DU Admission: सीयूईटी के बावजूद खाली रहीं सीटें, अदिति और भगिनी कॉलेज में 12वीं की मेरिट से मिलेगा एडमिशन
डीयू ने सीयूईटी के बावजूद खाली सीटों को भरने के लिए अदिति महाविद्यालय और भगिनी निवेदिता कॉलेज को 12वीं के अंकों के आधार पर प्रवेश की विशेष अनुमति दी ह ...और पढ़ें

डीयू को 12वीं के अंकों के आधार पर दो कॉलेजों को दाखिले की अनुमति देनी पड़ी।
HighLights
डीयू ने दो कॉलेजों को 12वीं अंकों से दाखिले की अनुमति दी।
सीयूईटी के बावजूद अदिति, भगिनी निवेदिता कॉलेजों में सीटें खाली।
दूरस्थ स्थान, सुविधाओं की कमी खाली सीटों का मुख्य कारण।
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में सीयूईटी आधारित प्रवेश प्रक्रिया लागू होने के बावजूद कुछ कॉलेजों में सीटें भरना बड़ी चुनौती बन गया है। इसी स्थिति से निपटने के लिए विश्वविद्यालय ने पहली बार अपने दो आफ-कैंपस कॉलेज अदिति महाविद्यालय और भगिनी निवेदिता कॉलेज को 12वीं के अंकों के आधार पर स्नातक पाठ्यक्रमों में प्रवेश देने की विशेष अनुमति दी है।
विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया है कि यह फैसला केवल खाली सीटें भरने के लिए है, न कि प्रवेश नीति में किसी बदलाव का संकेत। डीयू के रजिस्ट्रार विकास गुप्ता के अनुसार, दोनों कॉलेज पिछले कई वर्षों से पर्याप्त दाखिले नहीं जुटा पा रहे हैं। दूरस्थ क्षेत्रों में स्थित होने और बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण बड़ी संख्या में छात्र सीट मिलने के बाद भी प्रवेश नहीं लेते या बाद में दाखिला वापस ले लेते हैं। परिणामस्वरूप हर वर्ष सैकड़ों सीटें रिक्त रह जाती हैं।
-1785907416684.jpg)
पिछले साल खाली रह गई थीं 709 सीटें
पिछले शैक्षणिक सत्र में भगिनी निवेदिता कॉलेज की 985 स्वीकृत सीटों में से 709 सीटें खाली रह गई थीं, जबकि अदिति महाविद्यालय में करीब एक हजार सीटों में से लगभग 600 सीटों पर प्रवेश नहीं हो सका। दोनों कॉलेजों ने विश्वविद्यालय से 12वीं मेरिट के आधार पर प्रवेश की अनुमति मांगी थी।
कॉलेज प्रशासन का कहना है कि छात्रावास, कैफेटेरिया और बेहतर परिवहन जैसी सुविधाओं का अभाव भी छात्रों को इन कॉलेजों से दूर रखता है। खासकर बाहरी राज्यों और दिल्ली के दूरदराज इलाकों के छात्र ऐसे कॉलेजों में दाखिला लेने से बचते हैं। हालांकि, इस फैसले ने नई बहस भी छेड़ दी है।
खबरें और भी
शिक्षक संगठनों का कहना है कि यदि खाली सीटें भरने के लिए 12वीं के अंकों के आधार पर प्रवेश की अनुमति दी जा सकती है, तो अन्य ऐसे कॉलेजों को भी यह सुविधा मिलनी चाहिए जहां हर साल बड़ी संख्या में सीटें खाली रह जाती हैं। उनका कहना है कि यह मामला केवल दो कॉलेजों का नहीं, बल्कि सीयूईटी आधारित प्रवेश व्यवस्था की व्यवहारिक चुनौतियों का भी संकेत है, जिसकी व्यापक समीक्षा की जानी चाहिए।