गुलामी से गणतंत्र तक: हिंसा, बहस और उम्मीदों के बीच जन्मा भारतीय संविधान; बनी न्याय, सम्मान और स्वतंत्रता की गारंटी
भारत की स्वतंत्रता के बाद, विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा के बीच, संविधान सभा ने एक नया संविधान तैयार किया। 26 जनवरी 1950 को लागू हुए इस दस्तावेज़ ने बिख ...और पढ़ें

2 साल, 11 महीने और 18 दिन तक चली मैराथन वाली बहसों के बाद रचा गया है भारत का महान संविधान।

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
नीरज तिवारी, नई दिल्ली। भारत के संविधान निर्माण की यह कहानी उस समय की है जब भारत गुलामी की जंजीरों को तोड़कर एक नई सुबह की ओर बढ़ चुका था, लेकिन यह राह कांटों भरी थी। 15 अगस्त 1947 को जब देश स्वतंत्र हुआ तो खुशियों के साथ-साथ विभाजन का गहरा घाव भी मिला। उत्तर और पूर्वी भारत में सांप्रदायिक दंगों का 'वीभत्स नृत्य' चल रहा था। करोड़ों शरणार्थी अपनी जड़ों से उखड़कर सीमा पार कर रहे थे। इसी उथल-पुथल के बीच दिल्ली के कांस्टीट्यूशन हॉल में कुछ महान भारतीय एक ऐसा दस्तावेज तैयार करने में जुटे थे जो बिखरते हुए भारत को एक सूत्र में पिरो सके। वही कहलाया 'भारत का संविधान', जिसे 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया। उस दिन को भारत के इतिहास में गणतंत्र दिवस के रूप में स्वर्णिम अक्षरों से संजोया गया। आज उसी गणतंत्र दिवस की 77वीं वर्षगांठ का उत्सव पूरे देश में मनाया जा रहा है।
14 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि में संविधान सभा को संबोधित करते प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू। सबकी उम्मीदों का भारत
हर वर्ग की उम्मीदों का प्रस्ताव और सपनों के भारत के निर्माण की कहानी की शुरुआत 13 दिसंबर 1946 को होती है, जब भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा के सामने ऐतिहासिक 'उद्देश्य प्रस्ताव' प्रस्तुत किया। उन्होंने एक ऐसे 'स्वतंत्र संप्रभु गणराज्य' की कल्पना की जहां हर नागरिक को न्याय, समानता और स्वतंत्रता की गारंटी मिले। नेहरू ने सभा को संबोधित करते हुए जोर देकर कहा कि भारत केवल पश्चिमी लोकतंत्र की नकल नहीं करेगा, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था बनाएगा जो 'दिल्ली से सुदूर रह रहे किसी आम भारतीय के स्वतंत्र जीवनशैली के अनुरूप' हो। हालांकि, सर्वसम्मति का मार्ग असहमतियों से भरा था।

