फिल्मों के क्लैश को रोक पाना संभव नहीं, Javed Jaffrey ने दिया खास सुझाव, छोटी फिल्मों को भी मिलेगी जगह
जावेद जाफरी ने अपने 40 साल के करियर में ज्यादातर कामेडी फिल्में की हैं, लेकिन हालिया प्रदर्शित फिल्म ‘मयसभा: द हाल आफ इल्यूजन’ में उन्होंने एक गंभीर औ ...और पढ़ें
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जावेद जाफरी ने फिल्मों के क्लैश पर क्या कहा (फोटो-इंस्टग्राम)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
प्रियंका सिंह, मुंबई। अपने चार दशकों से अधिक के करियर में अभिनेता जावेद जाफरी ने खुद को कभी किसी एक छवि में सीमित नहीं किया। फिर भी उन्हें कामेडी रोल के लिए ज्यादा जाना जाता है। हाल ही में फिल्म मयसभा फिल्म में अपने गंभीर, परतदार और जटिल पात्र से उन्होंने चौंकाया।
कलाकार में होना चाहिए आत्मविश्वास
लीड रोल करने और बाक्स आफिस पर इसके प्रदर्शन को लेकर जावेद कहते हैं कि मैं इन चीजों के बारे में नहीं सोचता हूं। न ही ये ख्याल आते हैं कि मुझे किसी दूसरे अभिनेता की तरह किसी फिल्म में लीड क्यों नहीं मिला। मुझे पता है कि मौका मिलेगा, तो मैं हर रोल कर लूंगा। यह आत्मविश्वास हर कलाकार में होना चाहिए। अहंकार और आत्मविश्वास के बीच में एक बहुत पतली रेखा होती है, जिसे संतुलित करना आना चाहिए। जहां कलाकार यह सोचने लगा कि मैं बेस्ट हूं, वहां गड़बड़ होती है।
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अच्छी फिल्म कमाई कर ही लेती है
कलाकार स्क्रीनटाइम को लेकर दबाव लेते हैं कि लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि कोई चीज छोटी-बड़ी नहीं होती है। हर काम में अपना सौ प्रतिशत देना चाहिए। मुझे अपने करियर के 40 साल बाद अब लग रहा है कि जो कर सकता हूं, वो मिलना चाहिए। जब वह रोल मिलते हैं, तो आगे के लिए फिर एक खिड़की खुल जाती है। निर्माता भी सोचते हैं कि अरे यार यह तो ऐसे रोल भी कर सकता है। तो यह काम पहले जावेद तक क्यों नहीं पहुंचे?
इस पर वह कहते हैं, क्योंकि ऐसे प्रोजेक्ट अक्सर बड़े नामों (कलाकार) के पास जाते हैं, जिन पर पैसा लगाने से स्टूडियो हिचकिचाता नहीं है। लेकिन वह भूल जाते हैं कि जोखिम लेना भी अच्छा होता है। अच्छी कहानियां पैसे कमा लेती है, जैसे गुजराती फिल्म लालो : कृष्ण सदा सहायते ने कमाए थे। अच्छी फिल्में पैसों से नहीं, सही नीयत से बनती हैं। रचनात्मक व्यक्ति कमर्शियल एंगल नहीं देखता है कि फिल्म कितने पैसे कमाएगी।
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अभी अपनी क्षमता परखना बाकी
40 सालों में अब मौके मिलने को जावेद देरी नहीं मानते हैं। वह कहते हैं कि एक प्रसिद्ध कहावत है कि फिश आर द लास्ट टू रिकनाइज वाटर (पानी की पहचान करने में मछलियों सबसे आखिरी होती हैं)। ऐसा कलाकारों के साथ भी होता है, जो कई बार अपनी क्षमता को देख नहीं पाते हैं। बाहरी दृष्टिकोण मिलने पर समझ में आता है कि शायद मैं यह भी कर सकता हूं। कलाकारों को संभालना निर्देशक का काम होता है। मयसभा में मुझे जिस रोल में निर्देशक ने सोचा वह इरफान साहब और नसीरुद्दीन शाह साहब के स्तर का रोल है। फिर भी निर्देशक को लगा की मेरी क्षमता को इंडस्ट्री ने परखा नहीं है। मैंने भी अपना सौ प्रतिशत रोल को दिया। मुंबई के चेंबूर इलाके में स्थित अमर सिनेमा में शूटिंग हो रही थी। मैं चाहता तो घर से आ-जा सकता था। लेकिन मैं थिएटर के पास एक छोटे से होटल में शिफ्ट हो गया, ताकि मैं अपने पात्र में रह सकूं और समय व्यर्थ न हो।
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टाल दी गई धमाल 4 की रिलीज डेट
जावेद की अगली फिल्म धमाल 4 पहले टाक्सिक और धुरंधर 2 फिल्मों के साथ रिलीज होने वाली थी। अब धमाल 4 की रिलीज तारीख बदलकर 12 जून कर दी गई है। इस पर जावेद आगे कहते हैं कि फिल्मों के ऐसे टकराव को हर बार रोकना संभव नहीं है। साल में 52 सप्ताह ही होते हैं। ऐसे तो केवल 52 फिल्में ही फिर साल में रिलीज कर सकते हैं। हमारे देश में सात-आठ सौ फिल्में बनती हैं। टकराव रोकने के लिए हमें और सिनेमाघरों की जररुत है।
दर्शकों को ज्यादा सिनेमाघर मिलेंगे, तो हम उन्हें च्वाइस भी दे पाएंगे कि फलां फिल्म दूसरे थिएटर में लगी है, वहां देख लो। अब जैसे बार्डर 2 फिल्म पसंद की जा रही है, मैं मानता हूं कि हमारी फिल्म मयसभा की शुरुआत उसके मुकाबले धीमी है। इसका कारण यह भी है कि बजट और स्टार के मामले में यह छोटी फिल्म है। भीड़ में हाथ ऊपर उठाकर लोगों को बोलना पड़ता है कि देखो मुझे, मैं यहां हूं। ज्यादा सिनेमाघर होंगे, तो छोटी फिल्मों को भी जगह मिलेगी।