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    Assi Movie Review: सच्चाई का 'थप्पड़' लगातीं तापसी पन्नू, सोचने पर मजबूर करती है अनुभव सिन्हा की फिल्म

    By Smita ShrivastavaEdited By: Ankit Tomar
    Updated: Mon, 16 Feb 2026 01:56 PM (IST)

    Assi Movie Review: इस हफ्ते सिनेमाघरों में दस्तक देने जा रही है फिल्म अस्सी (Assi)। फिल्म 20 फरवरी को सिनेमाघरों में आएगी लेकिन उससे पहले अगर आप इस फि ...और पढ़ें

    समाज की सोच पर सवाल खड़े करती है 'अस्सी'

    समाज की सोच पर सवाल खड़े करती है 'अस्सी'

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    फिल्‍म रिव्‍यू: अस्‍सी
    प्रमुख कलाकार : तापसी पन्‍नू, मोहम्मद जीशान अय्यूब, कनि कुश्रुति, कुमुद मिश्रा, रेवती
    निर्देशक : अनुभव सिन्‍हा
    अवधि : 133 मिनट
    स्‍टार : तीन

    स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई: फिल्‍म का शीर्षक अस्‍सी (Assi Movie) देश में हर दिन होने वाले बलात्‍कार की अनुमानित संख्‍या की ओर संकेत करता हैं। 'मुल्‍क' और 'आर्टिकल 15' जैसी प्रभावशाली फिल्‍में देने वाले अनुभव सिन्‍हा (Anubhav Sinha) इस बार बलात्‍कार पीड़िता की व्‍यथा और उससे जुड़े सामाजिक प्रशासनिक पहलुओं को कहानी में पिरोते हैं।

    फिल्‍म की शुरुआत एक रोंगटे खड़े करने वाले दृश्‍य से होती है, जिसमें एक महिला को बलात्‍कार के बाद रेल की पटरियों पर छोड़ दिया जाता है। वहां से कहानी उसके अतीत में आती है। परिमा (कनी कुश्रुति) अपने पति विनय (मोहम्मद जीशान अयूब) और बेटे ध्रुव (अद्विक जायसवाल) के साथ खुशहाल जीवन बिता रहे हैं।

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    परिमा स्‍कूल में पढ़ाती है जबकि विनय सुपरमार्केट में काम करता है। एक रात पार्टी के बाद मेट्रो स्‍टेशन से अकेले घर लौटते समय उसकी जिंदगी पूरी तरह से बदल जाती है। पांच लोग उसे चलती गाड़ी में अगवा कर लेते हैं और बेरहमी से सामूहिक बलात्‍कार करते हैं। इस दृश्‍य में वहशी पुरुषों का व्‍यवहार दिल दहला देता है। अदालत में परिमा के आरोपियों के खिलाफ रावी (Taapsee Pannu) मुकदमा लड़ती है। इस कानूनी संघर्ष के साथ कहानी पितृसत्तामक सोच, पुलिस में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार और सामाजिक मानसिकता की पड़ताल करती है।

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    अनुभव सिन्‍हा और गौरव सोलंकी द्वारा लिखी गई 'अस्‍सी' की कहानी वास्‍तविक घटनाओं से प्रेरित है। फिल्म की शुरुआत में एक मार्मिक दृश्य है, जब विनय अपने बेटे को स्कूल बस में दीदी को पहले चढ़ने देने की सीख देता है। इसका संदेश साफ है कि सही परवरिश से ही संवेदनशील समाज बन सकता है। इसी तरह एक अन्‍य दृश्‍य में जब ध्रुव अस्पताल में परिमा से मिलने जाता है, तो विनय कहता है कि इस घटना के प्रभाव घर तक आएंगे ऐसी सच्चाई से बच्चे को पूरी तरह बचाया नहीं जा सकता। ऐसे कई दृश्‍य हैं जो मनमस्तिष्‍क पर गहराई से असर छोड़ते हैं और सोचने पर विवश करते हैं।

