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    Krishnavataram Part 1 Review: भालका तीर्थ से महाभारत युद्ध तक, कई अनसुने सवालों के जवाब देती है 'कृष्णावतारम्'

    By Priyanka SinghEdited By: Tanya Arora
    Updated: Thu, 07 May 2026 12:48 PM (IST)

    कृष्णावतारम: पार्ट 1 हार्ट (हृदयम्) आज सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। हार्दिक गज्जर के निर्देशन में बनी इस माइथोलॉजिकल फिल्म में फैंस को कई ऐसे सवाल ...और पढ़ें

    पूर्ण पुरुषोत्तम कृष्णावतारम् : पार्ट 1 द हार्ट (हृदयम्) रिव्यू/ फोटो- Instagram

    पूर्ण पुरुषोत्तम कृष्णावतारम् : पार्ट 1 द हार्ट (हृदयम्) रिव्यू/ फोटो- Instagram

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    प्रियंका सिंह, मुंबई। 'कृष्ण किसी के नहीं, जो पुकारे उसी के हैं...' द्वापर युग में जन्मे भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण का जीवन प्रेम, करुणा, ज्ञान और कर्मयोग का प्रतीक है। उनकी लीलाओं और उनकी जीवन यात्रा को फिल्म में समेटने का सफल प्रयास किया है निर्देशक हार्दिक गज्जर ने, अपनी फिल्म 'पूर्ण पुरुषोत्तम कृष्णावतारम् : पार्ट 1 द हार्ट (हृदयम्)' में।

    भालका तीर्थ से शुरू होकर महाभारत तक की कहानी

    फिल्म की कहानी शुरू होती है भालका तीर्थ से, जहां श्रीकृष्ण ने अपने प्राण त्यागे थे। वहां से कहानी साल 2026 के जगन्नाथ पुरी मंदिर में आती है, जहां ऐसा माना जाता है कि आज भी श्रीकृष्ण की मूर्ति में उनका दिल धड़कता है। स्वामी जी (जैकी श्रॉफ) जब यह कथा सुनाते हैं, तो आज के दौर का एक लड़का इस पर सवाल उठाता है। वह विज्ञान का हवाला देता है।

    इसके बाद स्वामी जी उसे पूरी कथा सुनाते हैं और वहां से कहानी फिर द्वापर युग में जाती है, जहां श्रीकृष्ण (सिद्धार्थ गुप्ता) ने गोकुल से निकलकर वृंदावन बसाया था, द्वारकाधीश बने, बरसाना में राधा (सुष्मिता भट्ट) से प्रेम किया, रुक्मिणी (निवाशिनी कृष्णन) और सत्यभामा (संस्कृति जयना) से विवाह किया और फिर अधर्म के खिलाफ महाभारत की शुरुआत हुई।

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    श्रीकृष्ण की जिंदगानी को खूबसूरती से समेटा

    तीन पार्ट्स में बनने वाली इस फिल्म के पहले हिस्से के शीर्षक से ही समझ आ जाता है कि फिल्म श्रीकृष्ण के प्रेम और समर्पण पर आधारित होगी। इसे प्रकाश कपाड़िया, राम मोरी और हार्दिक गज्जर ने अपनी पटकथा में खूबसूरती से ढाला है। राधा से प्रेम, रुक्मिणी और सत्यभामा संग विवाह, सोलह हजार रानियों संग द्वारका लौटना, और इसके साथ ही कई दृश्यों में उनकी अद्भुत लीलाएं दिखाई गई हैं। हर युग में अलग-अलग अवतार लेकर जन्मे विष्णु अवतारों के पुराने वचनों को निभाना, धर्म की स्थापना के लिए बंसी छोड़कर शस्त्र उठाना, सखी द्रौपदी के साथ उनका सखा-प्रेम और द्रौपदी चीरहरण के दौरान उनकी रक्षा करते समय आंखों में दुख, गुस्सा और आंसू को भी बखूबी दिखाया गया है।

