छात्र बना रहे पराली से ईको-फ्रेंडली प्लेट, खाने के बाद मिट्टी में दबाएं तो उगेंगे टमाटर-सरसों
दिल्ली-NCR में पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज के छात्रों ने 'प्रोजेक्ट वरक' शुरू किया है। इसके त ...और पढ़ें
लोकेश शर्मा, नई दिल्ली। हर साल अक्टूबर से दिसंबर के बीच पराली जलाने की वजह से दिल्ली-NCR में एयर पॉल्यूशन खतरनाक लेवल पर पहुंच जाता है। इस दौरान खासकर बुज़ुर्गों और छोटे बच्चों को सांस लेने में गंभीर दिक्कतें होती हैं, और अस्थमा जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

इस बड़ी समस्या को दूर करने के लिए, दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज के स्टूडेंट्स ने एक अनोखी पहल शुरू की है। "प्रोजेक्ट वरक" के तहत, कॉलेज की सोशल एंटरप्रेन्योरशिप सोसाइटी, इनैक्टस के 15 स्टूडेंट्स खेतों में जलाई गई पराली से इको-फ्रेंडली प्लेट्स और दूसरे प्रोडक्ट्स बना रहे हैं।

इस प्रोजेक्ट की खास बात यह है कि इन प्लेट्स में सब्ज़ियों के बीज भी लगाए जाते हैं। प्लेट्स के अंदर टमाटर और सरसों के बीज रखे जाते हैं। जब लोग खाने के बाद इन प्लेट्स को जमीन में गाड़ देते हैं, तो वे बायोडिग्रेड होकर मिट्टी में मिल जाते हैं, और समय के साथ उनसे पौधे उगने लगते हैं।

यह पहल न केवल पॉल्यूशन कम करने में मदद करती है बल्कि एनवायरनमेंटल कंजर्वेशन और ग्रीन लाइफस्टाइल को भी बढ़ावा देती है। स्टूडेंट्स 2022 से लगातार इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं।
सेकंड ईयर की स्टूडेंट कनिष्क यादव ने बताया कि 'प्रोजेक्ट वरक' का मकसद खेती के कचरे को जलाने की समस्या को कम करना और उसे काम के प्रोडक्ट्स में बदलना है।
इस प्रोजेक्ट के तहत धान की पराली से प्लेट, अंडे की ट्रे और बीज वाले हाथ से बने कागज जैसे प्रोडक्ट्स बनाए जा रहे हैं। इन सभी प्रोडक्ट्स की खास बात यह है कि ये पूरी तरह से बायोडिग्रेडेबल हैं और इस्तेमाल के बाद मिट्टी में नैचुरली घुल जाते हैं।
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कैसे बनती हैं इको-फ्रेंडली प्लेट्स?
प्रोजेक्ट में शामिल स्टूडेंट्स सबसे पहले किसानों से पराली इकट्ठा करते हैं। फिर वे पराली को कूटकर एक खास आकार देते हैं। जब यह मटीरियल तैयार हो जाता है, तो प्लेट्स बनाने का प्रोसेस शुरू होता है। इस काम में लोकल मजदूरों को भी लगाया जाता है। उन्हें घंटे के हिसाब से मज़दूरी दी जाती है। इससे न सिर्फ पराली का सही इस्तेमाल होता है बल्कि लोगों के लिए रोज़गार के मौके भी बनते हैं।
सेकंड ईयर की स्टूडेंट अश्मीत ने बताया कि वे हरियाणा और पंजाब में सीधे किसानों, गांव के मुखियाओं और गांव की पंचायतों से पराली खरीदते हैं। इस पराली को फिर प्रोडक्शन साइट पर लाया जाता है, जहाँ इसका इस्तेमाल इको-फ्रेंडली प्रोडक्ट बनाने के लिए किया जाता है। इस पहल से किसानों को इनकम का एक और ज़रिया मिल रहा है और पराली जलाने की समस्या को कम करने में मदद मिल रही है।
स्टूडेंट्स का कहना है कि 'प्रोजेक्ट वरक' सिर्फ़ एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका मकसद कम्युनिटी डेवलपमेंट और रोज़ी-रोटी बनाना भी है। लोकल लोगों को प्रोडक्शन प्रोसेस में शामिल करके, वे उन्हें स्किल डेवलपमेंट और इनकम के मौके दे रहे हैं। हर महीने दो हज़ार से ज़्यादा प्लेट्स बनाई जाती हैं। स्टूडेंट्स आमतौर पर इन प्लेट्स को गुरुद्वारों में लंगर, भंडारे और कॉर्पोरेट इवेंट्स में सप्लाई करते हैं।
स्टूडेंट्स को उम्मीद है कि अगर इस तरह की पहल को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जाए, तो पराली जलाने की समस्या को काफी कम किया जा सकता है। इसके अलावा, यह मॉडल एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन, वेस्ट मैनेजमेंट और सस्टेनेबल डेवलपमेंट की दिशा में भी एक पॉजिटिव उदाहरण बन सकता है।