हंसी, हत्या और जासूसी: एक 'गुमनाम' नोवेल से बनी 51 साल पुरानी ब्लॉकबस्टर क्लासिक फिल्म, गाने आज भी हैं कल्ट
70 के दशक में जहां सिनेमा बुरे वक्त से गुजर रहा था, उस वक्त ऋषि कपूर (Rishi Kapoor) और नीतू ...और पढ़ें

HighLights
'खेल खेल में' ने ऋषि-नीतू को सफल युवा जोड़ी बनाया
फिल्म ने कॉलेज रोमांस और ब्लैक कॉमेडी थ्रिलर को परिभाषित किया
आर.डी. बर्मन का संगीत आज भी कल्ट क्लासिक है
संजीत नार्वेकर, मुंबई। 20वीं शताब्दी का सातवां दशक हिंदी फिल्म उद्योग में भारी उथल-पुथल का दौर था। देव आनंद (Dev Anand), दिलीप कुमार (Dilip Kumar) और राज कपूर (Raj Kapoor) की तिकड़ी अब थकी हुई दिखने लगी थी।
देव आनंद (Dev Anand) का शाश्वत आकर्षण भी 'जानी मेरा नाम' और 'हरे रामा हरे कृष्णा' के साथ इस खतरे का संकेत दे रहा था कि उनका जादू इस दशक से आगे नहीं जा पाएगा।
अमिताभ बच्चन ने पहले ही 'जंजीर' और 'दीवार' के जरिए अपनी उपस्थिति का नोटिस जारी कर दिया था और हालांकि, उन्होंने 'आनंद' और 'अभिमान' में अपने व्यक्तित्व का नरम और अधिक संवेदनशील पक्ष दिखाया था, लेकिन अंततः 'एंग्री यंग मैन' ही विजयी होकर उभरने वाला था। बॉक्स ऑफिस पर राजेश खन्ना (Rajesh Khanna) का वर्चस्व भी खत्म होने की कगार पर था।
हाथ लगा जैकपॉट
सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन दर्शक कुछ और ही चाहते थे- कुछ ऐसा जिसे वे स्पष्ट नहीं कर पा रहे थे और निर्माता समझ नहीं पा रहे थे। अंततः उस दशक के मध्य में दो फिल्मों ने जैकपॉट हासिल किया- 'खेल खेल में' और 'रफूचक्कर'।
दोनों हल्की-फुल्की रोमांटिक कॉमेडी फिल्में थीं और उनमें वह भरपूर मस्ती थी, जिसे कॉलेज की भीड़ तलाश रही थी- टीनएज रोमांस। दोनों में ऋषि कपूर (Rishi Kapoor) और नीतू सिंह (Neetu Singh) की ताजा युवा जोड़ी थी। कुछ साल पहले, बड़े भाई रणधीर कपूर ने कॉलेज रोमांस म्यूजिकल (कल आज और कल, 'जवानी दीवानी', 'दिल दीवाना') की इस उप-शैली में काम जरूर किया था, लेकिन फिर उन्होंने इसे छोड़कर राज कपूर शैली की रोमांटिक कॉमेडी ('रामपुर का लक्ष्मण') को अपना लिया था।
मील का पत्थर
कई मायनों में 'खेल खेल में' हिंदी सिनेमा के लिए मील का पत्थर थी। 16 मई, 1975 को 'खेल खेल में' की रिलीज से एक साल पहले, इस जोड़ी ने पुत्तन्ना कणागल की कन्नड़ हिट 'नागरहावु' पर आधारित 'जहरीला इंसान' में अभिनय किया था, लेकिन अपनी कल्ट प्रतिष्ठा के बावजूद इस हिंदी रीमेक ने पर्दे के इन युवा प्रेमियों के लिए कुछ खास नहीं किया।
अगर 'खेल खेल में' ने पर्दे पर किशोर रोमांस की आग लगाई, तो इसकी वजह इसकी अनूठी प्रस्तुति थी। कॉलेज के उन दर्शकों के लिए, जो तथाकथित कॉलेज रोमांस में अधिक उम्र के नायकों और भारी-भरकम नायिकाओं को देखकर थक चुके थे, यह फिल्म ईश्वरीय वरदान की तरह थी। यहां एक ऐसी जोड़ी थी जो वास्तव में युवा थी और जिसे युवा दिखने के लिए किसी बनावटीपन की आवश्यकता नहीं थी।
यह भी पढ़ें- Neetu Kapoor ने ऋषि कपूर के लिए रखे कई सारे व्रत, फिल्में न चलने पर मंदिरों और गुरुद्वारे जाकर की पूजा
अनोखी थ्रिलर शैली
