कौन थीं विठाबाई नारायणगांवकर? 'Eetha' में जिसके किरदार में नजर आएंगी Shraddha Kapoor, कहानी 'तमाशा की रानी' की
श्रद्धा कपूर फिल्म 'ईठा' में महाराष्ट्र की दिग्गज लोक कलाकार विठाबाई भाऊ मंग नारायणगांवकर का किरदार निभाएंगी। यह फिल्म विठाबाई के जीवन और कला के प्रति ...और पढ़ें
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एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। स्त्री 2 (Stree 2) के बाद श्रद्धा कपूर (Shraddha Kapoor) एक और पॉवरफुल परफॉर्मेंस के साथ वापसी करने वाली हैं। श्रद्धा ईठा से वापसी करने वाली हैं जिसमें वो महाराष्ट्र की दिग्गज लोक कलाकार विथाबाई भाऊ मंग नारायणगांवकर का किरदार निभाएंगी।
टीजर रिलीज ने पहले ही लोगों के अंदर उत्सुकता पैदा कर दी है और फैंस इनके बारे में जानने के इच्छुक हैं। टीजर में श्रद्धा कपूर एक लावणी डांसर के पूरे गेटअप में नजर आती हैं जो पर्दे के पीछे एक बच्चे को जन्म देने के बाद तुरंत से स्टेज पर परफॉर्म करने आ जाती है।
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लावणी डांस के लिए जानी जाती थीं विठाबाई
टीजर में एक्ट्रेस को विठाबाई की जिंदगी के एक ड्रमैटिक और इमोशनल दौर में दिखाया गया है। पारंपरिक कपड़ों में सजी ईठा बाई प्रेग्नेंट होने के बावजूद स्टेज पर परफ़ॉर्मेंस की तैयारी करते हुए दिखाई गई, जो इस मशहूर कलाकार से जुड़ी सबसे चर्चित कहानियों में से एक की ओर इशारा करता है। क्या विठाबाई की कहानी और कला के प्रति उनका ये प्यार ये हम आगे की कहानी में समझेंगे।
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कौन थीं विठाबाई?
विठाबाई का जन्म 1 जुलाई 1935 को महाराष्ट्र के पंढरपुर में हुआ था। बहुत कम उम्र से ही उन्होंने परफॉर्म करना शुरू कर दिया और तमाशा की दुनिया से जुड़ गई थीं। उनके पिता और चाचा भी उसी मंडली का हिस्सा थे। इसी दौरान, उनके दादा नारायण खुडे ने तमाशा दिखाने वाली एक पारंपरिक घूमती-फिरती लोक मंडली शुरू की, जिसे बाद में उनके पिता और चाचा ने 'भाऊ-बापू मांग' के नाम से चलाया।
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विठाबाई नारायणगांवकर तमाशा और लावणी की एक मशहूर कलाकार थीं, जिन्होंने मराठी लोक-संस्कृति पर एक अमिट छाप छोड़ी। लोक कलाकारों के परिवार में जन्मीं विठाबाई पारंपरिक थिएटर के माहौल में पली-बढ़ीं और आगे चलकर इसकी सबसे बड़ी स्टार बनीं।
साल 2006 में हुआ निधन
उन्हें अपनी दमदार परफ़ॉर्मेंस, भावपूर्ण डांस और मनमोहक गायकी के लिए जाना जाता था। मशहूर विठाबाई ने महाराष्ट्र और उसके बाहर भी बहुत सम्मान हासिल किया। उनकी लोकप्रियता इतनी ज्यादा थी जिसकी वजह से उन्हें "तमाशा सम्राज्ञी" कहा जाने लगा, जिसका अर्थ है "तमाशा की रानी"। महाराष्ट्र के नारायणगांव में 15 जनवरी 2002 को 66 साल की उम्र में लकवे का दौरा पड़ने के बाद उनका निधन हो गया। बाद में सरकार ने 2006 में उनकी याद में सालाना 'विठाबाई नारायणगावकर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड' शुरू किया।