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    दिल्ली के शाहपुर जट गांव की ऐतिहासिक गलियों में दमक रहा मॉडर्न फैशन, अलाउद्दीन खिलजी के राज से अब तक देखे कई दौर

    Updated: Fri, 29 May 2026 05:07 PM (IST)

    दिल्ली का शाहपुर जट गांव इतिहास और आधुनिक फैशन का अनूठा संगम है। यह कभी ग्रामीण क्षेत्र था जो अब डिजाइन स्टूडियो और बुटीक का केंद्र बन गया है। ...और पढ़ें

    गलियां संकरी हैं, पुराने घर हैं लेकिन इनके भीतर से आधुनिकता, फैशन और चकाचौंध झांकती है। जागरण

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    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    प्रियंका दुबे मेहता, नई दिल्ली। शाहपुर जट गांव अपने नाम के इतर आधुनिकता का पर्याय है। एक ऐसा गांव जहां इतिहास के साथ आधुनिकता कदमताल करती है। कहीं से पुरानी हवेलियों की निशानियां नजर आती हैं तो साथ ही डिजाइनर्स स्टोर्स में फैशन का जलवा बिखरता है।

    हर परिवर्तन को किया स्वीकार

    गलियां संकरी हैं, पुराने घर हैं लेकिन इनके भीतर से आधुनिकता, फैशन और चकाचौंध झांकती है। यहां पर खंडहर हैं, इतिहास के कुछ फटे-बिखरे पन्ने हैं लेकिन फैशन की चमक ने उन हिस्सों को भी रोशन कर दिया है। भले ही गांवों में लोकल कम्यूनिटीज रहती हों लेकिन वह हमेशा बदलाव के लिए तैयार रही हैंउन्होंने परिवर्तन को गले लगाया और यही कारण है कि इस गांव का उत्थान हुआ है। 

    आईआईटी, जेएनयू, एनआईएफटी जैसे शिक्षण संस्थानों की वजह से गांव में संभावनाएं विकसित हुईं, लोगों ने इन संभावनाओं को गले लगाया और फिर गांव के इस रस्टिकफील ने  डिजाइनर्स काे आकर्षित किया, फिर क्या था लोग जुड़ते गए और कारवां बनता गया...

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    खंगालते हैं अर्बन विलेज का इतिहास

    2010 के राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान एएसआई ने यहां की कई दीवारों और ऐतिहासिक संरचनाओं का संरक्षण और पुनर्निर्माण भी कराया।शाहपुर जट के नाम, इसकी बसावट और इसके अस्तित्व को लेकर इतिहासकारों में तमाम मत हैं। इतना ही नहीं, यहां के लोग भी इसके बसावट की कहानी को नहीं मानते हैं। आज हम वर्तमान की गलियों से होते हुए इस अर्बन विलेज के इतिहास के पन्नों की यात्रा करेंगे। 

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    दिल्ली का सर्वप्रिय अर्बन विलेज

    आज शाहपुर जट दिल्ली के सबसे चर्चित अर्बन विलेज के रूप में जाना जाता है। इसकी संकरी गलियों में फैशन डिजाइन स्टूडियो, बुटीक, कैफे, फोटो स्टूडियो, एक्सपोर्ट कंपनियों के छोटे कार्यालय और कारीगरों की वर्कशॉप्स दिखाई देती हैं। शादी के कपड़ों, इंडो-वेस्टर्न फैशन और इंडिपेंडेंट डिजाइनर्स के कारण यह इलाका खास पहचान बना चुका है। गांव की पुरानी हवेलियां अब डिजाइन स्टूडियो में बदल चुकी हैं।

    धीरे-धीरे शहर के बीच घिर गया

    वर्ष 1960 के दशक तक शाहपुर जट पूरी तरह ग्रामीण स्वरूप वाला इलाका था। यहां सरसों लहराया करती थी। खेती और पशुपालन होता था। दक्षिण दिल्ली के शहरी विस्तार के साथ आस-पास की जमीनें अधिग्रहित की जाने लगीं। पंचशील पार्क, गुलमोहर पार्क, एशियाड विलेज और आनंद लोक जैसी कॉलोनियां विकसित हुईं और गांव धीरे-धीरे शहर के बीच घिर गया।

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    गांव बन गया फैशन हब

    खेती की जमीन कम होने के बाद गांव के लोगों ने अपने पुराने घरों का पुनर्निर्माण शुरू किया। कई मकान किराये पर दिए गएकुछ छोटे उद्योगों और कार्यशालाओं को बढ़ावा दिया गया। बाद में जब हौज खास जैसे इलाकों में किराया महंगा होने लगा, तो युवा डिजाइनर और फैशन स्टूडियो शाहपुर जट की ओर आने लगे और देखते ही देखते कभी खेती पर आधारित गांव धीरे-धीरे फैशन की चमक से जगमगा उठा।

    खिलजी ने रखी शाहपुर जट की नींव! 