ऋषि कपूर और नीतू सिंह को कॉलेज की भीड़ के बीच एक सफल हिट जोड़ी के रूप में स्थापित करने के अलावा, 'खेल खेल में' ने विषय और सामग्री में भी एक बदलाव चिह्नित किया- एक ऐसी उप-शैली जिसे बाद में काफी समय तक दोहराया गया: 'ब्लैक कामेडी थ्रिलर'। कहानी एक अल्पज्ञात (यहां तक कि गुमनाम) फ्रांसीसी उपन्यास 'गुड चिल्ड्रन डोंट किल' से उधार ली गई थी, जिसे लुई थामस ने लिखा था, जिनका काम आज अप्राप्य है।
इसका आधार काफी सरल था: अजय आनंद (ऋषि कपूर) शिमला के एक कॉलेज में जाता है और दो शरारती तत्वों विक्रम (राकेश रोशन) और निशा (नीतू सिंह) की साजिशों का शिकार बन जाता है। जल्दी ही तीनों दोस्त बन जाते हैं, जब उन्हें पता चलता है कि अजय भी उतना ही बड़ा शरारती है, जितने वे हैं।
अब यह तिकड़ी ऐसे लोगों की तलाश शुरू करती है जिन्हें वे निशाना बना सकें। अपनी शरारत की योजना बनाते समय वे एक अमीर लेकिन कंजूस जौहरी (जानकीदास) को देखते हैं, जिसकी दुकान उस कैफे के ठीक सामने होती है, जो उनका रोजाना का ठिकाना है। वे मजाक के तौर पर उसे जबरन वसूली का पत्र लिखने का फैसला करते हैं।
हालांकि, अगले दिन जौहरी मृत पाया जाता है और उस पत्र को संलिप्तता के सबूत के रूप में ले लिया जाता है। इस प्रकार पुलिस और इन तीनों के बीच चूहे-बिल्ली का खेल शुरू होता है, जब तक कि विक्रम की हत्या नहीं हो जाती। हंसी-मजाक जल्द ही हत्या और जासूसी के गंभीर मामले में बदल जाता है।
अमर संगीत गाथा
आज यह प्लॉट साधारण लग सकता है और सच कहें तो यह है भी, लेकिन इस फिल्म का जादू इसके नवाचार और प्रस्तुति में था। रवि टंडन ने तब तक कई सफल एक्शन फिल्में निर्देशित की थीं- 'अनहोनी' (1973) और सदाबहार क्लासिक 'मजबूर' (1974), लेकिन सचिन भौमिक द्वारा लिखित इस फिल्म ने उनके निर्देशकीय करियर में एक और आयाम जोड़ दिया।
इतना कि यदि उनके पूरे करियर पर एक पूर्वव्यापी नजर डाली जाए, तो 'खेल खेल में', 'मजबूर' और बहुत बाद में 'खुद्दार' उनकी सबसे उत्कृष्ट फिल्में होंगी। पटकथा की मदद कर रहा था आर.डी. बर्मन का क्लासिक संगीत, जिसमें गुलशन बावरा द्वारा लिखे गए गीत थे। इन दोनों ने कॉलेज रोमांस के मूड को पकड़ा और 'एक मैं और एक तू' तथा 'हमने तुमको देखा' से लेकर 'खुल्लम खुल्ला प्यार करेंगे' के रूप में प्यार की जोरदार घोषणा वाले चार्टबस्टर्स दिए।
प्रभावशाली विरासत का निर्माण
यह ब्रांड इतना सफल रहा कि फिल्म को मलयालम में 'अरुथु' (1976) के नाम से बनाया गया और अब्बास-मस्तान ने अपनी अक्षय कुमार फ्रैंचाइजी 'खिलाड़ी' (1992) की तीसरी फिल्म के लिए इसी शरारती आधार का उपयोग किया।
ऋषि कपूर-नीतू सिंह के मोर्चे पर इस फिल्म ने उनकी फिल्मों के आधे दशक लंबे कार्यकाल की शुरुआत की: 'रफूचक्कर' (1975), 'जिंदा दिल' (1975), 'कभी-कभी' (1976), 'अमर अकबर एंथोनी' (1977), 'दूसरा आदमी' (1977), 'झूठा कहीं का' (1979), 'धन दौलत' (1980)। यह जोड़ी इसके बहुत आगे 'दो दूनी चार' (2010) और 'बेशरम' (2013) तक गई, लेकिन ये अब कॉलेज रोमांस नहीं थे।
देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।