एडिसन को आदर्श मानने वाला वो बच्चा, जिसके एक आविष्कार ने हिलाकर रख दिया ग्लोबल डायमंड मार्केट
क्या आपने कभी सोचा है कि जिस हीरे को बनने में धरती के गर्भ में लाखों साल लग जाते हैं, ...और पढ़ें

जानिए कैसे बना दुनिया का पहला 'इंसानी हीरा' (Image Source: AI-Generated)
HighLights
हावर्ड ट्रेसी हॉल ने पहला कृत्रिम हीरा बनाया
'हाई प्रेशर हाई टेंपरेचर' विधि का किया आविष्कार
औद्योगिक क्षेत्र में लाई नई क्रांति और सम्मान पाया
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। अमेरिका के ओडेन (यूटा) में 20 अक्टूबर 1919 को जन्मे हावर्ड ट्रेसी हॉल एक ऐसे रसायन विज्ञानी थे, जिन्होंने कुदरत के एक बड़े चमत्कार को अपनी प्रयोगशाला में सच कर दिखाया। उन्होंने दुनिया का पहला कृत्रिम हीरा बनाया, जिससे औद्योगिक क्षेत्र में एक नई क्रांति आ गई।
25 जुलाई 2008 को दुनिया से विदा लेने वाले इस महान शोधकर्ता ने एक विशेष उपकरण के दम पर वह कर दिखाया जो दशकों से वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली था।
बचपन की जिज्ञासा और एक बड़ा सपना
एच. ट्रेसी हॉल (पिता हावर्ड हॉल और मां फ्लोरेंस अल्मिना ट्रेसी के बेटे) बचपन से ही मशीनों को लेकर बहुत उत्सुक रहते थे। उन्हें पुरानी मशीनों को खोलने, उनके काम करने का तरीका समझने और बेकार पुर्जों से नई चीजें बनाने का शौक था। महान वैज्ञानिक थॉमस एडिसन उनके आदर्श थे।
उनकी लगन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चौथी कक्षा में ही उन्होंने अपनी टीचर को बता दिया था कि वे बड़े होकर जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी में वैज्ञानिक बनेंगे। आगे चलकर उन्होंने वेबर कॉलेज और फिर यूटा यूनिवर्सिटी से केमिस्ट्री की पढ़ाई की और सच में उसी कंपनी में अपना सपना पूरा किया।
लैब में हीरे बनाने की सबसे कठिन चुनौती
वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या लैब में हीरा बनाया जा सकता है? हम जानते हैं कि हीरे जमीन के बहुत गहरे हिस्से में अत्यधिक गर्मी और दबाव के कारण कार्बन से बनते हैं। प्रयोगशाला में बिल्कुल वैसा ही माहौल पैदा करना एक बहुत ही मुश्किल काम था।
इसी असंभव को संभव बनाने के लिए 'प्रोजेक्ट सुपरप्रेशर' शुरू किया गया। ट्रेसी अपने कई साथी वैज्ञानिकों के साथ इस मिशन में जुटे हुए थे, जिसका लक्ष्य एक ऐसी मशीन तैयार करना था जो असली हीरे बना सके।
1954 में मिली ऐतिहासिक सफलता
लंबे संघर्ष के बाद वह खास दिन आ गया। ट्रेसी हॉल ने खुद डिजाइन किए गए एक उपकरण में कार्बन पर बहुत भारी दबाव और तापमान डाला। प्रयोग पूरा होने के बाद उन्हें छोटे-छोटे हीरे के क्रिस्टल प्राप्त हुए। इस तकनीक को 'हाई प्रेशर हाई टेंपरेचर' विधि कहा जाता है। इस प्रयोग को कई बार दोहराकर जब पूरी तरह तसल्ली कर ली गई, तब 15 फरवरी 1955 को जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी ने इस शानदार सफलता की दुनिया भर में घोषणा कर दी।
कंपनी की शुरुआत और अध्यापन का सफर
विज्ञान की इस खोज को कारखानों तक ले जाने के लिए ट्रेसी ने 1966 में ब्रिघम यंग यूनिवर्सिटी के अपने साथी विल जे. पोप और एम. दुआने हॉर्टन के साथ मिलकर 'मेगा डायमंड' नाम की कंपनी खोली। उन्होंने कृत्रिम हीरे के औद्योगिक उत्पादन के लिए तरह-तरह के प्रेस विकसित किए। एक सफल खोजकर्ता होने के साथ-साथ वे एक बेहतरीन टीचर भी थे, जिन्होंने कई विद्यार्थियों व शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया और पदार्थों के गुण जांचने वाले नए उपकरण भी बनाए।
विज्ञान की दुनिया में मिले बड़े सम्मान
एच. ट्रेसी हॉल के इस बेहतरीन काम को दुनियाभर में सराहा गया और उन्हें कई बड़े पुरस्कार दिए गए। रसायन विज्ञान में उनके अमूल्य योगदान के लिए उन्हें 1970 में प्रतिष्ठित 'केमिकल पायनियर' और 1977 में 'जेम्स सी. मैकग्रॉडी प्राइज फॉर न्यू मैटेरियल्स' अवॉर्ड मिला। 1994 में उन्हें 'यूटा गवर्नर्स मेडल फॉर साइंस एंड टेक्नोलॉजी' से भी नवाजा गया। इसके बाद, साल 2010 में उन्हें सर्वोच्च सम्मान देते हुए 'नेशनल इन्वेंटर्स हॉल ऑफ फेम' में शामिल किया गया।
