इंदौर में दूषित पानी ने खोली सिस्टम की परतें, शुद्ध हवा और साफ पानी बने 'लग्जरी'; आखिर कब चेतेंगे जिम्मेदार?
यह लेख बताता है कि भारतीय शहरों में शुद्ध पानी और हवा कैसे विलासिता बन गए हैं, इंदौर की दूषित पानी त्रासदी और दिल्ली के प्रदूषण संकट का हवाला देते हुए ...और पढ़ें

नागरिक अधिकार बनाम धीमा जहर। जागरण

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
मनु त्यागी, नई दिल्ली। बतौर भारतीय नागरिक और इस लोकतांत्रिक देश की जनता के नाते आपके नागरिक अधिकार तो बहुत हैं, वो बात अलग है कि सिस्टम इतना असहाय हो चुका है कि, प्राकृतिक, भौगोलिक और जनसंख्या के असंतुलन की आड़ में सब कृत्रिम/मशीनी मोड़ में आता जा रहा है। आप दो-तीन करोड़ रुपये लगाकर लक्जीरियस घर ले लेंगे, लेकिन आप वहां भी शुद्ध भूजल, गंगाजल पा सकें, इसकी कोई गारंटी नहीं है। आप रहेंगे आरओ के ही भरोसे।
जब ताजा हवा लेनी हो तो घर में आपको एयरप्यूरीफायर भी चाहिए। प्रदूषण ने आपकी जिंदगी 10 प्रतिशत तक तो कम कर ही दी है। शुद्ध भूजल के लिए आप शहर की व्यवस्था, यानी सरकार और प्रबंधन के भरोसे नहीं रह सकते। आपके घर के जरूरी उपकरणों में जैसे पहले फ्रीज, टीवी, कूलर आदि होते थे, अब आरओ, एयरकंडीशनर से लेकर एयरप्यूरीफायर तक, मूलभूत हिस्सा हो गए हैं।
उपकरण बने हर घर की जरूरत
किसी सर्वसुविधा संपन्न ही नहीं, न्यूनतम मध्यम वर्गीय परिवार भी इन तीन उपकरणों के बगैर जीवनयापन की कल्पना से डरता है। डर इसलिए कि बीमारियों से बचना है तो आरओ जरूरी है। वर्ना परिवार के सदस्य इतनी गंभीर बीमारियों से ग्रसित होंगे कि कितना भी अच्छा स्वास्थ्य बीमा करा लें, वो भी जवाब दे जाएगा। शहरों में तपन इतनी अधिक हो गई है कि झुलसाने जैसी गर्मी, बहुत अधिक तापमान नहीं बढ़े तो भी असहनीय लगने लगती है। एसी के बगैर गुजारा मुश्किल होता है।
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कुछ ऐसा ही हाल हवा का हो चुका है। शुद्ध हवा में सांस लेना तो प्रकृति के साथ जीने जैसा अधिकार है, पर जब हवा ही प्रदूषित कर चुके हैं तो कहां से मिल पाएगा ये अधिकार। फिर तो घर के भीतर भी खुदको बचाने के लिए एयरप्यूरीफायर जैसे बाजारी उपकरण पर ही आश्रित रहना होगा। इस सत्य को हम इतना सामान्य मानकर आगे बढ़ रहे हैं कि इस पर समय-समय पर चिंता करने की औपचारिकता होती हैं, फिर वही, कल पर छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं।
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एक घटना ने पूरे देश को जगाया
अभी इस चिंतन की वजह इंदौर ने जगाई है। जिस शहर में एक पखवाड़े पहले तक सब कुछ ठीक चलता दिख रहा था। यह शहर देश के लिए प्रेरणास्रोत बना नजर आता था, वहीं मल-मूत्र मिले दूषित पानी की आपूर्ति घरों तक होने से 20 लोगों की मौत की एक खबर आती है। और न सिर्फ स्वच्छता की मिसाल वाले एक शहर की, बल्कि पूरे प्रदेश की परतें खुलती चली जाती हैं।