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    'देवों के देव महादेव' के निर्देशक हार्दिक गज्जर का अनुभव इस फिल्म में भी साफ़ दिखता है। वह श्रीकृष्ण की जिंदगानी को किसी खूबसूरत रंगों से सराबोर पेंटिंग की तरह प्रस्तुत करते हैं। इसमें उन्हें सिनेमैटोग्राफर अयानंका बोस और कॉस्ट्यूम डिजाइनर निधि यशा का बेहतरीन साथ मिला है। आर्ट डायरेक्शन और प्रोडक्शन डिज़ाइनर की टीम ने भी फिल्म को भव्य बनाने में कोई कमी नहीं रखी है।

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    इन सभी सवालों के जवाब देती है फिल्म

    भामा का नाम सत्यभामा क्यों पड़ा? रुक्मिणी को श्रीकृष्ण से बिना देखे प्रेम कैसे हो गया? राधा का नाम श्रीकृष्ण से पहले क्यों लिया जाता है? उनकी सोलह हजार रानियां होने के पीछे क्या वजह है? अपना हृदय वो दुनिया को क्यों दे गए? —ऐसे कई सवालों के जवाब यह फिल्म देती है। ग्राफिक्स के ज़रिए कृष्ण जन्म, कारावास से गोकुल का सफर, गोवर्धन धारण, कालिया दमन और माखन चोरी समेत उनकी कई बाल लीलाओं को दर्शाने का आइडिया स्क्रीन पर काम करता है। श्रीकृष्ण जब द्रौपदी को उनके मांगे हुए वरदान पर 'तथास्तु' कहते हैं, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

    हालांकि, फिल्म मध्यांतर से पहले थोड़ी धीमी है। कुछ लंबे-लंबे दृश्यों और गानों को एडिट किए जाने की गुंजाइश थी। देखते समय मन में कुछ प्रश्न भी उठेंगे, लेकिन उनके उत्तर हो सकता है कि आगे के दो पार्ट्स में मिलें, क्योंकि यह एक ट्रायलॉजी फिल्म है।

    shri krishna

    सिनेमाघरों से निकलने के बाद भी याद रह जाएंगे गीत

    राधा से मिलने और बिछड़ने के गीत, सत्यभामा का खुशी से गरबा करना और श्रीकृष्ण के कोमल हृदय के साथ उनके पराक्रम को दर्शाने के लिए इरशाद कामिल के बोल और प्रसाद एस. का संगीत व बैकग्राउंड स्कोर पूरा साथ देता है। 'कृष्णा गोविंदा हरे मुरारी...', 'प्रेम की लीला...' और 'कुंजबिहारी नैनों में सोहे...' जैसे गीत थिएटर से निकलने के बाद भी याद रह जाते हैं।

    प्रकाश कपाड़िया के लिखे संवाद दमदार हैं: "नियति मेरे बस में नहीं, मेरा यह अवतार नियति के अधीन है...", "एक ओर प्रेम है और दूसरी ओर कर्तव्य...", "हर मनुष्य को अपनी लड़ाई स्वयं लड़नी पड़ती है...", "रंगरूप के भेदभाव का निर्माण तो मनुष्य ने किया है, ईश्वर की दृष्टि में सभी समान हैं...", "आत्मा के रास्ते जाओगे तो परमात्मा को पाओगे...", "धर्म की स्थापना ही हमारा उत्तरदायित्व है..." और "मनुष्य होना कदाचित सरल है, परंतु मनुष्य के रूप में ईश्वर होना बहुत कठिन..."

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    श्रीकृष्ण के रूप में सिद्धार्थ गुप्ता ने किरदार को किया आत्मसात

    अभिनय की बात करें, तो सिद्धार्थ गुप्ता ने श्रीकृष्ण के रोल को पूरी तरह से आत्मसात किया है। वह श्रीकृष्ण के नटखट, निश्छल, प्रेमी, दार्शनिक और युद्धनीतिज्ञ (रणनीतिकार) जैसे बहुआयामी व्यक्तित्व को दर्शाने का सफल प्रयास करते हैं। सत्यभामा के रोल में संस्कृति जयना को कई भावनाओं को जीने का अवसर मिला है, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया है। राधा के रोल में सुष्मिता भट्ट मन मोह लेती हैं और कृष्ण संग उनकी नोक-झोंक प्यारी लगती है। वहीं, रुक्मिणी के दृढ़निश्चयी व्यक्तित्व में निवाशिनी कृष्णन खूब जंचती हैं।

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