कर रखा गया है।
मेले में रखी भारतीय संविधान की किताब महज एक दस्तावेज नहीं बल्कि युवाओं के लिए ज्ञान और श्रद्धा का विषय बना हुआ है। संविधान की प्रतियों पर प्रेम बिहारी नारायण रायजादा के हाथों की जादुई लिखावट और उनके द्वारा सुसज्जित किए गए इस ग्रंथ की बारीकियों को समझने के लिए युवा घंटों समय बिता रहे हैं। विशेषकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थी न केवल इसके अनुच्छेदों को निहार के साथ देश की लोकतांत्रिक जड़ों को भी जानने का प्रयास कर रहे हैं।
पुस्तक मेले के पहले दिन युवाओं के जोश को देखते हुए यहां विशेष प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जा रहा है। जिसमें भारतीय संविधान और इतिहास से संबंधित प्रश्न पूछे जा रहे है। इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर भविष्य के प्रशासक अपनी बौद्धिक क्षमता की धार भी परख रहे हैं। इसके अलावा मेले में स्वास्थ्य के प्रति सजग युवा पीढ़ी स्टालों पर योग की बारीकियों और साहित्य के दर्शन को खंगालती नजर आई।
लेखक शिव शंकर झा की हिंदी रोमेंटिक थ्रिलर किताब बह्म- पत्र पाठकों के बीच लोकप्रिय हो रही है, ये किताब प्रेम, स्मृतियों और रहस्य को एक साथ पिरोती है। इसकी पृष्ठभूमि में भारतीय परिवेश की गहरी और भावनात्मक छटा उभरकर आती है।
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जब पाठक बने रचनाकार
इस बार के मेले में खुला मंच भी बना हुआ है। इस मंच पर किसी मंचीय कवि की औपचारिकता नहीं बल्कि हाथ में किताबों का थैला थामे आम पाठक ही अपनी भावनाओं को शब्दों के जरिए बयां कर रहे हैं। कोई गजल की शायरियों से फिजां में इश्क घोल रहा है तो कोई कविता के जरिए सरकारी व्यवस्था पर चोट कर रहा है।