सिंगिंग के बाद अब सियासी मैदान की बारी, क्या चुनावी रण में किस्मत आजमाएंगे अरिजीत सिंह?
अरिजीत सिंह यानी वो गायक जो स्पाटिफाई में शीर्ष पर हैं और प्रशंसकों के सिर-माथे पर। अब हर तरफ केवल कयास ही हैं कि ऐसा क्या हुआ कि वे उठ गए हैं बीच महफ ...और पढ़ें
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गायक अरिजीत सिंह (फोटो क्रेडिट- एक्स)
HighLights
अरिजीत सिंह ने हाल ही में लिया रिटायरमेंट
सिंगर के चुनाव लड़ने के कायस तेज
अरिजीत सिंह के फ्यूचर प्लान पर विश्लेषण
विनय मिश्र, पटना। एक दशक से भारतीय सिनेमा की रूह बनी अरिजीत सिंह की आवाज क्या अब फिल्मों में नहीं गूंजेगी? यह सवाल आज हर संगीत प्रेमी के जेहन में है। इस चौंकाने वाले ऐलान ने न केवल उनके करोड़ों प्रशंसकों को भावुक कर दिया है, बल्कि फिल्म इंडस्ट्री के गलियारों में भी बेचैनी पैदा कर दी है।
प्लेबैक गायकी छोड़कर अरिजीत बंगाल के मुर्शिदाबाद के छोटे से शहर जियागंज वापस चले गए हैं। माहौल चुनाव का है, तो बंगाल के मुर्शिदाबाद के छोटे से शहर जियागंज में बात करते हैं, इस संभावना पर कि प्लेबैक गायकी छोड़कर अरिजीत सिंह क्या नेता बनेंगे? जो अरिजीत को जानता है, उसका परिचय जियागंज से होगा ही।
गंगा किनारे वाला शहर, थोड़ा पुराना, थोड़ा अनमना, थोड़ा सेंटी। तो हमारे सवाल का जवाब है ना...नहीं...एकदम नहीं। जियागंज के लोग कहते हैं राजनीति और अरिजीत...ना दादा, एटा होबे ना...। इतना बांग्ला तो आप समझ ही जाएंगे। ब्रेक की घोषणा के बाद बाहर के लोगों से कोई संपर्क नहीं है।
कोई मीडिया ब्रीफिंग नहीं है। कोई संकेत नहीं मिल रहा। परिवार के लोग चुप हैं। अरिजीत खुद कुछ नहीं बोल रहे। गोपनीयता बढ़ गई है। जो अरिजीत जियागंज में इधर उधर स्कूटी से घूमते दिखते थे, वह घर और स्टूडियो में कुछ कर रहे हैं। जब से अपने इंटरनेट अकाउंट पर प्लेबैक गायकी से ब्रेक लेने की घोषणा की है, बहुत सारे सवाल आ रहे हैं। क्या हुआ, क्यों हुआ, क्या करेंगे अब, कोई बात है क्या, राजनीति में जाएंगे, फिल्म बनाएंगे, किसी बड़े प्रोजेक्ट पर काम करेंगे, थक गए हैं, मानसिक शांति चाहते हैं...ये वो ऐसा वैसा। जियागंज के लोग एक लाइन में जवाब देते हैं, कुछ बड़ा करेगा। और बड़ा। देखिएगा।
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अगर तुम साथ हो
जियागंज पहली बार अरिजीत को थोड़ा बदला हुआ समझ रहा है। जो अरिजीत कभी स्कूटी पर बैठकर बाजार निकल जाते थे, अब एकदम नहीं दिख रहे। घर और स्टूडियो। बस यही दो ठिकाने रह गए हैं। यहां तक कि दो दिन आमिर खान भी जियागंज रहकर चले गए। वीडियो और फोटो वायरल हुए, लेकिन अरिजीत नहीं दिखे। प्राइवेट स्टूडियो उनके घर के पास ही है। बायोमीट्रिक कार्ड से प्रवेश की व्यवस्था है। वहीं वह कुछ नया रचते गुनगुनाते रहते हैं।
जियागंज के लोगों की तारीफ करनी चाहिए कि वे अरिजीत की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का ध्यान रखते हैं। उनके घर की तरफ भीड़ नहीं लगती। लोग कैमरा लेकर खड़े नहीं रहते। इस शहर को अरिजीत पर भरोसा है। इसलिए कि अरिजीत कभी स्टार बनकर यहां नहीं आए। वह यहीं के रहे। बचपन वाली सादगी। वही कम बोलना। वही नजर झुकाकर बात करना। आम शहरी की तरह कभी बाजार में दिखे, तो कभी गंगा किनारे। लोगों का मन किया तो सेल्फी वेल्फी ली, नहीं तो जाने दिया।
तेरा हीरो इधर है
