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    सोनिया गांधी के वोटर लिस्ट विवाद में कोर्ट ने दोनों पक्षों से मांगी लिखित दलीलें, सात दिन का वक्त दिया

    Updated: Sat, 18 Apr 2026 07:05 PM (IST)

    सोनिया गांधी के वोटर लिस्ट मामले में अदालत ने दोनों पक्षों से लिखित दलीलें मांगी हैं, अगली सुनवाई 16 मई को होगी। यह मामला 1980 की मतदाता सूची में सोनि ...और पढ़ें

    सोनिया गांधी को नागरिकता मिलने से पहले वोटर लिस्ट नाम होने का है विवाद। फोटो: आर्काइव

    सोनिया गांधी को नागरिकता मिलने से पहले वोटर लिस्ट नाम होने का है विवाद। फोटो: आर्काइव

    HighLights

    1. सोनिया गांधी वोटर लिस्ट मामले में अदालत ने लिखित दलीलें मांगी

    2. 1980 की वोटर लिस्ट, 1983 में नागरिकता पर उठे सवाल

    3. अगली सुनवाई 16 मई को, विवादित मामले पर फैसला अपेक्षित

    जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। राउज एवेन्यू स्थित विशेष न्यायाधीश की अदालत ने शनिवार को कांग्रेस नेता सोनिया गांधी से जुड़े वोटर लिस्ट विवाद मामले में दोनों पक्षों को एक सप्ताह के भीतर लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया है।

    विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने मामले की अगली तारीख 16 मई तय की है। यह मामला उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें शिकायतकर्ता विकास त्रिपाठी ने मजिस्ट्रेट अदालत के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया गया था।

    भारतीय नागरिक बनने से पहले वोटर कैसे?

    सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बर्मन ने अपनी जवाबी दलीलें पूरी कीं। उन्होंने अदालत को बताया कि सोनिया गांधी का नाम 1980 में मतदाता सूची में शामिल किया गया, जबकि वे 1983 में भारतीय नागरिक बनीं। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि बिना नागरिक बने उनका नाम वोटर लिस्ट में कैसे जोड़ा गया।

    याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि यह मामला जालसाजी, धोखाधड़ी या गलत घोषणा से जुड़ा हो सकता है और इसकी जांच जरूरी है। उन्होंने कहा कि गलत घोषणा भी भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत धोखाधड़ी के दायरे में आती है। साथ ही चुनाव आयोग की रिपोर्ट अदालत में दाखिल करने की अनुमति भी मांगी गई है।

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    क्या ये जरूरी है कि आवेदन देने पर ही नागरिक माना जाए: वकील 

    वहीं, सोनिया गांधी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आरएस चीमा ने इन आरोपों का विरोध करते हुए कहा कि यह एक फिशिंग और रोविंग इंक्वायरी है और मजिस्ट्रेट अदालत ने सही तरीके से एफआईआर दर्ज करने से इनकार किया था। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या यह जरूरी है कि कोई व्यक्ति केवल आवेदन देने के बाद ही नागरिक माना जाए।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने भी महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि यदि सोनिया गांधी 1980 में मतदाता सूची में थीं और 1983 में नागरिक बनीं, तो इस अंतर को कैसे समझाया जाएगा।

    हालांकि, अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि मामला करीब आधी सदी पुराना है और अब जांच किसके खिलाफ और कैसे होगी, यह एक अहम प्रश्न है। यह पूरा मामला मजिस्ट्रेट अदालत के उस आदेश के खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका पर आधारित है, जिसमें एफआइआर दर्ज करने की मांग को खारिज कर दिया गया था।

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