O'Romeo Movie Review: शानदार शाहिद, सादा तृप्ति... भरपूर एक्शन के बीच बेअसर है 'रोमियो' का इश्क
O'Romeo Movie Review: इस हफ्ते सिनेमाघरों में विशाल भारद्वाज की फिल्म ओ रोमियो रिलीज हुई है। फिल्म में शाहिद कपूर और तृप्ति डिमरी मुख्य किरदारों में ह ...और पढ़ें

'ओ रोमियो...' कहानी कहां है?

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
फिल्म रिव्यू : ओ रोमियो
प्रमुख कलाकार : शाहिद कपूर, तृप्ति डिमरी, नाना पाटेकर, अविनाश तिवारी, तमन्ना भाटिया, हुसैन दलाल
निर्देशक : विशाल भारद्वाज
अवधि : दो घंटा 58 मिनट
स्टार : ढाई
स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई: फिल्मकार विशाल भारद्वाज (Vishal Bhardwaj Movie) का साहित्य और उपन्यासों से गहरा रिश्ता रहा है। उनकी चर्चित फिल्में ‘मकबूल’, ‘ओमकारा’ और ‘हैदर’ विलियम शेक्सपीयर के नाटकों के भारतीय रूपांतरण के रूप में काफी सराही गईं। वहीं ‘खुफिया’ भी अमर भूषण के जासूसी उपन्यास एस्केप टू नोवेयर पर आधारित थी। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उनकी नई फिल्म ‘ओ रोमियो’ लेखक हुसैन जैदी की किताब ‘माफिया क्वीन्स ऑफ मुंबई’ के एक अध्याय से प्रेरित है। यह किताब मुंबई अंडरवर्ल्ड में सक्रिय रहीं महिलाओं की दुनिया को सामने लाती है।
इसी किताब के एक हिस्से से प्रेरित होकर संजय लीला भंसाली ने ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ बनाई थी। कमीने, हैदर, रंगून के बाद विशाल और शाहिद कपूर चौथी बार ओ रोमियो में साथ आए हैं। हालांकि ‘ओ रोमियो’ (O Romeo Movie Review) में मूल कथा से काफी बदलाव किए गए हैं, जिसके कारण कहानी अपनी जड़ों से दूर होती चली जाती है और अंततः एक पारंपरिक बालीवुड फार्मूले में उलझकर रह जाती है। यही वजह है कि उपन्यास से मिलने वाली गहराई और रोमांच फिल्म में पूरी तरह नहीं आ पाता और कथा कई जगह बिखरी हुई लगती है।
फिल्म की कहानी 1995 के मुंबई अंडरवर्ल्ड की पृष्ठभूमि में रची गई है। गैंगस्टर उस्तरा (Shahid Kapoor) को खुफिया विभाग के अधिकारी इस्माइल खान (Nana Patekar) का संरक्षण प्राप्त है। इस्माइल अंडरवर्ल्ड सरगना जलाल (Avinash Tiwary) के ड्रग्स नेटवर्क को खत्म करने के मिशन पर है।
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उस्तरा का अतीत जलाल से जुड़ा रहा है, क्योंकि वह पहले स्पेन में उसके साथ काम कर चुका है। अफ्शा (Tripti Dimri) अपने पति महबूब (Vikrant Massey) की हत्या का बदला लेने के लिए उस्तरा के पास पहुंचती है। वह जलाल, इंस्पेक्टर पठारे (राहुल देशपांडे) समेत चार लोगों की सुपारी देना चाहती है। शुरुआत में उस्तरा इन्कार करता है, लेकिन अफ्शा की मासूमियत, साहस और दृढ़ संकल्प से प्रभावित होता है और उसकी मदद करने के लिए तैयार हो जाता है।
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उस्तरा के हर मिशन में उसका करीबी दोस्त छोटू (Hussain Dalal) साथ रहता है। काठमांडू में जलाल के माल को हथियाने की कोशिश में उस्तरा को अफ्शा बचाती है, लेकिन इसके बाद वह अचानक गायब हो जाती है। यहीं से कहानी नया मोड़ लेती है। उस्तरा उसकी तलाश में जुट जाता है और कथा प्रतिशोध, प्रेम, भ्रष्ट पुलिस और अंडरवर्ल्ड की साजिशों के बीच आगे बढ़ती है।