    इतिहास की कुछ किताबों में दिए गए उल्लेख इलाके के अस्तित्व में आने की कहानी अलाउद्दीन खिलजी से जोड़ते हैं। कहा जाता है कि उसके शासनकाल में दिल्ली सल्तनत पर मंगोल आक्रमण लगातार बढ़ रहे थे तो सुरक्षा के लिए इलाका विकसित किया गया। 

    इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी ने अपनी पुस्तक 'तारीख-ए-फिरोजशाही' में लिखा है कि सन 1303 में मंगोल सेनापति तरघी के नेतृत्व में एक लाख 20 हजार घुड़सवारों की एक विशाल मंगोल सेना दिल्ली तक आ पहुंची थी। इस आक्रमण ने राजधानी के भीतर भय और असुरक्षा का माहौल पैदा कर दिया था।

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    इसी खतरे के बाद अलाउद्दीन ने एक खुले क्षेत्र को किलेबंद करवाना शुरू किया। बाद में इसी स्थान पर एक नये शाही नगर सीरी का निर्माण हुआ। इतिहासकार पीटर जैक्सन ने 'द दिल्ली सल्तनत - ए पॉलिटिकल एंड मिलिट्री हिस्ट्री' में सीरी को दिल्ली सल्तनत की पहली पूरी तरह सैन्य दृष्टि से योजनाबद्ध राजधानी बताया है। यहां मजबूत दीवारें, सैनिक छावनियां और शाही महल बनाए गए थे। 

    निवासियों का कहना, शताब्दियों पहले बसा था गांव

    इतिहास की किताबों में भले ही खिलजी द्वारा इसे बसाने के प्रमाण मिलते हों लेकिन यहां के लोग इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते। उनका मानना है कि तकरीबन एक शताब्दी पहले यानी कि पृथ्वीराज चौहान के समय से ही एक सीरी किला मौजूद था। स्थानीय निवासियों के मुताबिक, शाहपुर जट और सीरी के आस-पास का इलाका काफी हरा-भरा थायहां जंगल और फलदार पेड़ थे। यहां की भूमि उपजाऊ थी। इसी से आकर्षित होकर शुरुआती जाट समुदाय इस इलाके में आकर बसे थे।

    राजस्थान और मध्यप्रदेशसे जुड़ते हैं तार

    गांव के पुराने रिकॉर्ड बताते हैं कि जब कली नाम के व्यक्ति के परिवार ने इस इलाके को अपने कब्जे में लिया, तब यहां की जमीन बंजर और बिना खेती वाली थी। कली को नानक गोत्र का माना जाता है और कहा जाता है कि उसका परिवार लंबे समय तक दक्षिण की ओर रहने के बाद यहां आकर बसा था। आज भी शाहपुर जट के कई पंवार जाट परिवार खुद को कली का सीधा वंशज मानते हैं। उनकी परंपराओं के अनुसार उनके पूर्वज राजस्थान के 'धिंडी' गांव से आए थे, जबकि कुछ दूसरे जाट परिवार अपने मूल को उज्जैन से जोड़ते हैं। 

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    सीरी और आसपास का इलाका आज का शाहपुर जट

    उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश पुरातत्वविद जनरल अलेक्जेंडर कनिंघम ने 1862-65 की अपनी एएसआई रिपोर्ट में यह स्थापित करने की कोशिश की कि सीरी का वास्तविक स्थान शाहपुर जट और उसके आस-पास का इलाका था।

    इंजीनियर सीजे कैम्पबेल ने इस पर आपत्ति जताई लेकिन कनिंघम ने ऐतिहासिक स्रोतों का दोबारा अध्ययन करने के बाद दावा किया कि उनके पास इस पहचान के पर्याप्त और ठोस प्रमाण मौजूद हैं।

