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    बंगाल की खाड़ी के ऊपर उड़ान में टर्बुलेंस का खतरा क्यों? एविएशन एक्सपर्ट ने बताया- Pilot कैसे करते हैं बचाव

    Updated: Wed, 05 Aug 2026 09:54 PM (IST)

    पायलटों का कहना है कि मौसम की अनिश्चितता के आगे आधुनिक विज्ञान भी कई बार बेबस होता है, इसलिए वे टर्बुलेंस से बचने के लिए विमान को 20-30 डिग्री तक मोड़ ...और पढ़ें

    बंगाल की खाड़ी के ऊपर टर्बुलेंस का खतरा बना रहता है। फोटो: एआई जनरेटेड

    बंगाल की खाड़ी के ऊपर टर्बुलेंस का खतरा बना रहता है। फोटो: एआई जनरेटेड

    HighLights

    1. पायलट टर्बुलेंस से बचने को विमान 20-30 डिग्री मोड़ते हैं

    2. क्लियर एयर टर्बुलेंस का पता लगाना आधुनिक रडार के लिए मुश्किल

    3. यात्रियों को उड़ान भर सीट बेल्ट बांधने की सलाह

    गौतम कुमार मिश्रा, नई दिल्ली। मौसम की अनिश्चितता और कुदरत के मिजाज के आगे आधुनिक विज्ञान और उन्नत एविऐशन तकनीक भी कई बार बेबस नजर आती है।

    विमानन क्षेत्र में सुरक्षा के तमाम दावों के बावजूद बंगाल की खाड़ी और इसके आसपास का वायुमंडल पायलटों के लिए हमेशा से बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है।

    हवा के घनत्व और तापमान में बदलाव से बनती है टर्बुलेंस

    इस मार्ग पर लंबी उड़ान का अनुभव रखने वाले वरिष्ठ पायलट और वर्तमान में पायलट ट्रेनिंग स्कूल चला रहे कैप्टन सुजीत ओझा के अनुसार, यहां केवल आधुनिक उपकरणों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से टर्बुलेंस का मुख्य कारण ''हवा के घनत्व और तापमान'' में अचानक आया बदलाव होता है।

    कैप्टन सुजीत बताते हैं कि शांत और स्थिर हवा का प्रवाह तब बिगड़ता है जब सूरज की असमान गर्मी, बादलों की भौतिक बाधाएं और अलग-अलग तापमान वाली हवा के द्रव्यमान (एयर मास) आपस में टकराते हैं। इससे हवा की चिकनी परतें टूटने लगती हैं और वे अशांत, भंवरदार चक्रवातों में बदल जाती हैं।

    कम दबाव वाले क्षेत्र में बिगड़ता है संतुलन

    जब विमान अत्यधिक कम दबाव वाले इस क्षेत्र में प्रवेश करता है, तो उसे मिलने वाला ''एयरोडायनामिक लिफ्ट'' प्रभावित होता है और विमान में तीव्र झटके महसूस होते हैं या वह अचानक नीचे गिरता है।

    कैप्टन सुजीत स्पष्ट करते हैं कि आम भाषा में इस्तेमाल होने वाला ''एयर बबल'' जैसा कोई वैज्ञानिक शब्द विमानन में नहीं होता, बल्कि यह वास्तव में हवा का घनत्व घटने का परिणाम होता है।

    टर्बुलेंस के दौरान पायलट कैसे संभालते हैं स्थिति

    इससे बचने के लिए पायलट अक्सर विमान को 20 से 30 डिग्री तक मोड़कर खतरनाक क्षेत्र से बाहर निकलने का प्रयास करते हैं। हालांकि, ऑन-बोर्ड ''डाप्लर वेदर रडार'' बादलों की नमी को तो पहचान लेता है, लेकिन ''क्लियर एयर टर्बुलेंस'' (कैट) को पकड़ने में विफल रहता है।

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    स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब आगे चल रहे किसी बड़े विमान का ''वेक टर्बुलेंस'' पीछे आ रहे विमान से टकरा जाता है। ऐसी स्थिति में पायलट टोपायलट बंद नहीं करते, क्योंकि आधुनिक सिस्टम टर्बुलेंस में भी विमान को स्थिर रख सकता है। अत्यधिक तीव्र टर्बुलेंस होने पर वे ऑटोपायलट मोड बदलते हैं या आवश्यकता पड़ने पर मैन्युअल कंट्रोल संभालते हैं।

    इसके बाद विमान की गति घटाकर ''टर्बुलेंस पेनिट्रेशन स्पीड'' पर लाते हैं ताकि ढांचे पर दबाव कम पड़े। इस दौरान विमान के संतुलन को सीधा रखने पर ध्यान दिया जाता है, एटीसी से सुरक्षित रूट मांगा जाता है और केबिन क्रू व यात्रियों को तत्काल सीट बेल्ट कसने का निर्देश दिया जाता है।

    टर्बुलेंस में सीट बेल्ट ही सबसे बड़ा बचाव

    वहीं, एअर इंडिया में ''केबिन क्रू इंचार्ज'' के रूप में लंबी सेवा देकर सेवानिवृत्त हो चुके सीमा और अनीश मल्होत्रा ने उड़ान के दौरान एयर टर्बुलेंस के अपने प्रत्यक्ष अनुभव साझा किए।

    उन्होंने बताया कि एअर इंडिया की एक उड़ान के दौरान जब विमान अचानक गंभीर टर्बुलेंस में फंसा, तो केबिन के भीतर अफरा-तफरी मच गई। गंभीर टर्बुलेंस से उत्पन्न गुरुत्वाकर्षण बल के कारण केबिन का आंतरिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया।

    यात्रियों को परोसी गई चाय और स्नैक्स की ट्रे अचानक हवा में उछलकर यात्रियों पर ही गिरने लगीं। मल्होत्रा दंपति के अनुसार, उस वक्त सबसे अधिक परेशानी और चोट उन लोगों को आई।

    चेतावनी के बाद नहीं बांधी थी सीट बेल्ट 

    जिन्होंने चेतावनी के बावजूद अपनी सीट बेल्ट नहीं बांधी थी, वे झटके से अपनी सीटों से ऊपर उछल गए। मल्होत्रा दंपति ने सलाह दी कि हवा में ऐसे वैज्ञानिक और भौतिक दबाव के क्षणों में पैनिक होने के बजाय अपनी सीट पर बने रहें।

    सुरक्षा के लिहाज से पूरी उड़ान के दौरान, यहां तक कि ''सीट बेल्ट साइन'' बंद होने पर भी, अपनी सीट बेल्ट को हमेशा ढीला बांधकर रखना ही किसी भी अप्रत्याशित झटके से बचाव का सबसे अचूक उपाय है।

    टर्बुलेंस से बचने का शत प्रतिशत नहीं कोई उपाय

    एविएशन विशेषज्ञ मार्क मार्टिन कहते हैं टर्बुलेंस इसलिए खतरनाक है क्योंकि इससे बचने का शत प्रतिशत उपाय किसी के पास नहीं है। अभी जो स्थिति है उसमें हम टर्बुलेंस को लेकर कोई सटीक पूर्वानुमान नहीं लगा सकते।

    हम नहीं जानते हैं कि विमान कब उड़ान के दौरान टर्बुलेंस की चपेट में आ जाएगा। अच्छी बात यह है कि हमारे पायलट इस स्थिति का अच्छे से मुकाबला करते हैं। आजकल टर्बुलेंस कोई तकनीकी इमरजेंसी भी नहीं मानी जाती है।

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