46 साल पहले आई Action Disaster फिल्म बॉक्स ऑफिस पर थी महाफ्लॉप, बाद में मिला कल्ट क्लासिक का दर्जा
विशाल स्टार कास्ट, हालीवुड स्तर का वीएफएक्स और आग की लपटों के बीच बेकाबू रफ्तार। 1980 में आई बी.आर. चोपड़ा की एक एक्शन डिजास्टर फिल्म महज एक फिल्म नही ...और पढ़ें

बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही थी ये फिल्म

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो अपने प्रदर्शन के वक्त तो असफल मानी जाती हैं, लेकिन दशकों बाद उसे, कल्ट क्लासिक का दर्जा मिलता है। उन्हीं में से एक थे ये Action Disaster फिल्म।
20वीं शताब्दी के आठवें दशक के उत्तरार्ध में जब पूरी दुनिया में डिजास्टर फिल्मों (आपदा आधारित फिल्में) का बोलबाला था, तब भारत में भी एक ऐसा सपना देखा गया जिसने उस दौर के सिनेमाई व्याकरण को बदलकर रख दिया।
आपदा का रोमांच
वह दशक वैश्विक सिनेमा के लिए तबाही के दृश्यों का दौर था। हालीवुड में 'द टावरिंग इनफर्नो' (1974) में जलती हुई गगनचुंबी इमारतें और एयरपोर्ट (1970) में हवाई हादसों के दृश्य दर्शकों को रोमांचित कर रहे थे। अंतरराष्ट्रीय सिनेमा ने विनाश को एक मनोरंजक तमाशे में बदल दिया था। ऐसे में यह जरूरी था कि हिंदी सिनेमा भी इसविधा में हाथ आजमाए।
यह भी पढ़ें- 24 घंटे में Mohammed Rafi ने की थी 5 गानों की रिकॉर्डिंग, इन अभिनेताओं की बने थे आवाज
बी.आर. चोपड़ा (B R Chopra) और उनके बेटे रवि चोपड़ा कुछ बड़ा करना चाहते थे। चूंकि उस दौर में जेट लाइनर्स या परमाणु पनडुब्बियों जैसे संसाधन जुटाना भारतीय फिल्मकारों के लिए मुश्किल था, इसलिए उन्होंने भारत की जीवनरेखा यानी रेल को चुना। उन्होंने 'सुपर एक्सप्रेस' नाम की एक ऐसी ट्रेन की कल्पना की, जो आधुनिकता का प्रतीक तो थी, लेकिन जल्द ही एक जलते हुए ताबूत में बदलने वाली थी।
-1773575917933.jpg)
मानव निर्मित त्रासदी
अक्सर आपदा फिल्में कुदरती कहर पर आधारित होती हैं, लेकिन बी आर चोपड़ा ने इसकी कहानी पूरी तरह से इंसानी जलन और बदले के इर्द-गिर्द बुनी गई थी। फिल्म के केंद्र में दो इंजीनियर थे- विनोद (विनोद खन्ना) और रंजीत (डैनी डेन्जोंगपा)। विनोद की बनाई सुपर एक्सप्रेस को जब मंजूरी मिली, तो रंजीत की व्यावसायिक जलन नफरत में बदल गई। बदले की इसी आग में रंजीत ने ट्रेन के इंजन में बम प्लांट कर दिया।
खबरें और भी
ड्राइवर की मौत के बाद बिना ब्रेक के दौड़ती ट्रेन और उसमें लगी आग ने एक ऐसा दृश्य पैदा किया जो भारतीय दर्शकों के लिए बिल्कुल नया था। फिल्म की पटकथा एक टिक-टिक करती घड़ी की तरह थी, जहां सैकड़ों जिंदगियों को बचाने के लिए समय के खिलाफ जंग लड़नी थी।
सितारों का महाकुंभ
यह फिल्म थी 'द बर्निंग ट्रेन' (The Burning Train)। यह हिंदी सिनेमा का वह दौर था जब मल्टी स्टारर फिल्में सफलता की गारंटी मानी जाती थीं। बी.आर. चोपड़ा ने इस फिल्म के लिए उस समय के लगभग हर बड़े सितारे को एक छत के नीचे ला खड़ा किया। धर्मेंद्र, विनोद खन्ना, जितेंद्र, हेमा मालिनी, परवीन बाबी और नीतू सिंह जैसे दिग्गजों ने इस फिल्म को एक ग्लैमरस रूप दिया। दिलचस्प तथ्य यह है कि मूल रूप से अमिताभ बच्चन को भी एक महत्वपूर्ण भूमिका की पेशकश की गई थी, लेकिन किसी कारण से उन्होंने इसे मना कर दिया।
