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भ्रष्टाचार का दाग धुलने में लग गए 10 साल, दिल्ली HC ने पलटा CBI कोर्ट का फैसला; पूर्व मेजर बरी

Published: Thu, 02 Jul 2026 05:51 PM (IST)

दिल्ली हाई कोर्ट ने पूर्व मेजर जनरल आनंद कुमार कपूर को आय से अधिक संपत्ति मामले में बरी कर दिया ...और पढ़ें

दिल्ली हाई कोर्ट ने पलटा सीबीआई कोर्ट का फैसला। फोटो: आर्काइव

दिल्ली हाई कोर्ट ने पलटा सीबीआई कोर्ट का फैसला। फोटो: आर्काइव

HighLights

  1. दिल्ली हाई कोर्ट ने पूर्व मेजर जनरल आनंद कपूर को बरी किया

  2. आय से अधिक संपत्ति मामले में 10 साल बाद राहत मिली

  3. अदालत ने निष्पक्ष सुनवाई के अभाव को मुख्य आधार माना

विनीत त्रिपाठी, नई दिल्ली। एक सैन्य अधिकारी के सीने पर सजे मेडल उसके साहस, सम्मान और समर्पण की पहचान होते हैं, लेकिन भ्रष्टाचार का एक दाग उन तमाम सम्मानों पर भारी पड़ जाता है और जीवनभर का कलंक बन जाता है। 

सेवानिवृत्त मेजर जनरल आनंद कुमार कपूर के साथ भी ऐसा ही हुआ। 2.2 करोड़ रुपये के आय से अधिक संपत्ति के मामले में दोषी ठहराए जाने के करीब 10 साल बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया है।

न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की पीठ ने सितंबर 2016 में पटियाला हाउस स्थित CBI अदालत के फैसले को रद करते हुए कहा कि निष्पक्ष सुनवाई आपराधिक न्याय व्यवस्था का मूल आधार है।

यदि बचाव पक्ष को अपने साक्ष्य पेश करने का उचित और प्रभावी अवसर नहीं दिया जाता, तो पूरी सुनवाई प्रक्रिया प्रभावित हो जाती है। अदालत ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में दोषसिद्धि का फैसला केवल औपचारिकता के आधार पर नहीं किया जा सकता।

बचाव पक्ष को सिर्फ तीन तारीखें मिलीं

हाई कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष को अपने साक्ष्य पेश करने के लिए करीब छह महीने का समय मिला, जबकि बचाव पक्ष को केवल तीन तारीखें ही दी गईं। बचाव पक्ष के साक्ष्य के लिए तय आखिरी दिन वकीलों की हड़ताल थी।

इसके कारण उनके वकील अदालत में पेश नहीं हो सके। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने सुनवाई स्थगित करने से इनकार कर दिया। अदालत ने इसका कारण सुप्रीम कोर्ट के मुकदमे के जल्द निपटारे के निर्देश को बताया था।

'सिर्फ समय-सीमा पूरी करने पर रहा ट्रायल कोर्ट का ध्यान'

हाई कोर्ट ने कहा कि बचाव पक्ष ने अनिश्चितकाल के लिए स्थगन नहीं मांगा था। उसने केवल वकीलों की हड़ताल के कारण थोड़े समय की मोहलत मांगी थी।

इसके बावजूद CBI अदालत ने केवल तय समय-सीमा के भीतर मुकदमा खत्म करने पर ध्यान दिया और यह नहीं देखा कि अतिरिक्त अवसर न देने से बचाव पक्ष को नुकसान होगा।

अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार सबसे महत्वपूर्ण है। केवल प्रक्रियागत समय-सीमा के आधार पर किसी व्यक्ति के इस अधिकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

संपत्तियों के आकलन में अटकलों पर भरोसा किया गया

मामले से जुड़ी संपत्तियों की दोबारा समीक्षा करते हुए हाई कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने कई मामलों में कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्यों के बजाय अटकलों और धारणाओं के आधार पर निष्कर्ष निकाले।

अदालत ने कहा कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं था, जिससे यह साबित हो कि आनंद कुमार कपूर ने रजिस्टर्ड सेल डीड में दर्ज कीमत से अधिक रकम का भुगतान किया था।

सजा और संपत्ति जब्ती का आदेश रद

इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा और संपत्ति जब्त करने के आदेश को रद करते हुए आनंद कुमार कपूर को बरी कर दिया।

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