    सेना डालती थीं डेरा

    एचके कौल की 'हिस्टोरिक दिल्ली' पुस्तक में उल्लेख है कि कनिंघम ने अपने तर्क अमीर खुसरो, जियाउद्दीन बरनी और इब्नबतूता जैसे मध्यकालीन लेखकों के विवरणों पर आधारित किए। उनके अनुसार अलाउद्दीन खिलजी द्वारा 1303-04 के आस-पास सीरी का किला बनवाने से पहले भी सीरी नाम का उल्लेख मिलता है लेकिन उस समय यह किसी बसे हुए शहर के रूप में नहीं बल्कि दिल्ली के बाहर एक बड़े खुले मैदान के रूप में जाना जाता था, जहां सेनाएं डेरा डालती थीं।

    अमीर खुसरो ने भी किया उल्लेख 

    अमीर खुसरो के एक विवरण के अनुसार 1288 ईस्वी के आस-पास कैकुबाद की सेना का एक हिस्सा इंद्रपत (इंद्रप्रस्थ) में, दूसरा सीरी में और तीसरा तिलपत में ठहरा हुआ था। कनिंघम का मानना था कि यदि सिरी इंद्रपत और तिलपत के बीच स्थित था तो उसकी स्थिति आज के शाहपुर जट इलाके से मेल खाती है।

    अलाउद्दीन ने बनवाया महल

    इसके बाद भी कई घटनाओं में सिरी का उल्लेख एक सैन्य पड़ाव के रूप में मिलता है। जब अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा जलालुद्दीन की हत्या के बाद दिल्ली पर चढ़ाई की तब उसने सीरी के मैदान में डेरा डाला था। इसी तरह मंगोल आक्रमणों के दौरान भी अलाउद्दीन ने दिल्ली शहर छोड़कर सीरी में अपना शिविर लगाया। दुश्मन के बढ़ते खतरे को देखते हुए उसने इस इलाके को मजबूत करना शुरू किया और बाद में यहीं अपना महल और किला बनवाया।

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    शिकार पसंद लोगों की मनपसंद जगह

    इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी ने सीरी को एक विशाल और विस्तृत मैदान बताया है। बरनी के अनुसार दिल्ली के कोतवाल ने सुल्तान को सलाह दी थी कि वह यहां एक ऐसा महल बनवाए जहां वह अपने बाजों को उड़ाने और शिकार का आनंद लेने आ सके। इससे पता चलता है कि उस समय यह इलाका खुला, हरियाली वाला और शहर से अलग क्षेत्र माना जाता था। 

    इब्नबतूता ने भी किया बखान

    चौदहवीं शताब्दी में भारत आए यात्री इब्नबतूता ने भी लिखा है कि 'दारुल खिलाफत सीरी' एक अलग और स्वतंत्र शहर था। यह उल्लेख महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि सीरी को पुराना दिल्ली शहर, यानी लालकोट और किला राय पिथोरा, से अलग समझा जाता था।

    कनिंघम ने माना ऐतिहासिक महत्व

    बरनी और अमीर खुसरो दोनों के लेखों से यह भी पता चलता है कि अलाउद्दीन खिलजी ने सीरी के निर्माण की शुरुआत की थी जबकि उसके बेटे मुबारक शाह ने कई अधूरी इमारतों और किलेबंदी के काम को पूरा करवाया। कनिंघम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सीरी कोई काल्पनिक स्थान नहीं बल्कि शाहपुर जट और उसके आस-पास का वास्तविक ऐतिहासिक क्षेत्र था।

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    रस्टिक फील देते अवशेष 

    समय के साथ सीरी का महत्व कम होने लगा। 1398 में तैमूर के आक्रमण और बाद में शेरशाह सूरी द्वारा पुराने निर्माणों के पत्थरों के इस्तेमाल के कारण अलाउद्दीन के महलों और इमारतों का अधिकांश हिस्सा नष्ट हो गया।

    दीवारों में दबा है मंगोलों का सिर!

    आज शाहपुर जट और सीरी फोर्ट क्षेत्र में केवल कुछ दीवारें, टूटे बुर्ज, पुराने प्रवेश द्वार और मीनारों के अवशेष ही बचे हैं जो लोगों को रस्टिक फील देते हैं। एएसआई सर्वेक्षणों के अनुसार शहर की कुछ सुरंगनुमा दीवारें इतनी चौड़ी थीं कि उन पर घुड़सवार सैनिक और हाथी तक चल सकते थे। स्थानीय कथाओं में यह भी कहा जाता है कि निर्माण के दौरान मंगोलों के कटे सिर दीवारों में दबाए गए थे, हालांकि इस दावे के ऐतिहासिक प्रमाण स्पष्ट नहीं हैं।

    (तस्वीरों को बनाने में एआई की मदद ली गई है।)

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