Bhabhi Ji Ghar Par Hain Movie Review: 'भाभी जी घर पर' ही ठीक थीं, सिनेमाघरों में क्यों है?
हर शुक्रवार दर्शक कुछ नया देखने की चाह में सिनेमाघरों तक जाते हैं और इस हफ्ते भी सिनेमाघरों में कुछ फिल्में आईं और इनमें से एक नाम था 'भाभी जी घर पर ह ...और पढ़ें

बोरियत से भरपूर है भाभी जी की सिनेमा वाली कहानी!

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
फिल्म – भाबीजी घर पर हैं: फन ऑन द रन (bhabhiji ghar par hai: fun on the run)
मुख्य कलाकार – रवि किशन, मुकेश तिवारी, दिनेश लाल यादव, आसिफ शेख, रोहिताश गौड़, शुभांगी अत्रे, विदिशा श्रीवास्तव, बृजेंद्र काला, वैभव माथुर, सलीम जैदी, योगेश त्रिपाठी, सानंद वर्मा
निर्देशक – शशांक बाली
अवधि – 135 मिनट
रेटिंग – डेढ़
प्रियंका सिंह, मुंबई। पिछले 11 वर्षों से धारावाहिक भाबीजी घर पर हैं! (Bhabhi Ji Ghar Par Hain) टेलीविजन पर चल रहा है। धारावाहिक की भाभियां बदलीं, लेकिन शो चलता रहा। अब इसे फिल्म की शक्ल दे दी गई है और फिल्म देखकर मन में यही प्रश्न उठता है कि क्यों? आखिर क्या जरुरत थी एक अच्छे खासे चल रहे शो को 135 मिनट में बांधने की।

कहानी वही कानपुर की मॉडर्न सोसाइटी में रहने वाले दो पडोसियों मनमोहन तिवारी (रोहिताश गौड़) और विभूति नारायण मिश्रा (आसिफ शेख) की है, जिन्हें एकदूसरे की पत्नियां पसंद हैं। तिवारी, अनिता भाभी (विदिशा श्रीवास्तव) और विभुती, अंगूरी भाभी (शुभांगी अत्रे) के दीवाने हैं। मौका ऐसा बनता है कि विभूति और अंगूरी मंदिर निकल जाते हैं।
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इसके लिए वह बच्चू भैया (दिनेश लाल यादव) की गाड़ी लेकर जाते हैं। उनकी तलाश में पीछे तिवारी और अनिता भी निकल पड़ते हैं। इस सफर में इन सभी की मुलाकात बाहुबली भाई शांति (रवि किशन) और क्रांति (मुकेश तिवारी) से होती है। शांति का दिल अंगूरी पर और क्रांति का दिल अनिता भाभी पर आ जाता है।
रघुवीर शेखावत, शशांक बाली और संजय कोहली की लिखी इस कहानी में नयापन बस इतना है कि रवि किशन और मुकेश तिवारी का पात्र भी जोड़ा गया है। बाकी वही घिसी-पिटी सी कहानी बिना हंसाए चलती रहती है। रघुवीर संवाद लिखते हुए भूल गए कि उन्हें केवल फिल्म के पात्रों की बात करनी चाहिए न की पूरे पुरुष समाज।
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फिल्म में यह कहना कि हर मर्द को अपनी बीवी से बढ़कर पड़ोस वाली भाभी ज्यादा रूपवती दिखती है, यह पुरुषों के चरित्र को कटघरे में ले आता है। शशांक बाली इस धारावाहिक का निर्देशन बखूबी करते हैं, लेकिन उसी प्रभावशाली तरीके से फिल्म के दायरों में कहानी और पात्रों को समेट नहीं पाते हैं। आइकॉनिक गाना मेरा पिया घर आया... को रीक्रिएट करने की गलती नहीं करनी चाहिए थी। बैकग्राउंड स्कोर और अर्जुन कुकरेती की सिनेमैटोग्राफी फिल्म को थोड़ा सहारा देती है।
अभिनय की बात करें तो आसिफ शेख, रोहिताश गौड़ और शुभांगी अत्रे अपने धारावाहिक वाले ही अंदाज में दिखे, हालांकि विदिशा कमजोर लगीं। रवि किशन को ऐसी फिल्में करने से बचना चाहिए। मुकेश तिवारी, दिनेश लाल यादव, बृजेंद्र काला जैसे अनुभवी कलाकार भी फिल्म में कुछ जोड़ नहीं पाते हैं। हंसी के थोड़े-बहुत पल वैभव माथुर, सलीम जैदी, योगेश त्रिपाठी और सानंद वर्मा अपने पात्रों से लेकर आते हैं, जिन्हें धारावाहिक में भी पसंद किया जाता है।