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    बहरहाल, फिल्म केवल अदालत की बहस तक सीमित नहीं रहती, बल्कि परिमा के जीवन से जुड़े लोगों के व्यवहार को भी दिखाती है। जब वह स्कूल लौटने का फैसला करती है तो प्रिंसिपल यह कहकर मना कर देती है कि स्कूल और बच्चे इसके लिए तैयार नहीं हैं। यह समाज की असहज मानसिकता को उजागर करता है। फिर जैसे-जैसे मुकदमे की परतें खुलना आरंभ होती है, नौकरशाही की लालफीताशाही, भ्रष्‍ट पुलिस तंत्र और गहरी जड़ जमाए पितृसत्तात्मक ढांचे को सामने लाती है।

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    हर 20 मिनट में स्क्रीन पर एक संदेश आता है कि फिल्म के चलने के दौरान देश में कहीं न कहीं एक और यौन उत्‍पीड़न हो चुका है। यह तथ्‍य असहज कर देता है। फिल्म आरोपियों की जिंदगी को विस्तार से नहीं दिखाती, लेकिन उनकी पृष्ठभूमि की झलक देती है कि किसी की बहन, प्रेमिका, पत्नी या बेटी है, फिर भी उन्हें अपने अपराध का भय नहीं। यह उनकी उस मानसिकता को दर्शाता है कि भ्रष्ट तंत्र उन्हें बचा लेगा। हालांकि इंटरवल के बाद कई दृश्य खिंचे हुए महसूस होते हैं। परिमा की कानूनी लड़ाई के साथ रावी के जीजा कार्तिक (कुमुद मिश्रा) की समानांतर कहानी चलती है, जो अपने अतीत से उबर नहीं पा रहा है।

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    लेकिन यह ट्रैक पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाता, जिससे दर्शकों का भावनात्मक जुड़ाव कमजोर पड़ता है। नसीरूद्दीन शाह का पात्र भी अधूरा लगता है। अगर इन पात्रों को और गहराई मिलती तो फिल्म का प्रभाव और मजबूत हो सकता था। इस बार मीडिया का पक्ष कहानी से नदारद है। यह अखरता है कि इतना बड़ा मामला मीडिया में सुर्खियां नहीं बनता। साथ ही परिमा के आंतरिक दर्द को विस्‍तार दिया जा सकता था।

    अभिनय की बात करें तो 'मुल्‍क' और 'थप्‍पड़' के बाद तापसी पन्नू ने एक बार फिर अनुभव सिन्‍हा के साथ प्रभावशाली काम किया है। वह बेहद अहम और संवेदनशील मुद्दे को वकील रावी के रूप में संजीदगी से उठाती हैं। वह हताशा हो या संवेदना सभी भावों को सधे तरीके से व्यक्त करती हैं।

    दुष्‍कर्म का दंश भोगने के बाद अपनी जिंदगी को दोबारा संवारने की कोशिश कर रही परिमा की भूमिका में कनि कुश्रुति का अभिनय सराहनीय है। जज की भूमिका में रेवती जंचती है। कार्तिक की भूमिका में कुमुद मिश्रा अपना प्रभाव छोड़ते हैं। सुलझे हुए पति की भूमिका में जीशान अयूब (Zeeshan Ayub) का अभिनय सराहनीय है। हालांकि उनके पात्र की जद्दोजहद को और गहराई से दिखाया जा सकता था। हताश पिता की भूमिका में मनोज पाहवा (Manoj Pahwa) का अभिनय उल्‍लेखनीय है।

    कुल मिलाकर 'अस्सी' एक गंभीर, विचारोत्तेजक फिल्म है, जो संवेदनशील विषय को ईमानदारी से उठाती है। कुछ कमजोरियों के बावजूद यह समाज और व्यवस्था पर जरूरी सवाल खड़े करती है। आपको बता दें कि, अनुभव सिन्हा के डायरेक्शन में बनी 'अस्सी' 20 फरवरी को सिनेमाघरों में रिलीज होने जा रही है।

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