बड़े पर्दे से निकलकर कॉर्पोरेट वर्ल्ड तक पहुंचा सिनेमा, Jagran Film Festival की नई पहल ने एम्प्लॉयज को दी सीख
जागरण फिल्म फेस्टिवल हमेशा से मीनिंगफुल सिनेमा को दुनिया के सामने लाने के लिए जाना जाता है। हालांकि, इस बार ...और पढ़ें

कॉर्पोरेट सेक्टर में पहुंचा जागरण फिल्म फेस्टिवल/ फोटो- Instagram
HighLights
कॉर्पोरेट कार्यस्थलों तक पहुंचा जागरण फिल्म फेस्टिवल
कई ऑफिस में हुई नमस्ते सर की स्क्रीनिंग
कर्मचारियों में सहानुभूति और जुड़ाव बढ़ाने की पहल
एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। सिनेमा सिर्फ स्क्रीन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा इससे कहीं आगे बढ़ चुका है। एक प्रभावशाली कहानी सिर्फ क्रेडिट रोल के साथ खत्म नहीं होती, बल्कि उस पर बातचीत होती है, वह उन यादों और शांत पलों में भी जिंदा रहती है, जब लोग पर्दे पर खुद के एक हिस्से का अक्स देखते हैं। इसी सोच ने रजनीगंधा प्रेजेंट जागरण फिल्म फेस्टिवल 2026 को भी आकार दिया है, जो दुनिया के सबसे बढ़ा ट्रैवल फिल्म फेस्टिवल और दैनिक जागरण की एक प्रमुख पहल है।
सिनेमा को सेलिब्रेट करने से आगे, ये फेस्टिवल एक ऐसा मूवमेंट लेकर आया है, जो मीनिंगफुल कहानियों को ऑडिटोरियम के बाहर भी लोगों की डेली लाइफ से जोड़ता है। जिससे एक बातचीत शुरू होती है, जो उम्र, पेशे और सभी सीमाओं से परे है।
इस बार कॉर्पोरेट की दुनिया में पहुंचा फेस्टिवल
सालों से जागरण फिल्म फेस्टिवल ने एक मुख्य उद्देश्य के साथ यात्रा की है कि वह एक अच्छे सिनेमा को हर दर्शक वर्ग तक पहुंचाएं। इस फेस्टिवल के जरिए उन्होंने स्वतंत्र आवाज, पावरफुल नेरेटिव और कहानी को बढ़ावा दिया और अलग-अलग शहरों, कस्बों और एजुकेशनल इंस्टिट्यूट में जाकर इस बात को सुनिश्चित किया है कि इस फेस्टिवल के माध्यम से वह कहानियां लोगों तक जरूर पहुंचे, जो मीनिंगफुल हैं। इस बार, इस फेस्टिवल ने एक नया डेस्टिनेशन चुना है, जो है कॉर्पोरेट वर्कप्लेस।
अपनी इस पहल में जागरण फिल्म फेस्टिवल ने एक स्पेशल वर्कप्लेस पर 'नमस्ते सर' की स्क्रीनिंग का आयोजन किया, जिसने ऑफिस के व्यस्त माहौल को एक ऐसी जगह में बदला, जहां लोग आत्मचिंतन, डायलॉग्स और अपने अनुभव शेयर करें। इसका उद्देश्य सरल लेकिन गहरा था, जहां वह कॉर्पोरट वर्ल्ड के लोगों को, जो डेडलाइन और डेली रूटीन में उलझे रहते हैं, यह याद दिलाया है कि कहानियों में वह पावर होती है जो सहानुभूति, उद्देश्य और एक-दूसरे के साथ दोबारा जोड़ने की अद्भुत शक्ति देती है।

आर्किटेक्चर और इंटीरियर डिजाइन स्टूडियो से हुई शुरूआत
जागरण फिल्म फेस्टिवल की इस नई पहल की शुरुआत फरीदाबाद के सेक्टर 35 के एक बड़े आर्किटेक्चर और इंटीरियर डिजाइन स्टूडियो 'संस्कृति चंद्रक आर्किटेक्ट' से 18 जून को हुई। लगभग 150 आर्किटेक्ट्स, डिजाइनर्स और क्रिएटिव प्रोफेशनल्स वाले इस स्टूडियो को इंस्पायरिंग स्पेस के रूप में जाना जाता है।
हालांकि, इस मौके पर यह एक ऐसी जगह बन गया, जहां सिनेमा केंद्र बन गया। जहां शुरुआत एक फिल्म स्क्रीनिंग से हुई, लेकिन जल्द ही यह एक बातचीत में बदल गई, क्योंकि सह-कर्मचारियों ने स्क्रीन पर दिखाए गए दृश्यों और उसकी वैल्यूज, इमोशन पर अपने विचार शेयर किए। इस अनुभव से यह साबित हो गया कि क्रिएटिविटी सिर्फ डिजाइन बनाने में नहीं है, लेकिन उन कहानियों पर भी बात करना है, जो एक नए नजरिए को जन्म देती हैं।
यह सफर 19 जून को 'मैड इन्फ्लुएंस में भी जारी रहा, जहां क्रिएटर्स, ब्रांड और डिजिटल कंटेंट के माध्यम से हर दिन कोई न कोई कहानी कह रहे हैं। हालांकि, इस दिन सिनेमा खुद मुख्य सूत्रधार बना। यहां पर इवेंट की शुरुआत एक इंटरेक्टिव सेशन के साथ शुरू हुई और उसके बाद वह रूम एनर्जी, हंसी और कई कहानियों से भर गया।