अरिजीत का करियर किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं रहा। देश विभाजन के दौरान उनका परिवार पाकिस्तान के लाहौर से आकर जियागंज में बस गया। परिवार के लोग कहानी सुनाते हैं कि उनके परदादा मुर्शिदाबाद आए थे चादर बेचने। फिर उन्हें किसी ने बताया कि यहां गंगा है। वह घोड़ा गाड़ी से जियागंज पहुंचे और स्नान किया। कुछ दिन रहे।
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पहले से कुछ पंजाबी परिवार यहां थे। यह जगह उन्हें अच्छी लगी थी। विभाजन के बाद जब शहर बदलने की बात हुई, तो उन्होंने जियागंज को चुना। शांत छोटा सा कस्बा। पाकिस्तान सीमा से बहुत दूर, जहां न बम गिरने का डर, न दंगे का। सुरक्षित और अच्छा। अरिजीत की मां अदिति सिंह गायिका थीं। गायन और तबला वादन जैसे माहौल में अरिजीत बड़े हुए। परिवार में संगीत का माहौल था।
1962 में पंजाबीपाड़ा के लोगों ने गुरुद्वारा की स्थापना की, तो वहां शबद-कीर्तन में परिवार के लोग हिस्सा लेते थे। अरिजीत ने बचपन में सुर लगाया, तो मां आश्चर्य में पड़ गईं। शास्त्रीय संगीत की कक्षाओं में भेजा जाने लगा। अरिजीत सिंह को संगीत शिक्षा देने वाले वीरेन हाजारी उनकी गाने बजाने को लेकर बेचैनी का जिक्र करते हैं। वीरेन हाजारी के बड़े भाई राजेंद्र हाजारी ने अरिजीत को शास्त्रीय संगीत का अभ्यास कराया।
स्कूल में गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस, सरस्वती पूजा के कार्यक्रमों में रवींद्र संगीत गाने की मांग होने लगी। फिर रियलिटी शो में गए और फिर फिल्मी करियर। एक दिन ‘तुम ही हो’ आया और सब कुछ बदल गया। उसके बाद पीछे मुड़कर देखने की फुर्सत ही नहीं मिली। किसी स्टेडियम में एक लाख युवा उनका गाना सुनकर सुबकने लगते हैं। दिल जुड़ने और टूटने वाले रिल्स में अरिजीत सिंह की आवाज मस्ट हो गई है। प्रसिद्धि की साथ बहुत कुछ बदला भी है। वह नहीं भी बोलते तो मीडिया में उनकी चर्चा रहती है। प्रेम, विवाह, करियर, फिल्मी दुनिया की राजनीति वगैरह वगैरह। वह सबकुछ छिपाकर रखना चाहते हैं, फिर भी चर्चा होती है।
तेरा यार हूं मैं
इन सबके बीच जो चीज नहीं बदली, वह था अरिजीत का जियागंज से रिश्ता। यहां कोई उन्हें सर नहीं कहता। कोई स्टार नहीं कहता। यहां के लोग उन्हें प्यार से सोमू ही कहते हैं। वह जियागंज राजा विजय सिंह विद्यामंदिर में पांचवीं से दसवीं तक पढ़े। चार साल पहले वह इस स्कूल की प्रबंधन समिति के अध्यक्ष बने। एक बड़ा स्टार और प्रबंधन समिति का अध्यक्ष भी, लेकिन बैठक में आते हैं तो खड़े होकर ही बात कर लेते हैं।

आज भी शिक्षकों के सामने बराबरी पर बैठने में झिझकते हैं। इन दिनों इस स्कूल के वाइस प्रिंसिपल से लेकर शिक्षक तक मीडिया में छाए हुए हैं। सबकी बाइट टीवी पर चलती है। बयान अखबारों में छपते हैं। अरिजीत मीडिया से बात नहीं करते, तो उनके रिश्तेदार, दोस्त, शहर वाले, शिक्षक और आम शहरवासी ही पत्रकारों के प्रिय बने हुए हैं। तरह तरह की बातें। बचपन से जवानी तक के किस्से। गायक बनने के बाद अरिजीत ने स्कूल भवन, खेल का मैदान, क्रिकेट एकेडमी जैसे कई कार्य पूरे कराए।
उनकी मां अदिति सिंह के नाम पर यहां क्रिकेट अकादमी चलती है, जहां बढ़िया कोचिंग होती है। क्रिकेट एसोसिएशन आफ बंगाल की टीम खेलने आती है। परिवार का एक रेस्तरां है हेंसेल, जिसका मतलब होता है रसोईघर। अरिजीत वहां भी जाते थे। किचन में रहते थे। इस रेस्तरां में हमेशा भीड़ रहती है। जो यहां आता है, अरिजीत सिंह के रेस्तरां में खाना जरूर खा लेता है। शहर के कई दर्शनीय स्थल उनके प्रयास से सुंदर और व्यवस्थित हुए। लोग कृतज्ञता जताते हैं। प्रशंसा, प्रशंसा और प्रशंसा। नाराज लोकल यूट्यूब चैनल वाले थोड़ा दिखते हैं, जिन्हें वह भाव नहीं देते।
