Tu Yaa Main Review: रोमांचक है जिंदगी और मौत का खेल, शनाया- आदर्श गौरव की सरवाइवल थ्रिलर की खूनी कहानी में कौन बचेगा?
फिल्म 'तू या मैं' थाई फिल्म 'द पूल' पर आधारित एक सर्वाइवल थ्रिलर है। यह सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर अवनि (शनाया कपूर) और संघर्षशील रैपर मारुति (आदर्श गौरव ...और पढ़ें

तू या मैं मूवी रिव्यू (फोटो-इंस्टाग्राम)

समय कम है?
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स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। सरवाइवल थ्रिलर फिल्मों का मूल आधार प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझते हुए जीवित रहने की जद्दोजहद होता है। साल 2018 में आई थाई फिल्म द पूल से अडाप्टेड फिल्म ‘तू या मैं’ इसी भावभूमि पर आधारित है।
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म की कहानी मुंबई में रहने वाली सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर अवनि शाह उर्फ मिस वैनिटी (शनाया कपूर) और नालासोपारा के संघर्षशील युवा मारुति कदम उर्फ आला फ्लोपारा (आदर्श गौरव) के इर्द-गिर्द घूमती है। कंटेंट क्रिएशन के सिलसिले में दोनों करीब आते हैं और धीरे-धीरे उनके बीच प्रेम पनपता है, लेकिन दोनों की पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि में भारी अंतर है। अवनि संपन्न परिवार से है, हालांकि बचपन में माता-पिता को खो देने का दुख उसके जीवन में गहराई से मौजूद है। अवनि के बीस लाख फालोवर्स हैं। वहीं मारुति आर्थिक तंगी से जूझता युवा है, जिसका सपना एक सफल रैपर बनना है। पिता बचपन में परिवार छोड़ चुके हैं और वह मां तथा बहन के साथ संघर्षपूर्ण जीवन जी रहा है। उसके फालोवर्स भी बहुत ज्यादा नहीं हैं।
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मगरमच्छ का आना पैदा करेगा थ्रिलर
अवनि के परिजनों को यह रिश्ता स्वीकार्य नहीं होता। परिस्थितियों से परेशान होकर दोनों साथ में गोवा जाने का फैसला करते हैं। रास्ते में कोंकण क्षेत्र में उनकी मोटरसाइकिल खराब हो जाती है और उन्हें एक सुनसान जगह में जर्जर और बंद पड़े स्कूबा डाइविंग सेंटर में रुकना पड़ता है। यहीं से कहानी मोड़ लेती है। घटनाक्रम ऐसा बनता है कि दोनों लगभग बीस फुट गहरे एक स्विमिंग पूल में फंस जाते हैं। पूल में पानी नहीं है, बाहर निकलने का रास्ता नहीं और अचानक से एक मगरमच्छ उसमें घुस आता है। उनकी जान पर खतरा मंडराने लगता है। इसके बाद फिल्म पूरी तरह सर्वाइवल थ्रिलर में बदल जाती है, जहां दोनों को अपनी जान बचाने के लिए परिस्थितियों से लड़ना है। दोनों उससे निकल पाते हैं या नहीं कहानी इस संबंध में है।

नजर आई रोमांस की कमी
फिल्म की शुरुआत पानी में मगरमच्छ के तीन लोगों को शिकार बनाने से होती है, जिससे शुरुआती तनाव तो बनता है। मध्यांतर से पहले कहानी अवनि और मारुति के रिश्ते, उनकी नोकझोंक और उनके पारिवारिक हालात को दिखाने में लेती है। हिमांशु शर्मा की लिखी कहानी में दोनों पात्र इन्फ्लुएंसर हैं, लेकिन कहानी डिजिटल दुनिया की गहराई में नहीं जाती। पहले हिस्से में उनका रोमांस भी उतना प्रभावशाली नहीं बन पाता जितनी उम्मीद की जा सकती थी।
रोमांचक है फिल्म का सेकेंड हाफ
इंटरवल के बाद फिल्म की गति बदलती है। अभिषेक अरुण बांदेकर का स्क्रीनप्ले और संवाद इस हिस्से में ज्यादा कसावट लिए हुए नजर आते हैं। निर्देशक बिजाय नांबियार तनावपूर्ण माहौल बनाने में सफल रहते हैं। सीमित स्थान, भय का वातावरण और लगातार मंडराता खतरा दर्शकों को कहानी से जोड़े रखते हैं। मगरमच्छ के साथ टकराव वाले दृश्य रोमांच पैदा करते हैं और फिल्म का यही हिस्सा सबसे ज्यादा प्रभावी बनकर उभरता है।
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कहां कमजोर नजर आई कहानी
तकनीकी पक्ष पर नजर डालें तो बैकग्राउंड संगीत फिल्म के तनावपूर्ण वातावरण को मजबूत करता है। फिल्म पाप की दुनिया का गाना ‘चोरी-चोरी यूं जब आंखें हो चार…’, फिल्म यारा दिलदारा का गाना ‘तुम ही हमारी हो मंजिल माई लव...’ के रीमिक्स का बैकग्राउंड में इस्तेमाल दिलचस्प लगता है और दृश्य के भाव को उभारता है। फिल्म का अहम हिस्सा मगरमच्छ भी है। यह पहचान पाना मुश्किल होगा कि वह असली है या नकली। सिनेमेटोग्राफर रेमी दलाल ने कोंकण क्षेत्र की बारिश, मौसम और वीरान लोकेशन के साथ स्विमिंग पूल के माहौल को प्रभावशाली ढंग से कैमरे में कैद किया है, जिससे फिल्म का माहौल विश्वसनीय बनता है। हालांकि पटकथा में कुछ तार्किक कमजोरियां भी हैं जैसे मारुति का अपने दोस्त को आखिरी बार मोबाइल फोन करना और पुलिस उनकी लोकेशन ट्रेस नहीं कर पा रही है। इसी तरह सेंटर के केयरटेकर के मोबाइल का पानी में तैरना और उसकी घंटी बजना यह कहानी की विश्वसनीयता को थोड़ा कम करते हैं।
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शानदार लगे आदर्श गौरव और शनाया
अभिनय की दृष्टि से फिल्म काफी हद तक आदर्श गौरव और शनाया कपूर के कंधों पर टिकी है। आदर्श गौरव ने मारुति के किरदार को बहुत स्वाभाविक तरीके से निभाया है। उनका मुंबईया अंदाज, संघर्षशील युवा की बेचैनी, महत्वाकांक्षा और भावनात्मक द्वंद्व को प्रभावी ढंग से निभाया है। खासकर रैप सीक्वेंस और सर्वाइवल वाले दृश्यों में उनका अभिनय उल्लेखनीय है। शनाया कपूर इन्फ्लुएंसर के रूप में स्टाइलिश और आत्मविश्वासी नजर आती हैं। यह उनकी दूसरी फिल्म है और वे अपने किरदार में सहज दिखती हैं, हालांकि भावनात्मक दृश्यों में और गहराई की गुंजाइश महसूस होती है। पारुल गुलाटी संक्षिप्त भूमिका में कुछ खास नहीं जोड़ती।
कुल मिलाकर यह फिल्म माहौल और रोमांच के स्तर पर कई अपेक्षाएं पूरी करती है। मगरमच्छ वाला सर्वाइवल हिस्सा दर्शकों को बांधे रखता है, लेकिन भावनात्मक ड्रामा और थ्रिलर के बीच पूरी तरह संतुलित सेतु नहीं बन पाता। इसके बावजूद फिल्म मनोरंजन और रोमांच के स्तर पर निराश नहीं करती।