Sanjay Dutt की एक जिद और बदल गई David Dhawan की किस्मत, एडिटर से डायरेक्टर बन ऐसे गोविंदा संग रचा था इतिहास
डेविड धवन (David Dhawan) ने एक फिल्म एडिटर के रूप में अपना करियर शुरू किया। वह एडिटर से डायरेक्टर कैसे बने, उनके करियर पर डालिए एक नजर।

डेविड धवन का फिल्मी करियर। फोटो क्रेडिट- इंस्टाग्राम

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। हिंदी सिनेमा में जब भी कॉमेडी फिल्मों का जिक्र होता है, तो डेविड धवन का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। पिछले चार दशकों से अधिक समय से दर्शकों का मनोरंजन करते आ रहे डेविड की कॉमेडी फिल्मों ने उन्हें कामयाबी के शिखर पर पहुंचाया।
आगामी अगस्त में 75 वर्ष के होने जा रहे डेविड इन दिनों अपनी नई फिल्म 'है जवानी तो इश्क होना है' को लेकर चर्चा में हैं। इस फिल्म में उनके बेटे वरुण धवन (Varun Dhawan) मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। बतौर निर्देशक यह उनकी 46वीं फिल्म है। हाल ही में उनके लंबे और यादगार फिल्मी सफर का जश्न मनाने के लिए देश के कई शहरों में ‘डेविड धवन फिल्म फेस्टिवल’ आयोजित किया गया। वास्तव में उनका सफर संघर्ष, संयोग और सफलता की दिलचस्प कहानी है।
कैसे पड़ा क्रिश्चियन नेम?
डेविड का असली नाम राजेंद्र धवन है। त्रिपुरा की राजधानी अगरतला में जन्में डेविड का नाम क्रिश्चियन होने के पीछे दिलचस्प कहानी है। डेविड के पिता के बड़े भाई कोलकाता में रहते थे। वह नि:संतान थे तो डेविड के पिता ने जब वह करीब तीन साल के थे तो उन्हें दे दिया था। उनके पड़ोस में यहूदी परिवार रहता था। उनके छोटे बच्चों के साथ वह खेलते-कूदते, खाते-पीते थे। उन्हीं लोगों ने प्यार से उनका नाम डेविड रख दिया था। बाद में यही नाम उनकी पहचान बना।
क्यों एक्टर नहीं बने डेविड धवन?
जब करियर की बात आई तो बड़े भाई और प्रख्यात अभिनेता अनिल धवन को आदर्श मानने वाले डेविड ने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट आफ इंडिया (FTII) में एक्टिंग कोर्स के लिए आवेदन किया लेकिन परीक्षा के दौरान वहां राकेश बेदी, सुरेश ओबेराय, सतीश शाह जैसे प्रतिभाशाली कलाकारों को देखकर उन्हें लगा कि अभिनय उनके बस की बात नहीं। उन्होंने एडिटिंग को दूसरे विकल्प के तौर पर चुना। हालांकि एडिटिंग से उनका वास्ता कभी नहीं रहा।
बतौर एडिटर शुरू किया था करियर
FTII में दाखिले के समय उनके पिता ने सलाह दी कि अब वह पेशेवर दुनिया में कदम रख रहे हैं तो डेविड नाम ही अपनाएं। घर में सब उन्हें यही बुलाते हैं। फिर नाम बदलाव की अखबार की कटिंग को उन्होंने FTII के सूचना बोर्ड पर भी लगाया। FTII में एडिटिंग बहुत लगन से सीखी। उसका नतीजा यह रहा कि साल 1976 में वह गोल्ड मेडलिस्ट बनके उत्तीर्ण हुए। मुंबई आने के बाद उन्होंने दूरदर्शन में काम किया। हालांकि, उससे पहले उन्हें फिल्म मिल चुकी थी।
राजेंद्र कुमार की फिल्म से शुरू किया था करियर
