भूकंप भी नहीं हिला पाएगा इसकी बुनियाद! दिल्ली में देश का सबसे लंबा स्टील नेटवर्क ब्रिज तैयार
कालिंदी कुंज के पास दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस-वे पर देश का सबसे लंबा 140 मीटर का स्टील 'नेटवर्क आर्क ब्रिज' बनाया गया है।

कालिंदी कुंज के पास दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस-वे पर देश का सबसे लंबा 140 मीटर का स्टील 'नेटवर्क आर्क ब्रिज' बनाया गया है। इमेज एआई
HighLights
कालिंदी कुंज में देश का सबसे लंबा आर्क ब्रिज।
140 मीटर लंबा, 2,396 मीट्रिक टन स्टील का उपयोग।
लैंडफिल सामग्री से टिकाऊ निर्माण, भूकंप प्रतिरोधी।
जागरण संवाददाता, दक्षिणी दिल्ली। डीएनडी महारानी बाग से जैतपुर पुश्ता रोड तक दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस-वे के नौ किलोमीटर में से 7.50 किलोमीटर तक का हिस्सा एलिवेटेड है। इसी पर कालिंदीकुंज के पास आगरा कैनाल पर देश का सबसे लंबा स्टील 'नेटवर्क आर्क ब्रिज' बनाया गया है। इसमें 2,396 मीट्रिक टन स्टील का उपयोग किया गया है।
एनएचएआइ के मुताबिक इसकी लंबाई 140 मीटर है। इससे पहले यह रिकार्ड 132 मीटर लंबाई का था। नेटवर्क आर्क ब्रिज मेट्रो क्रासिंग या नहरों के ऊपर वहां बनाए जाते हैं, जहां बीच में खंभे बनाने की अनुमति नहीं होती। इस ब्रिज को आधुनिक 'टाइड-आर्क' तकनीक का इस्तेमाल करके डिजाइन किया गया है, जिसमें क्रॉस किए हुए हैंगर की व्यवस्था है।
उच्च भार क्षमता, भूकंपीय अनुकूलता और निरीक्षण में आसानी के लिए लैमिनेटेड इलास्टोमेरिक बेयरिंग्स लगाए गए हैं, जो एक्सपेंसन ज्वाइंट को बहु-दिशात्मक गति और वाहनों की सुगम आवाजाही में सुविधाजनक होते हैं। भूकंप के दौरान भी इसकी ढांचागत मजबूती पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
इसमें क्रिस-क्रॉस नेटवर्क पैटर्न में झुके हैंगर केबल्स के साथ स्टील आर्क रिब्स हैं। टाई बीम आर्क के दबाव को संतुलित करते हैं। क्रॉस गर्डर्स और स्ट्रिंगर्स कम्पोजिट डेक स्लैब को सहारा देते हैं। ऊपरी ब्रेसिंग पार्श्व स्थिरता सुनिश्चित करती है। स्टील स्ट्रिंगर्स के ऊपर प्रबलित कंक्रीट स्लैब डाले गए हैं।
इस प्रोजेक्ट में निर्माण के कई नए तरीके भी अपनाए गए हैं, जिनमें सिंचाई नहरों के ऊपर हटाए जा सकने वाले अस्थायी स्टील पाइल सपोर्ट का इस्तेमाल, प्रीकास्ट सेग्मेंटल निर्माण तकनीक, लॉन्चिंग गर्डर, ज्यादा मजबूती वाला ई450 स्टील, ग्रेड 10.9 बोल्ट, हाई-डैम्पिंग रबर बेयरिंग और स्विवेल एक्सपेंशन ज्वाइंट शामिल हैं। साथ ही प्रोजेक्ट में टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल निर्माण तरीकों पर जोर दिया गया है।
ओखला लैंडफिल और गाजीपुर लैंडफिल की बायो-माइनिंग से निकले लगभग दो लाख मीट्रिक टन इनर्ट (बेकार मेटेरियल) का इस्तेमाल सड़क बनाने में किया गया है, जिससे मिट्टी या गिट्टी जैसे प्राकृतिक मेटेरियल पर निर्भरता कम हुई।
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