अतिक्रमण से सिमट रही यमुना, अवैध कॉलोनियों ने बढ़ाया बाढ़ और प्रदूषण का खतरा
यमुना के डूब क्षेत्र में अतिक्रमण एक गंभीर समस्या है, जिसके कारण नदी का क्षेत्रफल और चौड़ाई काफी कम हो गई है। वोट बैंक की राजनीति, प्रशासनिक लापरवाही ...और पढ़ें

यमुना के डूब क्षेत्र में अतिक्रमण एक गंभीर समस्या है, जिसके कारण नदी का क्षेत्रफल और चौड़ाई काफी कम हो गई है।
HighLights
यमुना के डूब क्षेत्र में गंभीर अतिक्रमण, नियमों का उल्लंघन।
नदी का क्षेत्रफल 89% और चौड़ाई 68% तक घटी।
वोट बैंक, लापरवाही से अवैध निर्माण, बाढ़-प्रदूषण का खतरा।
संतोष कुमार सिंह, नई दिल्ली। यमुना का खादर (डूब क्षेत्र) गंभीर अतिक्रमण की समस्या से जूझ रहा है। इसे रोकने के नियम तो बने हुए हैं, परंतु उनका सही ढंग से अनुपालन नहीं हो रहा है। दिल्ली के मास्टर प्लान में यमुना नदी के दोनों किनारों के डूब क्षेत्र को ''ओ-ज़ोन'' नाम दिया गया है, जहां किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य प्रतिबंधित है।
इसके बावजूद प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण नदी के दोनों तटों पर वर्षों से अतिक्रमण का खेल चल रहा है और अवैध रूप से कई कालोनियां बसा दी गई हैं। इस स्थिति पर दिल्ली हाई कोर्ट कई बार नाराज़गी जता चुका है। पर्यावरणविदों का मानना है कि वोट बैंक की राजनीति, प्रशासनिक अक्षमता और प्रभावी कानून के अभाव के कारण दिल्ली सहित पूरे एनसीआर में डूब क्षेत्र में अवैध निर्माण हो रहे हैं।
कई अध्ययनों में भी नदी की भूमि पर अतिक्रमण की समस्या उजागर हुई है। हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय और भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, वर्ष 1799 की तुलना में यमुना का क्षेत्रफल 89 प्रतिशत और पिछले दो सौ वर्षों में इसकी चौड़ाई 68 प्रतिशत तक कम हो गई है।
वर्ष 1799 में दिल्ली में नदी की चौड़ाई 658 मीटर तक थी, जो अब घटकर मात्र 210 मीटर रह गई है। इसके कारण अनुमानित जल-प्रवाह 30 हजार घन मीटर प्रति सेकेंड से घटकर केवल 3900 घन मीटर प्रति सेकेंड रह गया है।
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साउथ एशिया नेटवर्क आन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल (संड्रप) के सहायक समन्वयक बीएस रावत का कहना है कि नदी का प्रवाह बाधित न हो, इसके लिए इसे अतिक्रमण-मुक्त बनाना होगा। इसके विपरीत, नदी के दोनों किनारों पर सरकारी और निजी स्तर पर अतिक्रमण किया जा रहा है।
इस कारण नदी की चौड़ाई कम हो रही है, जिससे मानसून के दिनों में बाढ़ का ख़तरा बढ़ जाता है। साथ ही, अवैध कॉलोनियों के कारण नदी प्रदूषित हो रही है। वर्ष 2010 में नदी का डूब क्षेत्र निर्धारित कर दिया गया था, किंतु उसके बाद भी वहां निर्माण होता रहा और अब उसे बचाने के प्रयास किए जा रहे हैं। यह शहरी नियोजन की बड़ी विफलता है।
अवैध निर्माणों को संरक्षण देने के बजाय ओ-ज़ोन में स्थित कालोनियों के निवासियों को किसी अन्य स्थान पर पुनर्वासित करने के लिए संवाद की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि डीडीए यमुना की भूमि को बचाने में नाकाम साबित हुआ है। उसकी लापरवाही के कारण ही नदी के किनारों पर अतिक्रमण बढ़ता चला गया। डूब क्षेत्र को बचाने के लिए कड़े कानून की कमी भी इस समस्या को बढ़ा रही है।
आवश्यकता कठोर कानून बनाने के साथ-साथ यमुना के डूब क्षेत्र के संरक्षण और इससे जुड़े मामलों की देखरेख के लिए एक स्वतंत्र एवं विशेषज्ञ इकाई का गठन करने की है। वर्तमान में पूरे विश्व में नदियों को उनके प्राकृतिक स्वरूप में सहेजने पर बल दिया जा रहा है, जिस पर हमें भी तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है।