भोपाल, उज्जैन, जबलपुर, जहां-जहां पड़ताल हुई, हर जगह की बदहाली ऐसे सामने आई कि मानों अब तक इन शहरों को झूठ के पर्दे से ढककर सिर्फ ‘यहां सब कुछ अच्छा है’ के स्लोगन से सजाकर चलाया जा रहा था। वहीं, इंदौर जिसे स्वच्छ सफाई का सिरमौर कहा जाता है, वहां के भागीरथपुरा से घटे इस घटनाक्रम को महामारी घोषित कर दिया गया। बात यहीं नहीं खत्म हुई, इस एक घटना ने पूरे देश को जगाने का भी काम किया।
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सभी के मन में चेतना जागी कि जब इंदौर का ये हाल है तो हमारे शहर में तो क्या ही होगा। ये डर बहुत बड़ा था और वाजिब भी। क्योंकि सबसे ज्यादा मार तो देश की राजधानी दिल्ली ही झेल रही है। यहां तो जब 1956 में बहुत सीमित आबादी थी, उस दौर में दूषित पानी जनित पीलिया जैसी बीमारी का प्रकोप फैला था और इससे 30 हजार लोग संक्रमित हुए थे और 266 मौतें हुई। और आज तो दिल्ली में पानी राजनीति का विषय तो होता है, शुद्धता की गारंटी नहीं।
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हां, शुद्ध जल का आश्वासन सरकारों के घोषणा पत्र में होता है, पर वो जमीनी हकीकत में इतना ही होता है कि दिल्ली की 40 प्रतिशत पाइपलाइन चार दशक पुरानी और, इतनी जर्जर अवस्था में हैं कि यहां के लोग हर दिन आशंकित रहते हैं कि कहीं सीवर से सटी पाइपलाइन के कारण, जहरीला पानी न आ जाए। स्वाभाविक है आरओ लगवाना ही होगा, लेकिन क्या ये आरओ भी ऐसे पानी को स्वच्छ कर पाएगा। इसके लिए सभी पानी व्यापारी लंबी बहस अपने आश्वासनों पर कर सकते हैं। कोई निष्कर्ष नहीं निकलेगा।
पानी अपना नहीं, शुद्ध है ये भी पता नहीं
इतना ही नहीं देश की राजधानी दिल्ली तो अपनी 90 प्रतिशत आबादी को खुद पेयजल तक मयस्सर नहीं करा पाती। इसके लिए वह दूसरे राज्यों पर ही हमेशा निर्भरता रही है। ऐसा क्यों? ये तो सर्वविदित ही है कि दिल्ली वो अभागी है जिसके पास यमुना जैसी नदी है, उसका एक बड़ा हिस्सा इस शहर से गुजरता है फिर भी उसका पानी उसके भाग्य में नहीं रहा। हां, पूर्व में इतिहास जरूर इसकी स्वर्णिम गाथाएं सुनाता आया है।
दुर्भाग्य ये भी है कि दशकों से दिल्ली की सत्ता में रहीं सरकारें, जो पानी पड़ोसी राज्यों से लेती आ रही हैं उसे भी सहेजकर लोगों के घरों तक नहीं पहुंचा पातीं। वर्षों की अनदेखी से स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि जल उपचार संयंत्रों (डब्ल्यूटीपी) और अन्य स्रोतों से उपलब्ध पेयजल का लगभग 50 प्रतिशत ही लोगों तक पहुंच पाता है। अब आप सोच रहे होंगे बाकी का शेष… जी, ये बाकी का पानी या तो सीवर लाइनों के साथ बिछी जर्जर पाइपलाइनों के साथ बह जाता है या फिर चोरी होकर बिक रहा है।
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दिल्ली में पानी माफिया का जाल किसी से छिपा नहीं है। वही टैंकर माफिया जिन्हें राजनीतिक संरक्षण मिलता है और दिल्ली में पानी की पाइपालाइन बिछाकर पानी की आपूर्ति कराने के बजाय पानी के इस व्यापार को बढ़ावा देते हैं। और टैंकर से पानी लेने के लिए भोर से कतारें लगी होती हैं। पानी को लेकर अगला विश्व युद्ध तब होगा सो होगा, दिल्ली में तो इसको लेकर हत्या की घटनाएं भी हो चुकी हैं।
