Mirzapur The Movie Review: जौनपुर से जैसलमेर तक भौकाल, गद्दी के लिए बही खून की नदियां; सीरीज से कितनी अलग फिल्म?
तीन सफल सीजन के बाद फिल्म मिर्जापुर: द मूवी अब थिएटर्स में आ चुकी है। क्राइम और एक्शन से भरपूर ...और पढ़ें
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मिर्जापुर द मूवी रिव्यू/ फोटो- जागरण ग्राफिक्स
HighLights
मिर्जापुर की गद्दी के लिए जौनपुर से जैसलमेर तक खूनी संघर्ष
फिल्म में पूर्वांचल के लहजे में दमदार संवाद और अभिनय
एडिटिंग और रैप एक्शन फिल्म को स्टाइलिश बनाते हैं
प्रियंका सिंह, मुंबई। साल 2018 में शुरू हुआ वेब सीरीज मिर्जापुर का सफर तीन सीजन तक बढ़ चुका है। चौथे सीजन की स्क्रिप्ट लिखी जा रही है। इसी बीच फिल्म के निर्माता-निर्देशक ने इस दुनिया को फिल्म में समेट दिया है। सिनेमाघरों में रिलीज हुई मिर्जापुर : द मूवी फिल्म कालीन भैया, गुड्डू पंडित, मुन्ना भैया के साथ लौटी जरूर है, लेकिन इस बार मिर्जापुर की गद्दी के दावेदारों में और लोग भी शामिल हैं।
मिर्जापुर की गद्दी के लिए बहा कितना खून?
कहानी मिर्जापुर की उसी गद्दी से शुरू होती है, जिसे पाने की चाह जौनपुर से लेकर जैसलमेर में रहने वाले बाहुबली कर रहे हैं। लेकिन उस गद्दी पर राज है अंखडानंद त्रिपाठी यानी कालीन भैया (पंकज त्रिपाठी) का। गुड्डू पंडित (अली फजल), बबलू पंडित (जिंतेंद्र कुमार) कालीन भैया के राइट और लेफ्ट हैंड हैं, उनके बोलने पर दुश्मन का काम तमाम कर देते हैं। कालीन भैया का बेटा मुन्ना (दिव्येंदु शर्मा) अपने पिता का भरोसा जीतकर मिर्जापुर की गद्दी संभालना चाहता है, लेकिन कालीन भैया को उससे ज्यादा गुड्डू और बबलू पर भरोसा है।
इसी बीच पूर्वांचल पर राज करने के लिए मिर्जापुर की गद्दी पर जौनपुर के बाहुबली से लेकर, जैसलमेर के बाहुबली तक नजर गड़ाए बैठे हैं। बाहुबली बब्बन यादव (रवि किशन) मिर्जापुर पर राज करने के लिए एक जाल बिछाता है। अब उस जाल में कालीन भैया और उनके लोग फसेंगे या निकल जाएंगे। उस पर फिल्म कई चौंकाने वाले मोड़ के साथ आगे बढ़ती है।
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पूर्वांचल के लहजे में लपेटे गए संवाद ने बनाया रियल
मिर्जापुर सीरीज के तीन सीजन बन चुके हैं, ऐसे में फिल्म की तुलना वेब सीरीज से हो सकती है, जिसमें भौकाल फिल्म से ज्यादा है, लेकिन इस बात का ख्याल रखना भी जरूरी है कि फिल्म फार्मेंट में समय सीमा है। ऐसे में तुलना सही नहीं होगी। बिना सीरीज का चश्मा पहने अगर देखें, तो फिल्म मजेदार और नई लगेगी।
फिल्म के लेखक पुनीत कृष्णा ने फिल्म को सीरीज से अलग रखकर चतुराई दिखाई है। उन्होंने कोई पुराने डायलॉग रिपीट करके सीरीज को भुनाने की कोशिश नहीं की है। इसके साथ ही उनके पूर्वांचल के लहजे में लपेटे गए संवाद फिल्म को वास्तविकता के करीब लेकर जाते हैं। गद्दी का नियम जानते हो, शत्रू कितना भी छोटा क्यों न हो, जीवित नहीं बचना चाहिए..., तुम लॉयल्टी के लिए लड़ रहे हो, हम लव के लिए लड़ रहे हैं, हमसे जीत थोड़े पाओगे......, तालियां बटोरते हैं।

