लेफ्टिनेंस से सिंगर बने, मौत के बाद मिली असली सफलता; Lata दीदी के 'दुलारे' की दिलचस्प है कहानी
मदन मोहन और लता मंगेशकर की जोड़ी हिंदी सिनेमा की सबसे जादुई संगीत जोड़ियों में से एक थी, जिन्होंने कई अमर गीत दिए। ...और पढ़ें
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समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) ने यूं तो कई संगीतकारों के साथ जुगलबंदी की लेकिन इनमें से एक हमेशा के लिए यादगार बन गई। इस मशहूर जोड़ी ने 1950,60 और 70 के दशक में हिंदी सिनेमा को कई अमर गजलें और रोमांटिक गीत दिए।
लग जा गले, आपकी नजरों ने समझा, नैना बरसे रिमझिम रिमझिम, मिलो ना तुम तो हम घबराएं जैसे पॉपुलर गीत इन्हीं की देन हैं। हम बात कर रहे हैं संगीतकार मदन मोहन की जो लता दीदी को अपनी राखी बहन मानते थे। मदन मोहन को अपनी हर संगीत रचना के लिए लता जी की आवाज एकदम परफेक्ट लगती थी।
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संगीतकार मदन मोहन और लता मंगेशकर की जोड़ी भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास की सबसे जादुई और बेहतरीन जोड़ियों में से एक हैं। मदन मोहन लता जी की आवाज के सबसे बड़े प्रशंसक थे।
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सेना में दे चुके हैं सेवा
मदन मोहन की धुनों में गजल और शास्त्रीय संगीत का अद्भुत मिश्रण होता था, जो लता मंगेशकर की सुरीली आवाज के साथ मिलकर सीधे दिल को छू लेता था। लेकिन क्या आपको पता है कि संगीत में अपनी पहचान बनाने से पहले मदन मोहन भारतीय सेना में अपनी सेवा दे चुके हैं?
संगीतकार मदन मोहन फिल्म इंडस्ट्री में आने से पहले सेना में सेकंड लेफ्टिनेंट के पद पर कार्यरत थे। साल 1943 में एक साल की सैन्य ट्रेनिंग पूरी करने के बाद, उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सेना जॉइन की थी। हालांकि विश्व युद्ध खत्म होने के बाद उन्होंने सेना से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद वे मुंबई लौट आए और अपने संगीत के शौक को पूरा करने के लिए 'ऑल इंडिया रेडियो' (All India Radio) से जुड़ गए। यहीं से वो लता मंगेशकर के सबसे चहीते संगीतकारों में से एक बन गए।
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साल 1975 में हो गया था निधन
लता दीदी की गायिकी और मदन मोहन की भावपूर्ण धुन ने उस समय नया इतिहास लिखा। खुद लता दीदी ने उन्हें प्यार से 'गजल का शहजादा' का खिताब दिया था। 'वो कौन थी', 'अनपढ़' और 'हीर रांझा' जैसी फिल्मों में उनका संगीत आज भी अमर है। हालांकि कई लोगों को पहचान देर से मिलती है और मदन मोहन के साथ भी ऐसा ही हुआ। उनकी सादगी, सिद्धांतों और बड़े घर से न होने का दिखावा न करने के कारण उन्हें कई बार काम के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा। इसकी वजह से उनकी कई बेहतरीन रचनाओं को व्यावसायिक सफलता उनके असामयिक निधन के बाद ही मिली। साल 1975 में उनका निधन हो गया था।