फिल्म की शुरुआत लार्जर दैन लाइफ का अहसास दे जाती है, जब सिनेमाघर में एक निर्माता की हत्या के साथ जबरदस्त एक्शन दर्शाया जाता है। बैकग्राउंड में बेटा फिल्म का लोकप्रिय गाना 'धक-धक करने लगा' बजता है। इसके बाद कहानी मुख्यतः उस्तरा और अफ्शा के रिश्ते पर केंद्रित हो जाती है, लेकिन अफ्शा की बैकस्टोरी जरूरत से ज्यादा खींची गई लगती है। इंटरवल के बाद कहानी डगमगाती है।
रोहन नरूला और विशाल भारद्वाज (Vishal Bhardwaj) द्वारा लिखे स्क्रीन प्ले में उस्तरा की अफ्शा के प्रति दीवानगी स्थापित नहीं होती है कि आखिर क्यों उसके लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा रहा है। खलनायक जलाल का किरदार कुख्यात अंडरवर्ल्ड सरगना दाऊद इब्राहिम से प्रेरित है, लेकिन कहानी की सबसे कमजोर कड़ी साबित होता है। डायलॉग्स में उसे बेहद ताकतवर बताया गया है, लेकिन परदे पर उसका रौब और खतरा उतना महसूस नहीं होता।
उस्तरा और जलाल के बीच का टकराव भी रोमांचक नहीं बन पाया है। जलाल की पत्नी राबिया (Tamannah Bhatia) कहती है कि उसे जलाल का आतंकी बनना पसंद नहीं। जबकि वह अंडरवर्ल्ड सरगना है। यह विरोधाभास समझ से परे है। फिल्म में नृशंस हिंसा के सीन हैं, जो विचलित कर सकते हैं। फिल्मों में लगातार बढ़ती हिंसा के सीन पर रोकथाम को लेकर विचार की जरूरत है। बहरहाल, फिल्म की फिल्म की अवधि भी काफी ज्यादा है। कई अनावश्यक दृश्यों को हटाकर उसे छोटा करने की पूरी गुंजाइश थी।
फिल्म का गीत-संगीत इसकी सबसे मजबूत कड़ी है। गुलजार के लिखे गीत और विशाल भारद्वाज का संगीत फिल्म को भावनात्मक और व्यावसायिक दोनों स्तरों पर सहारा देते हैं। ‘इश्क महंगा’ और ‘नीचे पान की दुकान’ जैसे गाने वाकई में अच्छे हैं और शाहिद कपूर का डांस इन गानों को शानदार बनाता है। सिनेमैटोग्राफर बेन बर्नहार्ड ने मुंबई से स्पेन आती-जाती कहानी को बखूबी कैमरे में कैद करते हैं।
अभिनय की बात करें तो शाहिद कपूर ने उस्तरा के किरदार में एक्शन, रोमांस और डांस तीनों पहलुओं को संतुलित ढंग से निभाया है। उनका काम शानदार है। उन्होंने अपने किरदार के भाव और अंदाज को पकड़ने का प्रयास किया है। तृप्ति डिमरी अफ्शा के रूप में सादगी और संवेदनशीलता लेकर आती हैं। नाना पाटेकर के किरदार को और उभारने की जरूरत थी, हालांकि स्क्रिप्ट के दायरे में वह अपना प्रभाव छोड़ते हैं।
अविनाश तिवारी अच्छे अभिनेता हैं, लेकिन कमजोर लेखन के कारण उनका किरदार प्रभावी नहीं बन पाया है। हुसैन दलाल अपने किरदार में सहज और विश्वसनीय लगते हैं। इंस्पेक्टर पठारे की भूमिका में राहुल देशपांडे का अभिनय उल्लेखनीय है। दिशा पाटनी, तमन्ना भाटिया और विक्रांत मैसी मेहमान भूमिका में अपने पात्र के साथ न्याय करते हैं।
कुल मिलाकर ‘ओ रोमियो’ एक ऐसी फिल्म है जिसमें दमदार विषय, सक्षम कलाकार और अच्छा संगीत होने के बावजूद कमजोर पटकथा और अनावश्यक लंबाई के कारण उसका असर कम हो जाता है। फिल्म कुछ जगह प्रभावित करती है, लेकिन समग्र रूप से वह भावनात्मक जुड़ाव नहीं बना पाती जिसकी अपेक्षा थी। अगर कहानी किताब केंद्रित पात्रों के इर्दगिर्द रहती तो ज्यादा रोचक होती।