Awarapan 2 Review: शिवम पंडित बनकर पुराना चार्म लौटा पाए इमरान हाशमी, आवारापन 2 में दर्शकों के लिए क्या है नया?
इमरान हाशमी की फिल्म 'आवारापन 2' आज सिनेमाघरों में आ चुकी है। फिल्म की कड़ियां तो आपस में जुड़ी हैं, लेकिन क्या शिवम पंडित ने 19 साल पहले का वही पुराना चार्म सीक्वल में लौटाया है? पढ़ें रिव्यू।

आवारापन 2 मूवी रिव्यू/ फोटो- Jagran Photos
HighLights
इमरान हाशमी का गैंगस्टर एक्शन अंदाज में दमदार वापसी
क्या पहले पार्ट से लेखक जोड़ पाए कनेक्शन?
दिशा पाटनी और शबाना आजमी ने किया कैसा काम?
दीपेश पांडेय, मुंबई। सीक्वल फिल्में बनाते समय अक्सर फिल्मकारों का दावा होता है कि उसका स्तर हर मामले में मूल फिल्म से आगे और कहीं बड़ा होगा। गाने को छोड़ दे तो साल 2007 में प्रदर्शित फिल्म आवारापन ( Awarapan 2 Review) की सीक्वल मूल फिल्म से हर मामले में एक स्तर आगे दिखती है, जो इसे परफेक्ट सीक्वल बनाती है।
कैसे शुरू होती है आवारापन 2 की कहानी?
‘एक मजलूम को आजाद करने का मतलब है सारी इंसानियत को आजाद करना।’ फिल्म आवारापन में नायिका आलिया (श्रिया सरन) द्वारा नायक शिवम (Emraan Hashmi) से कही इसी बात के इर्द-गिर्द आवारापन 2 की भी पूरी कहानी चलती है। सीक्वल की कहानी मूल फिल्म की कहानी से आगे बढ़ती हैं। आवारापन में छह गोलियां लगने के बाद भी शिवम को हांगकांग में चीनी बौद्ध भिक्षु बचा लेते हैं और वह फिर भारत आ जाता है। वह अपनी दिवंगत प्रेमिका आलिया की कब्र के पास बैठा होता है, वहीं उसे एक नवजात बच्ची मिलती है।
शिवम उसे उसी अनाथालय में रखता है, जहां वह स्वयं पला पढ़ा था। वह उसे आलिया नाम देता है और बिना मिले ही उस बच्ची की देखभाल करता है। इसी बीच आलिया (मायरा शिवन) को एक दंपति गोद ले लेता है। बाद में पता चलता है कि वो मानव तस्कर हैं और उन्होंने आलिया को बेच दिया है। शिवम के जीवन के एक बार उसकी प्रेमिका आलिया जा चुकी है, अब वह दोबारा अपनी बेटी के रूप में आलिया को अपनी जिंदगी से नहीं खोना चाहता है। इंटरपोल के एक अधिकारी के साथ मिलकर वह आलिया की खोज में बैंकाक निकल पड़ता है। जहां उसे ड्रग्स का रैकेट चलाने वाले अमृत (बरुण चंदा) के बेटे जोरावर (पूरन गब्बी) की कैद से आलिया समेत 40 बच्चों को छुड़वाना होता है।

वही शिवम की मुलाकात जोरावर की बहन जारा (दिशा पाटनी) और आटिस्टिक (मानसिक तौर पर कमजोर) भाई सिकंदर (अनिरुद्ध रावल) से भी होती है। बैंकाक में ही नफीसा (शबाना आजमी) अमृत के समानांतर और प्रतिद्वंदी गैंग चला रही होती है। अब शिवम उस बच्ची को छुड़ा पाता है या जिंदगी की उम्मीद हार जाता है, यह जानने के लिए फिल्म देखनी पडेगी।
वापस अपने उसी पुराने अंदाज में लौटे इमरान हाशमी
फिल्म में शिवम पंडित की भूमिका में इमरान फिर उसी पुराने गैंगस्टर एक्शन अंदाज में नजर आए, जैसा उनके प्रशंसक उन्हें मर्डर, जहर जैसी फिल्मों में पसंद किया करते थे। उन्होंने एक्शन के साथ-साथ भावनात्मक दृश्यों को भी कैमरे के सामने बखूबी व्यक्त किया है। खलनायक की भूमिका में पूरब गब्बी भी प्रभाव छोड़ने में सफल रहे हैं। हालांकि, उनके पात्र को और खूंखार दिखाया जा सकता था। दिशा पाटनी (Disha Patani) के हिस्से में करने के लिए कुछ खास नहीं आया, जितना आया उन्होंने भी ईमानदारी से करने की कोशिश की है।
नफीसा की भूमिका में शबाना आजमी की उपस्थिति मेहमान भूमिका जैसी रही। फिल्म के अंत में सीक्वल के भी संकेत दिए गए हैं, शायद अगली फिल्म में उनकी भूमिका ज्यादा बड़ी हो। बाल कलाकार मायरा शिवन ने भी आलिया की भूमिका में अच्छा काम किया है। सुविंदर विक्की और वैजयंती कोहली ने भी चरित्र भूमिकाओं में अपना काम जिम्मेदारी से किया है।

लेखक ने दोनों फिल्मों की कड़ियों को बखूबी जोड़ा
लेखन के स्तर पर विशेष भट्ट ने मूल फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने का काम अच्छी तरह से किया है। कहानी प्रत्याशित है, लेकिन भावनात्मक दृश्य हो या एक्शन, इंटरवल के पहले फिल्म दर्शकों को अपने साथ जोड़कर रखती है। इंटरवल के बाद कुछ दृश्यों में थोड़ी देर के लिए कहानी ढीली पड़ती दिखाई देती है, लेकिन फिर पकड़ बना लेती है। आवारापन का निर्देशन मोहित सूरी ने किया था। आवारापन 2 में नितिन कक्कड़ वही अंदाज बरकरार रखन में सफल दिखे।
फिल्म में तेरा मेरा रिश्ता.. गाने के नए वर्जन का सिग्नेचर ट्यून के तौर पर अच्छा प्रयोग हुआ है। आवारापन की तरह इसमें भी जमीन के अंदर दफनाने के बाद शिवम का दोबारा बाहर निकलने जैसे दृश्यों से दोनों फिल्मों की कड़ियां अच्छी तरह से जुड़ती हैं। हां, इन दिनों एक तरफ जहां फिल्म धुरंधर में आदित्य धर द्वारा हर सीन में की दिखाई गई बारीकियों के बारे में बात हो रही है, उस नजरिए से फिल्म में बारीकियों की कमी दिखी। जैसे नमक के अंदर दफनाए जाने के बाद भी शिवम के चेहरे या कपड़ों पर जरा भी नमक का न लगा होना।

मूल फिल्म की तरह इस फिल्म के गाने सिनेमाघरों से बाहर निकलने के बाद याद नहीं रह जाते हैं, जो लोगों , वो पुराने गानों के ही नए वर्जन। एकमात्र जुबिन नौटियाल का गाया हुआ गाना लाडो.. दिल को छूता है। राजू सिंह का बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म के जॉनर, पृष्ठभूमि और कहानी के साथ जंचता है। कुल मिलाकर फिल्म दर्शकों को भरपूर मनोरंजन करने के साथ यह संदेश देने में भी सफल रहती है कि अगर ऊपरवाले ने आपको किसी काम के लिए चुना है, तो फिर कोई नहीं रोक सकता है।

