माचिस के डिब्बे पर धुन, सिगरेट के पैकेट पर पंचम दा ने लिखा गाना; 65 साल बाद भी अमर है मोहम्मद रफी का ये गीत
कहते हैं कि जब हुनर सिर चढ़कर बोलता है, तो माचिस की डिब्बी भी डायरी बन जाती है और सिगरेट का खाली पैकेट भी गीत की किताब। 65 साल पहले हिंदी सिनेमा के गल ...और पढ़ें

समंदर किनारे की वो रात जब माचिस की डिब्बी पर सजी वो धुन

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। संगीत और सिनेमा, ये संबंध अनूठा है और निराला है। जहां सिनेमा होगा, वहां संगीत का जिक्र जरूर होगा। कहते हैं कि कुछ धुनें कागजों पर नहीं, यादों की परतों और वक्त की सिलवटों पर लिखी जाती हैं। हिंदी सिनेमा का एक दौर वो था, जब धुनें दिलों को सुकून देने वाला काम करती थीं।
आज के 'डिजिटल दौर' में यकीन करना मुश्किल है कि उस वक्त एक ऐसा गाना बना, जो माचिस की तीली से निकलकर सिनेमा के रूहानी पर्दे तक पहुंचा। आइए जानते हैं दिल को छूने वाले उस ब्लॉकबसल्टर गाने के पीछे की दास्तां...
कैसे बना एस डी बर्मन का ये गाना?
आज जिस गाने की बात हम कर रहे हैं असल में वो कोई और नहीं बल्कि साल 1960 में आई फिल्म 'काला बाजार' का गाना 'खोया-खोया चांद' है। इस गाने को आपने खूब सुना होगा, इस पर खूब आप वाइब करते हुए नजर आए होंगे लेकिन असल में इस गाने के बनने के पीछे की कहानी उतनी ही दिलचस्प है।
यह भी पढ़ें- Mohammed Rafi का ये रोमांटिक गाना सुनते ही झूम उठेगी महबूबा, 60 साल पुराना सॉन्ग Rose Day के लिए परफेक्ट
इस गाने में वहीदा रहमान और देव आनंद की गजब कैमिस्ट्री दिखी थी पर असल में उस कैमिस्ट्री को दिखाने के लिए आर डी बर्मन ने काफी मेहनत की थी। ये किस्सा है उस दौर का है जब महान संगीतकार एस.डी. बर्मन (SD Burman) ने इस गाने की जिम्मेदारी अपने बेटे अपने बेटे आर डी बर्मन (RD Burman) को दी थी।
खबरें और भी
दरअसल इस फिल्म के प्रोड्यूसर देव आनंद खुद ही थे और उन्होंने शैलेंद्र को फिल्म के गीत लिखने को कहा। उस वक्त शैलेंद्र दूसरे कामों में व्यस्त थे, हालांकि इधर एस डी बर्मन ने गाने की धुन तैयार कर ली थी। जब शैलेंद्र ने एस डी बर्मन को कोई जवाब नहीं दिया तो उन्होंने बेटे आर डी बर्मन से कहा कि वो उनके घर जाएं और गाना लिखवाकर ही वापस आएं।
समंदर के किनारे लिखा गया गीत
आर डी बर्मन अपने पिता एस डी बर्मन की बात मानकर शैलेंद्र के पास गए। जब वो वहां पहुंचे तो उन्होंने सीधे तौर पर कहा कि, उन्हें आज गाना चाहिए। काफी देर हो गई तो दोनों लोग जुहू बीच पर चले गए। शैलेंद्र लगातार सिगरेट फूंके जा रहे थे, क्योंकि उन्हें गाने की लाइनें समझ नहीं आ रही थीं।
रात के करीब 11 बज चुके थे। जाहिर है, उस दौर में इतनी रात तक बाहर घूमना और वो भी जुहू बीच पर सही नहीं था। उधर आर डी बर्मन परेशान हो रहे थे कि पिता की बात का पालन भी करना है। इसके बाद शैलेंद्र ने सिगरेट जलाने के लिए पंचम दा से माचिस मांगी, क्योंकि उनकी माचिस खत्म हो गई थी। शैलेंद्र ने पंचम दा से कहा कि दादा धुन सुनाओ जरा.. इसके बाद पंचम दा ने उसी माचिस के डिब्बे पर धुन गुनगुनाई और सामने खड़े शैलेंद्र एकाएक आसमान की तरफ देख रहे थे।
इधर पंचम दा धुन गुनगुना रहे थे और गा रहे थे कि आसमान में पूनम का चांद खिला था। ये सुन शैलेंद्र ने झट से पंचम से कहा कि, ''तुम जाओ और दादा से कहना कि मैं गाना सुबह ले आऊंगा''। पंचम ने तुरंत गाने की धुन के साथ उसे डिब्बी पर लिख लिया।
अब उस वक्त ना तो कलम थी और ना पेन.. बस डिब्बी पर गाने की धुन को लिखकर पंचम दा घर आ गए और अगले फिर पिता एस डी बर्मन को धुन सुना दी और इस तरह से तैयार हुआ गाना ''खोया-खोया चांद, खुल आसमान''(Khoya Khoya Chand Khula Aasman)।
आखिरकार इस गाने को फिर मोहम्मद रफी (Mohammed Rafi Songs) ने अपनी आवाज दी और ये गाना हमेशा के लिए अमर हो गया। इस गाने को पसंद करने वालों की लिस्ट उतनी ही लंबी है, जितना फिल्म को प्यार मिला। फिल्म आज भी उतनी ही पॉपुलर भी है, तो वहीं वहीदा रहमान (Waheeda Rehman) के साथ गाने में देव आनंद का मस्त मौला अंदाज आज भी लोगों की जुबान पर है।