नकली दवाओं से 'मौत' का कारोबार, दिल्ली में फैक्ट्री से मरीज तक फैला सिंडिकेट; एजेंसियों की छापामारी में बड़े खुलासे
दिल्ली सहित देश में नकली दवाओं का कारोबार एक संगठित सिंडिकेट के रूप में काम कर रहा है, जो निर्माण से लेकर मरीज तक पूरी सप्लाई चेन में फैला है। ...और पढ़ें
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दिल्ली में नकली दवाओं का काला कारोबार। एआई जनरेटेड
HighLights
निर्माण से मरीज तक नकली दवाओं का संगठित सिंडिकेट सक्रिय।
क्यूआर कोड के बावजूद नकली दवाओं की पहचान में चुनौतियां।
डिजिटल निगरानी, नियमित निरीक्षण और मरीज जागरूकता ही समाधान।
अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। दिल्ली सहित देश में नकली दवाओं का कारोबार अब बेहद संगठित और बहुस्तरीय हो चुका है। सरकारी एजेंसियों की जांच और हालिया छापामारी से साफ है कि यह नेटवर्क निर्माण से लेकर दुकान और मरीज तक दवा पहुंचने तक कि पूरी सप्लाई चेन में फैला हुआ है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल कानून सख्त करने से समस्या खत्म नहीं होगी। सप्लाई चेन की डिजिटल निगरानी, नियमित निरीक्षण और मरीजों की जागरूकता ही इस पूरे नेटवर्क को तोड़ने की कुंजी है। जब तक अंतिम उपभोक्ता सतर्क नहीं होगा, नकली दवाओं का यह खेल पूरी तरह रुकना मुश्किल है।
ऐसे चलता तंत्र
जांच एजेंसियों के अनुसार नकली दवा के जुड़ा सिंडिकेट तीन चरणों में काम करता है।
पहला चरण : छोटे गोदाम-अवैध यूनिट्स में एक्सपायरी और सस्ती कच्ची दवा सामग्री एकत्र
दूसरा चरण : मैन्युफैक्चरिंग व री-पैकेजिंग, नामी कंपनियों के पैक, होलोग्राम और बारकोड तैयार
-कई मामलों में असली दवाओं की खाली स्ट्रिप और बोतलें भी दोबारा इस्तेमाल होती हैं।
तीसरा चरण : थोक बाजारों, छोटे डीलरों और अस्पताल तक सप्लाई चैन से पहुंचाना
-कुछ मामलों में अधिक मुनाफे के लालच में दवा कारोबार से जुड़े लाइसेंसधारी भी शामिल
क्यूआर कोड के बावजूद पकड़ में नहीं आ रहीं नकली दवा
- सरकार ने ट्रेसबिलिटी के लिए क्यूआर कोड अनिवार्य किया है, लेकिन धरातली हकीकत इससे कहीं अलग है।
- अपराधी फर्जी क्यूआर कोड बनाकर असली जैसी वेबसाइट या डाटा लिंक कर देते हैं।
- देखने में आया है कि कई दुकानदारों और उपभोक्ताओं को स्कैनिंग की आदत नहीं है, जिससे सिस्टम का फायदा नहीं मिल पाता।
- अधिकांशत: सप्लाई चेन में बीच के स्तर पर डाटा अपडेट नहीं होता, जिससे ट्रैकिंग अधूरी रहती
- ग्रामीण और छोटे बाजारों में तकनीकी जांच की सुविधा सीमित है।
कैसे पहचानें नकली दवा
- पैकेजिंग में गड़बड़ी: रंग, प्रिंट या स्पेलिंग में फर्क दिखे तो सतर्क रहें।
- असामान्य छूट: बहुत सस्ती दवा मिलने पर संदेह करें।
- क्यूआर कोड व बैच नंबर: स्कैन कर जानकारी मिलान करें, मिलान होने पर न लें।
- बिल जरूर लें: बिना बिल की दवा खरीदना सबसे बड़ा जोखिम है।
- कोल्ड चेन दवाएं: इंजेक्शन व इंसुलिन सही तापमान में ही मिलनी चाहिए।
पांच वर्ष के आंकड़े
मुख्य ट्रेंड: री-पैकेजिंग, नकली निर्माण और प्रतिबंधित दवाओं की तस्करी
स्रोत: एनसीआरबी ड्रग सीजर डाटा 2025-26 तथा औषधि प्रशासन तथा पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार
- कुल मामले दर्ज: 6,860
- कुल गिरफ्तारियां: 7,895
- एक हजार करोड़ से अधिक बाजार मूल्य की दवा पकड़ी
- 35 लाख से ज्यादा नकली टैबलेट
- 1.20 लाख सिरप की बोतलें
- कैंसर-किडनी जैसी बीमारियों के 45 हजार से अधिक इंजेक्शन जब्त
बड़ी कार्रवाई
- फरवरी-मार्च 2026: सीडीएससीओ ने दिल्ली और उत्तर भारत में छापेमारी कर एमोक्सिसिलिन और लिवर रोगों की नकली टैबलेट पकड़ीं। एक बड़ा बैच बिना किसी लाइसेंस के नामी कंपनियों के नाम पर बनाया जा रहा था।
- जनवरी 2025: दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने आठ करोड़ रुपये की नकली दवा पकड़ी। मास्टरमाइंड एक डाक्टर था, जो एनसीआर के अस्पतालों में सप्लाई।
- दिसंबर 2024: भागीरथ पैलेस से पांच लाख से अधिक की कैंसर, किडनी और लिवर की नकली दवाएं बरामद
- अप्रैल 2024: कैंसर और डायबिटीज की चार करोड़ रुपये की नकली दवा पकड़ी। अपराधी असली जैसे दिखने वाले होलोग्राम की हूबहू नकल कर रहे थे।
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