यहां दूषित पानी की आपूर्ति को लेकर हाई कोर्ट और एनजीटी सैंकड़ों बार गंभीर टिप्पणी कर चुके हैं और नाराजगी जता चुके हैं। कितने ही इलाके, मसलन योजना विहार, आनंद विहार, जनकपुरी आदि यहां के दूषित पानी की आपूर्ति का मामला अदालतों में चल रहा है। सरकार दावा करती है कि 93 प्रतिशत से अधिक घरों में नल से पानी की आपूर्ति होती है।
अब सरकार अपने शहर की सच्चाई से ही अनभिज्ञ है। यहां तो दक्षिणी से बाहरी तक सैंकड़ों अनधिकृत कालोनी, झुग्गी बस्तियों में पानी कनेक्शन तक ही नहीं है। इसी का लाभ उठाकर तो टैंकर माफिया इन्हें चोरी का पानी बेचते हैं।
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बजट चाहिए, बकाया नहीं वसूलेंगे
दिल्ली यूं तो देश की रजाधानी है लेकिन इसके साथ सब कुछ विचित्र ही है। यहां की भौगोलिक स्थिति से बड़ी, यहां की आबादी हो चुकी है। क्षमता से अधिक जनसंख्या 3.38 करोड़ यहां निवास करती है। बताया जाता है कि दिन में तो कामकाजी लोगों को भी मिला लें तो इस आबादी में 10-15 प्रतिशत और वृद्धि हो जाती है। जिस दिल्ली के पास अपना पानी तक नहीं और इतनी क्षमता में आबादी रहती है तो उसके लिए पानी उपलब्ध कराना असंभव ही है।
यही कारण है कि यहां 40 प्रतिशत से अधिक आबादी दूषित जल पर ही आश्रित है। हाल ही में आई भूजल रिपोर्ट सभी को आंकड़ों में चेता तो गई कि यहां के पानी में 12.63 प्रतिशत में यूरेनियम की मात्रा सुरक्षित सीमा से कहीं अधिक है। दिल्ली निवासियों के मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य पर इसके दीर्घकालिक परिणाम बेहद भयावह हो सकते हैं। देश में सर्वाधिक टैक्स भरने वाले शहरों में टाप में दिल्ली है, लेकिन उसी दिल्ली को न तो शुद्ध हवा का अधिकार है न शुद्ध पानी नसीब होता है।
यहां का भूजल स्तर सर्वाधिक तेजी से धरातल की ओर जा रहा है। वर्तमान सरकार ने यमुना के उद्धार के लिए आस तो जगाई है, पर वो भी अभी बहुत दूर की कौड़ी है 2029 तक यानी तीन-चार साल तो सिर्फ इंतजार के हैं। यानी तब तक दूषित पानी के ही भरोसे रहना होगा। वहीं दिल्ली जल बोर्ड वर्तमान में यहां की पाइपलाइन से लेकर दूषित जलापर्ति के संकट को दूर करने के लिए 30 हजार करोड़ की जरूरत बताता है, जिस पर 63 हजार करोड़ रुपये सरकारी विभागों का ही बकाया है।
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इस बकाए में केंद्र के बड़े मंत्रालयों से लेकर सभी सरकारी विभाग हैं। दशकों से चला आ रहा ये बकाया कभी वसूला नहीं जा सका। यहां तक की बोर्ड ने कभी इसको लेकर तगादा करने की जहमत भी नहीं की। हां, अब सुधार के लिए 30 हजार करोड़ मांगे जा रहे हैं। और ये 30 हजार करोड़ कहां से आएंगे जाहिर आम जनता के टैक्स के भुगतान से ही। जहां तक देशभर में अमृत योजना की बात है जिसके तहत पाइपलाइन, सीवेज और ड्रेनेज व्यवस्था पर काम होना था, तो इसके पहले चरण ही राज्यों में अभी हांफ रहे हैं।
