एक नहीं, दो बार बेचा Eiffel Tower! आखिर कौन था वो ठग जिसने पूरे पेरिस को बना दिया था बेवकूफ?
क्या आप सोच सकते हैं कि कोई व्यक्ति दुनिया की सबसे मशहूर इमारतों में से एक, 'एफिल टॉवर' को भी बेच सकता है? वो भी एक बार नहीं, बल्कि दो बार। आइए जानते हैं उस शातिर ठग Victor Lustig की कहानी।

कौन-था दो बार एफिल टॉवर बेचने वाला शख्स? (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। पेरिस का एफिल टॉवर आज दुनिया के सबसे खूबसूरत अजूबों में से एक है, लेकिन क्या आप सोच सकते हैं कि कोई इंसान इसे कबाड़ के भाव बेच दे?
जी हां, 1925 में एक बेहद शातिर दिमाग वाले आदमी ने सच में ऐसा कर दिखाया था। आइए, इस आर्टिकल में जानते हैं इतिहास की इस सबसे अनोखी ठगी की कहानी।
कौन था यह मास्टरमाइंड?
साल 1890 में ऑस्ट्रिया-हंगरी में जन्मे विक्टर का बचपन बहुत ही दर्दनाक था। छोटी उम्र में ही उसके माता-पिता अलग हो गए। उसके पिता बहुत क्रूर थे और बात-बात पर उसे मारते-पीटते थे। एक बार तो उन्होंने विक्टर के सिर पर वायलिन ही दे मारा था।
करीब 17 साल की उम्र में विक्टर ने पढ़ाई-लिखाई छोड़ दी। साल 1909 आते-आते वह पेरिस पहुंच गया और जुए की लत का शिकार हो गया। इसी दौरान एक लड़की के प्रेमी ने गुस्से में आकर उसके बाएं गाल पर चाकू से वार कर दिया। गाल पर पड़ा वह निशान जिंदगी भर के लिए उसकी एक खास पहचान बन गया।
जुर्म की दुनिया में विक्टर का पहला कदम
प्रथम विश्व युद्ध से पहले, विक्टर ने जुर्म की दुनिया में अपना पहला बड़ा कदम रखा। वह फ्रांस और न्यूयॉर्क के बीच चलने वाले आलीशान समुद्री जहाजों पर सफर करता था। वहां वह अमीर यात्रियों को खुद को 'ब्रॉडवे नाटकों' का एक बड़ा प्रोड्यूसर बताता और उनसे नाटकों में पैसा लगाने के नाम पर मोटी रकम ऐंठ लेता, लेकिन जब विश्व युद्ध शुरू हुआ और समुद्री रास्तों में पनडुब्बियों का खतरा बढ़ गया, तो उसे अपना यह धंधा बंद करके अमेरिका का रुख करना पड़ा।
कबाड़ में बेच दिया था पेरिस का 'एफिल टॉवर'
करीब दस साल अमेरिका में छोटी-मोटी ठगी करने के बाद 1925 में वह वापस पेरिस लौटा। एक दिन अखबार पढ़ते हुए उसे पता चला कि एफिल टॉवर को बनाए रखने और पेंट करने में सरकार का बहुत पैसा खर्च हो रहा है, और कुछ लोग इसे गिराने की मांग कर रहे हैं।
यहीं से उसके शातिर दिमाग ने एक खतरनाक योजना बनाई:
- उसने एक जालसाज की मदद से सरकार के फर्जी लेटरहेड छपवाए।
- खुद को सरकारी विभाग का 'डिप्टी डायरेक्टर जनरल' बताकर पेरिस के बड़े कबाड़ी वालों के साथ एक सीक्रेट मीटिंग की।
- उसने कबाड़ी वालों को झांसा दिया कि सरकार एफिल टावर को कबाड़ में बेचने जा रही है।
- आंद्रे पॉइसन नाम का एक व्यापारी उसके जाल में फंस गया। लस्टिग ने उससे चुपके से 70,000 फ्रैंक की रिश्वत ली और रातों-रात फ्रांस से भाग गया।
ठगी का शिकार हुआ व्यापारी इतना शर्मिंदा था कि उसने पुलिस तक को कुछ नहीं बताया। इसी बात का फायदा उठाकर कुछ महीने बाद विक्टर फिर से वही खेल खेलने पेरिस आ गया। हालांकि, इस बार उसकी पोल खुल गई और उसे अपनी जान बचाकर वापस अमेरिका भागना पड़ा।
बड़े माफिया को भी बातों में उलझा गया
अमेरिका आकर उसने ठगी का एक नया तरीका निकाला। उसने लकड़ी का एक छोटा-सा बक्सा बनाया, जिसमें कुछ नकली बटन और लीवर लगे थे। वह लोगों से कहता कि यह बक्सा किसी भी नोट की हुबहू नकल छाप सकता है। टेक्सास के एक शेरिफ ने उसकी बातों में आकर वह बेकार बक्सा हजारों डॉलर में खरीद लिया।
इसी दौरान विक्टर की जान-पहचान अमेरिका के सबसे बड़े और खतरनाक माफिया डॉन अल कपोन से हुई। विक्टर ने डॉन से एक प्लान में लगाने के लिए 50,000 डॉलर मांगे। कुछ महीनों तक उस पैसे को तिजोरी में रखने के बाद, वह अल कपोन के पास गया और पूरे पैसे वापस करते हुए बोला कि वह डील फेल हो गई है। अल कपोन उसकी इस ईमानदारी से इतना खुश हुआ कि उसने अपनी तरफ से विक्टर को 5,000 डॉलर का इनाम दे दिया।
पुलिस के हत्थे कैसे चढ़ा शातिर विक्टर?
साल 1930 में विक्टर ने नकली नोट छापने का एक बहुत बड़ा सिंडिकेट शुरू किया। महज पांच सालों के अंदर उसने अमेरिकी बाजार में 2.3 मिलियन डॉलर के नकली नोट उतार दिए।
हालांकि, हर अपराधी का एक अंत होता है। 10 मई 1935 को न्यूयॉर्क में पुलिस ने विक्टर को भी धर दबोचा। उसके पास से सबवे स्टेशन के एक लॉकर की चाबी मिली, जिसमें 51,000 डॉलर के नकली नोट और उन्हें छापने वाली मशीन की प्लेटें रखी थीं।
मजे की बात यह है कि अदालत में पेशी से ठीक एक दिन पहले, वह अपनी तीसरी मंजिल की जेल से चादरों की रस्सी बनाकर नीचे उतरा और फरार हो गया। हालांकि, एक महीने बाद ही पुलिस ने उसे पिट्सबर्ग में फिर से पकड़ लिया। पकड़े जाने पर उसने बड़ी बेबाकी से कहा, "लो लड़कों, मैं आ गया।"
अल्काट्राज में निमोनिया से गई जान
आखिरकार, इस महाठग को खूंखार अपराधियों की जेल 'अल्काट्राज' में 20 साल की सजा सुनाई गई। सजा सुनते वक्त वहां मौजूद एक सीक्रेट सर्विस एजेंट ने भी मान लिया था कि विक्टर इतिहास का सबसे चतुर और शातिर ठग है। 11 मार्च 1947 को, 57 साल की उम्र में जेल में ही निमोनिया की वजह से उसकी मौत हो गई।
यह भी पढ़ें- क्या आप जानते हैं मौसम के मिजाज के साथ घटती-बढ़ती है Eiffel Tower की ऊंचाई? वजह है बेहद दिलचस्प