दरअसल, फिल्ममेकर सावन कुमार उनके भाई अनिल के पड़ोसी थे। उनके साथ डेविड की अच्छी दोस्ती थी। जब वह फाइनल ईयर में थे उस दौरान वह उनके क्लास में पहुंचे जहां डेविड कुछ काम कर रहे थे। उनके काम को देखकर सावन ने कहा कि पहली फिल्म की एडिटिंग मेरे लिए करोगे। तो बतौर एडिटर पहली फिल्म साजन बिना सुहागन (1978) थी। नूतन, विनोद मेहरा, राजेंद्र कुमार अभिनीत यह फिल्म सुपरहिट रही।
संजय दत्त की वजह से डायरेक्टर बने डेविड धवन
उसके बाद राजेंद्र कुमार की फिल्म लवस्टोरी, महेश भट्ट की फिल्म सारांश और नाम की एडिटिंग ने उन्हें शीर्ष एडिटर बनाया। फिल्म नाम की एडिटिंग करते समय संजय दत्त के साथ उनकी दोस्ती प्रगाढ़ हुई। संजय ने ही उन्हें निर्देशन में आने के लिए प्रेरित किया। तब डेविड ने कहा कि उन्हें कौन फिल्म देगा? संजय ने कहा कि मैंने एक फिल्म साइन की है यह तभी करुंगा, जब तुम निर्देशित करोगे। अगले दिन निर्माता से उनकी मुलाकात हुई और फिल्म साइन की। इस फिल्म का नाम ताकतवर था।
इस फिल्म में डेविड ने पहली बार गोविंदा के साथ भी काम किया था। हालांकि इस फिल्म को बनाने में ही उन्हें ढाई साल लग गए थे। करियर के शुरुआत में असफलता की वजह से बीच में एडिटिंग की दुनिया में लौटने का भी ख्याल आया। हालांकि राजेश खन्ना अभिनीत फिल्म स्वर्ग को मिली सराहना से उन्हें संबल मिला।
गोविंदा के साथ डेविड ने रचा इतिहास
निर्माता प्रहलाद निलहानी ने उनके करियर की दिशा बदलने में अहम भूमिका निभाई। FTII में डेविड के सीनियर शत्रुघ्न सिन्हा ने ही डेविड का परिचय निलहानी से कराया, जिसके बाद उन्होंने उनके साथ फिल्म आग का गोला सनी देओल और डिंपल कपाडि़या के साथ बनाई। यह फिल्म भी नहीं चली। उसी दौरान रिलीज हुई सनी देओल अभिनीत घायल और माधुरी दीक्षित अभिनीत दिल को देखकर उन्होंने गोविंदा के साथ फिल्म शोला और शबनम बनाई।
यह फिल्म काफी पसंद की गई। इस फिल्म के लिए फिल्मकार मुकुल आनंद ने ही उन्हें शूटिंग ऊटी स्थित मद्रास रेजिमेंट में करने का सुझाव दिया था। शूटिंग को लेकर डेविड कई दिनों तक वहां कर्नल से अनुमति लेने के लिए प्रयास करते रहे। आखिरकार उन्हें न केवल शूटिंग की अनुमति मिली, बल्कि सेना की ओर से वर्दियां और अन्य सहयोग भी प्रदान किया गया।
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डेविड ने गोविंदा संग की सबसे ज्यादा फिल्में
इसके बाद गोविंदा के साथ उनकी जोड़ी ने हिंदी सिनेमा में कामेडी का नया दौर शुरू किया। फिल्म आंखें की अपार सफलता ने डेविड को शीर्ष निर्देशकों की कतार में ला खड़ा किया। उन्होंने गोविंदा के साथ कुल 17 फिल्में कीं, जिनमें राजा बाबू, कुली नंबर 1, हीरो नंबर 1 और हसीना मान जाएगी जैसी कई सुपरहिट फिल्में शामिल रहीं। वहीं सलमान खान के साथ जुड़वा, पार्टनर समेत आठ सुपरहिट फिल्में की।
बेटे वरुण धवन के अभिनय में आने के बाद उनके साथ मैं तेरा हीरो, जुड़वा और कुली नंबर 1 की रीमेक भी बनाई। अब करीब छह साल के अंतराल के बाद 'है जवानी तो इश्क होना है' में एक बार फिर वरूण को निर्देशित किया है। ऐसे में सिनेप्रेमियों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि कॉमेडी फिल्मों के इस अनुभवी खिलाड़ी का पुराना जादू फिर से बड़े पर्दे पर लौटेगा?
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