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मध्य प्रदेश को ही लें, जहां से इस दूषित जल के संकट की शुरुआत हुई, वहां अब कागजों से हकीकत निकलकर आई कि 50 प्रतिशत तक बजट पूरे राज्य में खर्च ही नहीं हुआ है। चार साल पहले शुरू हुई अमृत 2.0 योजना के तहत न तो जलप्रदाय का काम पूरा हुआ और न ही सीवरेज परियोजनाएं पूरी हो पाई हैं। इस वर्ष अमृत 2.0 की समयावधि समाप्त हो जाएगी लेकिन काम की गति को देखकर नहीं लगता कि इस वर्ष लक्ष्य पूरा किया जा सकेगा। दिल्ली की अमृत योजना का अंदाजा यहां की जर्जर पाइपलाइनें खुद व्यक्त ही कर रही हैं।
इस बार साल भर हो शुद्ध हवा के उपाय
वर्ष 2026 की शुरुआत खुशखबरी लेकर आई कि जीडीपी के मामले में भारत ने जापान जैसे देश को पीछे छोड़ दिया। ये विकसित देश की ओर बढ़ते भारत की मजबूती के पदनिशान हैं। पर जिस तेजी से हम बढ़ रहे हैं, उसी तेजी से नागरिक अधिकार भी धूमिल होते जा रहे हैं। प्रदूषित हवा में घुला धीमा जहर, अब सिर्फ सर्दियों में तीन माह की आपातकाल स्थितियों तक सीमित नहीं रह गया है।
ज्ञात हो कि केंद्र सरकार ने 2019 में पांच साल में वायु प्रदूषण में 20 से 30 फीसद तक की कमी लाने को आश्वस्त किया था। इसके लिए हवा से मोटे और महीन धूल कणों, पीएम 2.5 और पीएम 10 को घटाने के लिए विशेष कार्ययोजना बनाई थी। आज 2026 में यानी छह साल साल बाद भी ये संकट और घातक ही हुआ है। क्योंकि योजना का गंभीरता से क्रियान्वयन नहीं हुआ।
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हां, हम तात्कालिक उपायों के लिए कोर्ट में अर्जी लगाकर एयरप्यूरीफायर पर जीएसटी घटाने की मांग कर रहे हैं। ये बचाव को जरूरी भी है लेकिन देश की आबादी को एयरप्यूरीफायर की जरूरत ही नहीं पड़े वो शुद्ध हवा में सांस लेने के अधिकार को खुलकर जी सकें, वैसे वातावरण की परिकल्पना को ही स्थायी बनाना होगा।
पहले जैसा न हो हाल
लगातार सुप्रीम कोर्ट के दबावों के बाद ही एक बार फिर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग, यानी सीएक्यूएम को वायु प्रदूषण से निपटने के लिए तीन माह नहीं, पूरे सालभर इससे निपटने की कार्ययोजना साझा करनी पड़ी है। पर्यावरण विशेषज्ञ भी लगातार इस ओर चेता रहे थे।
अब भी देखना ये होगा कि पिछले पांच वर्ष के लक्ष्य जैसा हश्र न हो। इस बार योजना जमीन पर सार्थक हो, समय-समय पर इसकी प्रगति की विशेषज्ञ मानीटरिंग शुरुआत से ही की जाए। जवाबदेही तय हो, कार्रवाई सुनिश्चित हो, ताकि शुद्ध हवा, शुद्ध पानी जैसे मूलभूत अधिकार के साथ नागरिक रह सकें।
इस समाचार में उपयोग किए गए क्रिएटिव ग्राफिक्स को NoteBookLM आर्टिफिशिएल इंटेलिजेंस प्रोग्राम की सहायता से बनाया गया है।
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