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Weather Woman of India, जिसने मौसम विज्ञान में भारत को बनाया आत्मनिर्भर; पढ़ें अन्ना मणि की अनसुनी कहानी

Updated: Fri, 21 Aug 2026 05:40 PM (GMT+05:30)

क्या आपने कभी सोचा है कि आज हम जो मौसम की सटीक भविष्यवाणी देख पाते हैं, उसकी नींव आखिर किसने रखी थी? बता दें, यह कहानी है अन्ना मणि की, जिन्होंने उस द ...और पढ़ें

रूढ़ियां तोड़कर भारतीय मौसम विज्ञान की नींव रखने वाली अन्ना मणि की कहानी (Image Source: AI-Generated)

रूढ़ियां तोड़कर भारतीय मौसम विज्ञान की नींव रखने वाली अन्ना मणि की कहानी (Image Source: AI-Generated)

HighLights

  1. रूढ़ियों को तोड़कर विज्ञान के क्षेत्र में बनाई पहचान

  2. भारत को मौसम विज्ञान उपकरणों में आत्मनिर्भर बनाया

  3. 121 पुरुषों की टीम का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। कल्पना कीजिए 1920 के दशक के उस भारत की, जब लड़कियों की किस्मत अक्सर बचपन में ही तय कर दी जाती थी और उनके हिस्से में सिर्फ घर-गृहस्थी आती थी। उसी दौर में एक ऐसी लड़की भी थी, जिसे गहनों से नहीं, बल्कि भौतिक विज्ञान, किताबों और आसमान से प्यार था।

जब 1947 में देश आजाद हुआ, तो हालात ये थे कि हमारे पास मौसम का मिजाज नापने के लिए अपने खुद के साधारण उपकरण तक नहीं थे। ऐसे नाजुक वक्त में इस युवा महिला वैज्ञानिक ने आगे आकर कमान संभाली। उन्होंने न सिर्फ 121 पुरुषों की एक बड़ी टीम का शानदार नेतृत्व किया, बल्कि अपने दम पर भारत को मौसम विज्ञान के क्षेत्र में विदेशी निर्भरता से हमेशा के लिए मुक्त कर दिया।

हम बात कर रहे हैं भारत की 'वेदर वुमन' अन्ना मणि की। आज अगर भारत तूफानों और बारिश की सटीक भविष्यवाणी कर पाता है, तो उसकी मजबूत नींव इसी दूरदर्शी वैज्ञानिक ने रखी थी। आइए, जानते हैं इस नायिका की अनसुनी और रोमांचक कहानी, जिन्होंने रूढ़ियों की दीवारें तोड़कर विज्ञान के आसमान को छुआ।

रूढ़ियां तोड़कर शिक्षा की राह चुनने वाली अन्ना मणि

अन्ना मणि का जन्म साल 1918 में केरलम के पीरुमेडु में एक सीरियन ईसाई परिवार में हुआ था। उनके पिता एक सिविल इंजीनियर थे। आठ भाई-बहनों में सातवें नंबर की अन्ना बचपन से ही किताबों की बहुत शौकीन थीं। उस दौर में जहां उनकी बहनों की शादी कम उम्र में ही कर दी गई, अन्ना ने शादी के बजाय अपने लिए पढ़ाई का रास्ता चुना।

महात्मा गांधी के वायकोम सत्याग्रह और उनके राष्ट्रवादी विचारों का युवा अन्ना पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था। देशप्रेम की इसी भावना से प्रेरित होकर उन्होंने जीवन भर सिर्फ खादी के कपड़े पहनने का फैसला किया।

कठिन रास्तों पर तय किया विज्ञान का सफर

बीसवीं सदी की शुरुआत में लड़कियों के लिए उच्च शिक्षा हासिल करना एक बहुत बड़ी चुनौती थी, लेकिन अन्ना ने तमाम रूढ़ियों को तोड़ा। उन्होंने चेन्नई के प्रेसिडेंसी कॉलेज से फिजिक्स और केमिस्ट्री में ऑनर्स के साथ बैचलर ऑफ साइंस की डिग्री हासिल की।

साल 1940 में उन्हें प्रतिष्ठित 'इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस' से स्कॉलरशिप मिली। यहां उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक सी.वी. रमन के मार्गदर्शन में काम किया। उन्होंने हीरे और रूबी के गुणों पर दिन में 20-20 घंटे कड़ी मेहनत की और कई शोध पत्र लिखे। हालांकि, मास्टर डिग्री न होने की वजह से मद्रास विश्वविद्यालय ने उन्हें पीएचडी की डिग्री देने से मना कर दिया, लेकिन यह रुकावट उनके मजबूत इरादों को तोड़ नहीं सकी।

आगे की रिसर्च के लिए सरकारी स्कॉलरशिप पर अन्ना मणि इंग्लैंड गईं और वहां 'इंपीरियल कॉलेज लंदन' में दाखिला लिया। यहीं से उनका सफर मौसम विज्ञान और मौसम मापने वाले उपकरणों की तरफ मुड़ गया। यह उनके करियर और भारत के वैज्ञानिक इतिहास का एक बेहद अहम मोड़ साबित हुआ।

भारत को उपकरणों में बनाया आत्मनिर्भर

1947 में आजादी मिलने से पहले, भारत मौसम मापने वाले साधारण वैज्ञानिक उपकरणों के लिए भी दूसरे देशों पर निर्भर था। 1948 में जब अन्ना भारत लौटीं, तो उन्होंने भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के उपकरण प्रभाग में काम करना शुरू किया। उनका एक ही लक्ष्य था-भारत को वैज्ञानिक उपकरणों के मामले में आत्मनिर्भर बनाना।

उन्होंने अपने प्रभाग में 121 पुरुषों की टीम का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया। उनके मार्गदर्शन में टीम ने लगभग 100 अलग-अलग मौसम उपकरणों के डिजाइन का मानकीकरण किया और उनका भारत में ही उत्पादन शुरू करवाया। इसके अलावा, अन्ना उन गिने-चुने वैज्ञानिकों में से थीं जो ओजोन परत के महत्व को बहुत पहले समझ गई थीं। इसलिए, उन्होंने इसे सटीक रूप से मापने के लिए 'ओजोनसोंडे' नाम के एक खास उपकरण का आविष्कार भी किया।

समय से बहुत आगे की सोच

अन्ना मणि अपने समय से बहुत आगे की सोच रखती थीं। जब सौर और पवन ऊर्जा पर दुनिया में ज्यादा बात भी नहीं होती थी, तब अन्ना ने पूरे भारत में इन ऊर्जा के स्रोतों को मापने और मॉनिटर करने के लिए स्टेशनों का एक बड़ा नेटवर्क तैयार कर दिया था। उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर कई महत्वपूर्ण उपकरण विकसित किए।

रिटायरमेंट के बाद भी नहीं रुकीं

साल 1976 में वह मौसम विभाग के उप महानिदेशक के पद से रिटायर हुईं। इसके बाद भी वह रुकी नहीं और उन्होंने भारत में सौर विकिरण पर दो महत्वपूर्ण किताबें लिखीं।

साल 1994 में उन्हें स्ट्रोक आया और 16 अगस्त 2001 को 82 वर्ष की उम्र में तिरुवनंतपुरम में उनका निधन हो गया। आज अन्ना मणि भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके बनाए उपकरणों और दूरदर्शी सोच की बदौलत भारत का मौसम विज्ञान आज भी मजबूती से खड़ा है। उनका जीवन हमें यह याद दिलाता है कि इतिहास में ऐसी कई गुमनाम महिला वैज्ञानिक हैं, जिनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

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