जैसे-जैसे स्क्रीनिंग आगे बढ़ी, वहां पर मौजूद लोग आत्मचिंतन में चले गए और शांति का माहौल हो गया। बाद में जब बातचीत आगे बढ़ी तो यह सामने आया कि कैसे एक मीनिंगफुल सिनेमा प्रोफेशनल रोल्स के बीच दूरी मिटा सकती है और आपसी संबंधों को और मजबूत कर सकती है। यह फिल्में ऐसी चर्चाएं छोड़ जाती हैं, जिनकी चर्चा स्क्रीन्स खत्म होने के बाद भी होती है।
टेक्नोलॉजी ने कहानी कहने की कला को रास्ता दिया
11 जुलाई को, जागरण फिल्म फेस्टिवल एक्का इलेक्ट्रॉनिक पहुंचा, एक ऐसी जगह जहां इनोवेशन और टेक्नोलॉजी का शानदार काम होता है। दोपहर के कुछ पलों के लिए टेक्नोलॉजी ने कहानी कहने की कला को रास्ता दिया। एम्प्लॉयज सिर्फ फिल्म देखने के लिए इकठ्ठा नहीं हुए, बल्कि उसे साथ में मिलकर एक्सपीरियंस भी किया। नमस्ते सर ने दर्शकों को रुककर इस तेज रफ्तार से भागती दुनिया में दयालुता, ग्रेटिट्युड और मानवीय रिश्तों की इम्पोर्टेंस पर विचार करने के लिए इंस्पायर किया। इसके बाद हुई चर्चाऔँ ने ये याद दिलाया कि जहां इनोवेशन विकास को गति देता है, तो वहीं सहानुभूति इसे उद्देश्य दैती है।
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कॉर्पोरेट आउटरीच का लास्ट चैप्टर 15 जुलाई को सैक्टर 63 नोएडा के बैकस्पेस को-वर्किंग में जाकर खत्म हुआ, जो एक ऐसा वर्कप्लेस है, जहां 350 से ज्यादा प्रोफेशनल्स, एंटरप्रेन्योर और इनोवेटर साथ मिलकर काम करते हैं। अपने बिजी वर्क कल्चर के बीच, स्क्रीनिंग ने लोगों को ये अवसर दिया कि वह थोड़े धीमे होकर और एक साथ कुछ अच्छे अनुभव शेयर किए। जैसे ही को-वर्कर साथ में फिल्म देखने के लिए इकट्ठा हुए, वह कार्यस्थल मीनिंगफुल डायलॉग्स और खुद के आत्मनिरीक्षण के मंच में बदल गया।
स्क्रीनिंग खत्म होने के बाद बजने वाली तालियां सिर्फ फिल्म के लिए सराहना को नहीं दर्शाती हैं, बल्कि उस कहानी ने लोगों पर किस कदर प्रभाव छोड़ा है, ये भी दर्शाती हैं।
सिनेमा को थिएटर्स तक सीमित रहने की जरूरत नहीं
इन स्क्रीनिंग से यह क्लियर हो जाता है कि सिनेमा को सिर्फ थिएटर तक सीमित रहने की जरूरत नहीं हैं। एक सोच-समझकर कही गई कहानी बोर्डरूम में बैठे लोगों को भी डिस्कशन करने के लिए प्रेरित कर सकती है। आसपास वर्कप्लेस पर लोगों के रिश्ते मजबूत कर सकती है और को-वर्कर्स के बीच एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति को बढ़ाती है, जिससे लोगों के बीच एक कनेक्शन बिल्ड होता है। कॉर्पोरेट स्पेस में एक मीनिंगफुल सिनेमा लाकर, जागरण फिल्म फेस्टिवल ने अपने उस विश्वास को दोहराया है बेहतर कहानियों पर हर उस शख्स का हक है, जहां लोग एक साथ आते हैं।
जैसे-जैसे जागरण फिल्म फेस्टिवल दैशभर में अपने सफर में आगै बढ़ रहा है, उनका मिशन सार्थक सिनेमा को बढ़ावा देना और हर दर्शक तक इसे पहुंचाने का इरादा मजबूत है। ध्यानपूर्वक चुनी गई फिल्मों की स्क्रीनिंग के साथ-साथ ये फेस्टिवल फिल्म जगत की फेमस हस्तियों के साथ मास्टरक्लास, पैनल डिस्कशन और ऑडियंस को इंटरैक्टिव सेशन का अवसर प्रदान कर कर रहा है, ताकि वह फिल्ममेकिंग के ऑर्ट और क्राफ्ट को बैहतरीन तरीके से समझ सके।
फिल्मों से कई आगै है जागरण फिल्म फेस्टिवल
जागरण फिल्म फेस्टिवल सिर्फ फिल्मों के बारे में नहीं है। यह बातचीत को बढ़ावा देने, अलग-अलग नजरिए को दर्शाने और हमें यह याद दिलाने के बारे में है कि सबसे शानदार कहानियां मिलने वाली तालियों से नहीं, बल्कि उन जिंदगियों से मापी जाती हैं जिन्हें वे क्रेडिट रोल खत्म होने के बहुत बाद तक प्रभावित करती रहती हैं।