बहस और संघर्ष की आवाजें
संविधान सभा के भीतर का माहौल बाहर की हिंसा से अछूता नहीं था। संविधान सभा की बैठकों के दौरान भी अगस्त 1946 में तत्कालीन कलकत्ता से शुरू हुई ‘बर्बर हिंसा के भयानक स्वरूप’ और सांप्रदायिक नरसंहार का दंश संविधान सभा में शामिल सदस्यों को सताता रहा। सभा में 300 सदस्य थे, जिनमें डॉ. बीआर अंबेडकर, सरदार पटेल और राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं की भूमिका महत्वपूर्ण थी। इस सभा में 15 महिला सदस्या भी थीं। संविधान निर्माण की चर्चा के दौरान कई तीखे सवाल उठे। इन सवालों पर कई-कई दिनों तक तर्क–वितर्क होते रहे। हरद मसौदे पर लंबी बहसें होती रहीं। अंत में सबकी सहमति के बाद जो निष्कर्ष निकलता उसे संविधान में सम्मिलित कर लिया जाता। उन ज्वलंत विषयों को भी संक्षेप में जानना जरूरी है, जो निम्नवत हैं…
- विभाजन का जहर: जब अलग निर्वाचन मंडल (Separate Electorates) की मांग उठी विभाजन को याद कर सभा में शामिल राष्ट्रवादी नेता भड़क गए। उन्हें निरंतर गृहयुद्ध, दंगों और हिंसा की आशंका दिखाई देती थी। सरदार पटेल ने कहा था कि पृथक निर्वाचिका एक ऐसा 'विष है जो हम्मरे देश की पूरी राजनीति में समा चुका है।' उनकी राय में यह एक ऐसी मांग थी जिसने एक समुदाय को दूसरे समुदाय से भिड़ा दिया, राष्ट्र के टुकड़े कर दिए, रक्तपात को जन्म दिया और देश के विभाजन का कारण बन चुकी थी। पटेल ने कहा, 'क्या तुम इस देश में शांति चाहते हो? अगर चाहते हो तो इसे (पृथक निर्वाचिका को) फौरन छोड़ दो।'
- दबे-कुचलों की पुकार: आदिवासियों के नेता जयपाल सिंह ने कहा कि उनके लोगों का इतिहास 6,000 सालों से शोषण और उपेक्षा का रहा है। वहीं, दलित समुदायों के सदस्यों, जैसे जे. नागप्पा ने स्पष्ट किया कि उनकी पीड़ा का कारण केवल संख्या नहीं, बल्कि समाज के हाशिए पर धकेला जाना और शिक्षा व शासन में हिस्सेदारी न होना है।
- शक्तिशाली केंद्र: विभाजन की हिंसा को देखते हुए अंबेडकर और नेहरू ने एक शक्तिशाली केंद्र की वकालत की, ताकि देश को और टूटने से बचाया जा सके और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत मजबूती से खड़ा हो सके। वहीं, के. संथानम जैसे सदस्यों ने चेतावनी दी कि अत्यधिक केंद्रीकरण से प्रांतों से विद्रोह होगा और केंद्र ‘अपने ही भार से टूट जाएगा’।
- विविध भाषा: संभवत: कोई अन्य मुद्दा ‘उत्तेजना और तनाव’ से इतना भरा नहीं था जितना राष्ट्रीय भाषा का। आरवी धुलेकर ने आक्रामक रूप से हिंदी को संविधान की एकमात्र भाषा बनाने की मांग की, जबकि दक्षिण के प्रतिनिधि जैसे जी. दुर्गाबाई ने भय जताया कि इससे क्षेत्रीय संस्कृतियों का विनाश हो जाएगा। अंततः समझौता हुआ कि देवनागरी लिपि में हिंदी आधिकारिक भाषा होगी, लेकिन आधिकारिक कार्यों के लिए अंग्रेजी का उपयोग 15 वर्ष तक जारी रहेगा। हालांकि, यह अलग बात है कि अंग्रेजी आगे जाकर भारतीय भाषाओं को ही दबाने का प्रयास करने लगी।
- आशा की विरासत: सभा के कुछ सदस्यों जैसे कम्युनिस्ट नेता सोमनाथ लाहिरी को लगता था कि ‘ब्रिटिश साम्राज्यवाद की छाया’ अभी भी सभा पर मंडरा रही है। फिर भी अंतिम दस्तावेज सामूहिक भागीदारी की विजय था। इसने हर वयस्क नागरिक को मताधिकार दिया, जो उस समय के इतिहास में एक क्रांतिकारी कदम था। साथ ही, धर्मनिरपेक्षता को स्थापित किया गया, जिससे राज्य सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करेगा, ऐसा प्रविधान किया गया।

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कितने दिनों में बना भारत का संविधान
संविधान के रूप में एक सम्पूर्ण मसौदे की एक साझा रचना का निर्माण लगभग तीन साल (1946-1949) तक चली लंबी चर्चाओं से हुआ। 2 साल, 11 महीने और 18 दिन तक चली मैराथन वाली बहसों के लिए इस बीच 11 सत्र आयोजित किए गए। 165 दिनों की बैठकों का दौर चला। इस तरह भारत के महान संविधान की रचना हुई।

जब 26 नवंबर 1949 को 284 सदस्यों ने अंतिम रूप से रचित दस्तावेज पर हस्ताक्षर (अंगीकृत) किए, तो संविधान केवल कानूनों का संग्रह नहीं, बल्कि इतिहास की चोटों के लिए ‘मलहम’ माना गया। इस प्रक्रिया में डॉ. अंबेडकर ने प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में असाधारण भूमिका निभाई। उन्होंने सुनिश्चित किया कि संविधान में अस्पृश्यता का उन्मूलन हो और पिछड़ी जातियों को आरक्षण मिले।
संविधान निर्माण का खर्च एवं अन्य जानकारियां
भारतीय संविधान के निर्माण में लगभग 6.3 करोड़ रुपये का खर्च आया था। प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर थे। वहीं, मूल संविधान को अपने करकमलों से लिखा था प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने। उस समय इस कानूनी मसौदे पर 284 सदस्यों ने हस्ताक्षर किए थे। यह भी जानना आवश्यक है कि जब 26 नवंबर 1949 को संविधान को अपनाया गया था, तब इसमें 22 भागों और 8 अनुसूचियों में विभाजित 395 अनुच्छेद थे। वर्तमान तक कई संशोधनों के माध्यम से अनेक अनुच्छेदों को जोड़ा, हटाया या संशोधित भी किया गया। आज इसमें 25 भागों में व्यवस्थित 448 अनुच्छेद, 12 अनुसूचियां और 106 संशोधन (जनवरी 2025 तक) हैं।
मरहम और न्याय
अंतत: वह समय आ ही गया जब स्वतंत्र भारत को उसका संविधान अंगीकार कराया गया। इसी के साथ 26 जनवरी 1950 को दुनिया का सबसे लंबा संविधान भारतीय संविधान अस्तित्व में आया। इस संविधान ने न केवल अतीत और वर्तमान के घावों को भरने का काम किया, बल्कि विभिन्न जातियों और समुदायों में बंटे भारतीयों को एक साझा राजनीतिक प्रयोग में शामिल किया। आज भी यह दस्तावेज भारत के लोकतंत्र की आत्मा बना हुआ है।