रैप एक्शन सींस को देते हैं रफ्तार
मिर्जापुर की सिग्नेचर म्यूजिक, संजय कपूर की सिनेमैटोग्राफी और मनन अश्विन मेहता की एडिटिंग फिल्म को बेहद स्टाइलिश बनाती है। ढांडा न्योलीवाला का दो नंबरी रैप गोलियों के साथ चल रहे एक्शन सीन को रफ्तार देती है। मिर्जापुर से जैसलमेर की रोड ट्रिप में मुन्ना और गुड्डू के बीच कार रेस वाला सीन रोमांचक है।
बात करें फिल्म के कुछ निगेटिव प्वाइंटस की तो मध्यांतर से पहले फिल्म धीमी है, सीरीज की वजह से कई लोग इसके पात्रों से परिचित हैं, ऐसे में निर्देशक गुरमीत सिंह बिना समय बर्बाद किए सीधे मुद्दे पर आ सकते थे। क्लाइमैक्स का एक्शन सीन काफी लंबा खिंच गया है, उसे कम करके फिल्म की अवधि को कम किया जा सकता था। ऊंट को लगाने वाले स्टेराइड के इंजेक्शन का गुड्डू को खुद लगा लेना, ताकि वह और बलवान लगे बचकाना लगता है। कहीं-कहीं लॉजिक की कमी है, इतने खून-खराबे के बीच पुलिस की अनुपस्थिति अखरती है।
सीरीज की तरह कलाकारों ने फिल्म में भी दिखाया दम
अभिनय की बात करें तो कालीन भैया के रोल में पंकज त्रिपाठी अपने चिरपरिचित अंदाज में हैं, हालांकि इस बार वह खलनायक कम हीरो ज्यादा लगते हैं, क्योंकि उनसे बड़े खलनायक फिल्म में हैं। गुड्डू पंडित बने अली फजल भौकाल मचाने में कोई कमी नहीं रखते हैं। फिल्म में नई एंट्री जितेंद्र कुमार मास्टरमाइंड बबलू के रोल में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। फिल्म में कालीन भैया का संवाद है कि मुन्ना चलते फिरते बारूद हैं, इस रोल में दिव्येंदु शर्मा इसे फिर सच करते हुए दिखते हैं।

रवि किशन इन दिनों जिस प्रोजेक्ट पर हाथ रखे रहे हैं, वह उनके लिए सोना साबित हो रही है। इस फिल्म में क्रूर बाहुबली और प्रेमी के रोल में वह जंचते हैं। बीना त्रिपाठी के आइकॉनिक रोल में रसिका दुग्गल इस बार और चौकाएंगी। कुलभूषण खरबंदा कम सीन में भी याद रह जाते हैं। श्वेता त्रिपाठी और श्रिया पिलगांवकर के हिस्से बहुत खास सीन नहीं लगे हैं। कंपाउडर के छोटे से रोल को करने के लिए अभिषेक बनर्जी की सराहना बनती है, क्योंकि वह खुद अपने करियर में काफी आगे बढ़ चुके हैं।
दिलजले प्रेमी के रोल में मोहित मलिक का काम बढ़िया है। शीबा चड्ढा और राजेश तैलंग के पास चंद सीन ही हैं, लेकिन उसमें वह छाप छोड़ते हैं। सोनल चौहान का रोल अधूरा सा है, उनके रोल को बेहतर किया जा सकता था। इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके मुख्य किरदारों के साथ सपोर्टिंग पात्रों में हैं, जिसे प्रमोद पाठक, अनंगशा बिस्वास, शुभ्रज्योति बराट, सतेंद्र सोनी जैसे मंझे हुए कलाकारों ने निभाया है।
हालांकि इन सबके बीच में एक बात जो इस फिल्म के बारे में माननी पड़ेगी, वो है इसका मार्केटिंग और पीआर। मार्केटिंग तो खैर तगड़ी थी ही, लेकिन इसका पीआर गेम एकदम नेक्स्ट लेवल था। बिना किसी ओवर-द-टॉप ड्रामे के, इस फिल्म को लगातार हर किसी की जुबां पर बनाए रखा। उम्मीद जताई जा रही है फिल्म पहले दिन अच्छा खासा कारोबार कर सकती है, क्योंकि एडवांस बुकिंग में पहले ही फिल्म कमाई के रिकॉर्ड बना चुकी है।