संन्यास और सलमान कनेक्शन
दिलचस्प बात यह है कि यह घोषणा ठीक उसी समय आई जब सलमान खान के साथ उनका गाना 'मातृभूमि' चर्चा में है। इतिहास गवाह है कि 2016 में जब सलमान और अरिजीत के बीच विवाद चरम पर था, तब अरिजीत ने पत्र लिखकर कहा था कि वे कम से कम एक गाना सलमान के लिए अपनी लाइब्रेरी में रखकर संन्यास लेना चाहते हैं। आज, 10 साल बाद, मानो उनकी वह अधूरी इच्छा 'बैटल आफ गलवान' के साथ पूरी हो गई है और उन्होंने ‘कालिंग इट आफ’ कह दिया है।
ऐ दिल है मुश्किल
अरिजीत ने प्लेबैक से ब्रेक क्यों लिया? देश दुनिया के हर अरिजीत सिंह प्रशंसक की तरह यह सवाल जियागंज के लोगों का भी है। गली में बात करिए, तो कोई कहता है कि शायद थोड़े दिन की बात हो। कोई कहता है कि इतना गाया है, थोड़ा रुकना तो बनता है। दुख के साथ गर्व भी है। हां, सभी यह जरूर कहते हैं कि हमारे शहर का लड़का खास इसलिए है क्योंकि इतना ऊपर पहुंचकर भी जमीन से जुड़ा है।
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राजनीति की चर्चा यहां ज्यादा देर टिकती नहीं। लोग जानते हैं, अरिजीत का रास्ता अलग है। वह भीड़ में खड़े होकर भाषण देने वाले नहीं हैं। वह मंच पर खड़े होकर गाने वाले हैं। या शायद अब कुछ और करने वाले हैं। क्या, यह कोई नहीं जानता। जियागंज इंतजार कर रहा है। धैर्य के साथ। बंगाल के लोग बातों के धनी होते हैं। उनके पास कई दलीले हैं, जिनका मतलब यह है कि अरिजीत सिंह अचानक कुछ भी नहीं करते। अगर रुके हैं, तो सोचकर रुके हैं। अगर खामोश हैं, तो उसी खामोशी में कोई नई धुन पक रही होगी। और जब वह लौटेंगे, जिस भी रूप में लौटेंगे, जियागंज वैसे ही खड़ा मिलेगा अपने सोमू के लिए।
ईर्ष्या बटोर रहा जियागंज
बंगाल का सबसे बड़ा शहर है कोलकाता। लगभग सवा तीन सौ साल पुराना शहर। न जाने कितना गौरव और प्रसिद्धि देख चुका। कोलकाता के पहले बंगाल का सबसे प्रसिद्ध शहर था मुर्शिदाबाद। सल्तनत काल से मुगल काल तक के अवशेष उस प्रसिद्धि की निशानी के रूप में अब भी बचे हैं। कोलकाता बसा तो सारा आभिजात्य और प्रसिद्धि अपने पास ले गया।
आधुनिक काल में धीरे धीरे दिल्ली, बांबे और मद्रास सपनों के शहर बने। छोटे गांवों और शहरों से जो प्रसिद्धि के आसमान तक पहुंचता है, वह इन्हीं शहरों या ऐसे ही अन्य बड़े शहरों में ठिकाना बनाता है। लेकिन अरिजीत सिंह जैसा इतना बड़ा स्टार जियागंज में रहता है। कहीं भी जाता है, तो भागकर जियागंज पहुंचता है। यहीं गाने रचता है। गंगा किनारे बैठता है। भुटभुटी नाव पर शाम बिताता है। यहीं गाने रिकार्ड करता है और मुंबई भेज देता है।
वही गाने करोड़ों दिलों की कहानी बन जाते हैं। जियागंज ईर्ष्या बटोर रहा है। यहां आमिर खान चुपके से आते हैं। प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय गायक एड शीरन भी पिछले साल यहां पहुंचे थे। अरिजीत के साथ स्कूटी की सवारी की, लस्सी पी और भागीरथी यानी गंगा में नाव की सवारी की। अब कोलकाता में ऐसा कुछ होता नहीं दिखता, तो वह जियागंज से ईर्ष्या करता है। और इसका कारण हैं अरिजीत सिंह।
आजादी के पहले उनके परदादा को जियागंज इतना पसंद आया कि वह लाहौर से आकर यहां बस गए। करोड़ों टीनेजर्स-यूथ तक जिसे अपना आइकन मानते हैं, वह अपने परदादा की तरह सोचता है, तो अच्छा ही लगता है। छोटे शहरों को ऐसे बेटे कम ही मिलते हैं। अरिजीत की यह कहानी और कई लोगों को प्रेरित करे, तो और भी कई गंज, पुर, टोला बड़े शहरों को ईर्ष्या से भर देंगे।