-1773575937456.jpg)
विदेशी तकनीक का सहारा
रवि चोपड़ा इस फिल्म को वैश्विक स्तर का बनाना चाहते थे। प्रेरणा के लिए उन्होंने हालीवुड की 'द टावरिंग' इनफर्नो और 1975 की जापानी थ्रिलर 'द बुलेट ट्रेन' का सहारा लिया। तकनीकी रूप से फिल्म को पुख्ता बनाने के लिए हालीवुड के मशहूर तकनीशियन पाल वर्त्ज़ेल को बुलाया गया। भारतीय क्रू के पास उस समय इतने बड़े पैमाने पर आग और तबाही के दृश्य फिल्माने का अनुभव नहीं था। वर्त्ज़ेल ने अपनी विशेषज्ञता से उन दृश्यों को सजीव बनाया जो आज भी देखने पर प्रभावशाली लगते हैं। यह वह दौर था जब सीजीआई जैसा कुछ नहीं था, इसलिए जो कुछ भी पर्दे पर दिखता था, वह काफी हद तक वास्तविक और मैकेनिकल था।
शूटिंग की चुनौतियां
फिल्म का निर्माण किसी एडवेंचर से कम नहीं था। बताया जाता है कि फिल्म की शूटिंग में सामान्य फिल्मों से दोगुना समय लगा। फिल्म का जो शुरुआती कट तैयार हुआ था, वह करीब साढ़े चार घंटे लंबा था, जिसे बाद में बड़े पर्दे पर प्रदर्शित करने के लिए काफी काटा गया। फिल्म की वास्तविकता के लिए बड़ौदा और हलोल के बीच एक असली रेलवे ट्रैक बुक किया गया था। आग के दृश्यों को नियंत्रित रखने के लिए ट्रेन के डिब्बों में विशेष गैस पाइपलाइन बिछाई गई थी ताकि शूटिंग के दौरान सुरक्षा बनी रहे। इन तमाम सावधानियों के बावजूद, रेलवे की संपत्ति को कुछ नुकसान पहुंचा था, जिसने उस समय काफी सुर्खियां बटोरी थीं।
-1773575951028.jpg)
संगीत बना पहचान
तनावपूर्ण माहौल के बावजूद संगीत फिल्म का मजबूत पक्ष रहा। आर.डी. बर्मन (पंचम दा) ने इस फिल्म के टाइटल म्यूजिक के लिए हिंदी सिनेमा में पहली बार वोकोडर मशीन का इस्तेमाल किया। वह रोबोटिक यांत्रिक आवाज आज भी फिल्म की पहचान है। इसके अलावा, पद्मिनी कोल्हापुरे की आवाज में तेरी है जमीन, तेरा आसमान गाना आज भी स्कूल की प्रार्थनाओं और राष्ट्रीय पर्वों का अभिन्न हिस्सा है। वहीं पल दो पल का साथ हमारा जैसा कव्वाली गीत आज भी अपनी ताजगी बनाए हुए है। संगीत ने फिल्म के भारी-भरकम माहौल को थोड़ा संतुलित करने का काम किया था।
-1773575962449.jpg)
कल्ट क्लासिक दर्जा
20 मार्च, 1980 को जब फिल्म प्रदर्शित हुई, तो उम्मीदें आसमान पर थीं। सिनेमाघरों के बाहर लंबी कतारें थीं, लेकिन धीरे-धीरे फिल्म बाक्स आफिस पर सुस्त पड़ गई। भारी बजट और प्रमोशन के बावजूद यह अपनी लागत मुश्किल से वसूल कर पाई। एक्सपर्ट्स का मानना था कि शायद तब भारतीय दर्शक इस तरह के हाई-टेक प्रयोग के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं हुई।
-1773575971204.jpg)
20वीं शताब्दी के अंतिम दशक में जब प्राइवेट चैनलों और दूरदर्शन पर इस फिल्म का प्रसारण शुरू हुआ, तो नई पीढ़ी इसकी दीवानी हो गई। आज इंटरनेट पर जब इसके क्लिप्स वायरल होते हैं, तो लोग तारीफ करते नहीं थकते। 'द बर्निंग ट्रेन' भारतीय फिल्मकारों की उस हिम्मत की मिसाल है, जिसने बिना किसी आधुनिक तकनीक के बड़े सपने देखना सिखाया। यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि सिनेमा केवल कहानी कहना नहीं, बल्कि असंभव को पर्दे पर उतारने का एक जुनून भी है!