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    Toaster Review: 'महाकंजूस' पति बनकर छा गए राजकुमार राव, धांसू कहानी के बावजूद कहां हुआ फिल्म का बेड़ागर्क?

    By Smita SrivastavaEdited By: Tanya Arora
    Updated: Wed, 15 Apr 2026 03:42 PM (GMT+05:30)

    राजकुमार राव और सान्या मल्होत्रा स्टारर फिल्म 'टोस्टर' नेटफ्लिक्स (Netflix) पर आ गई है। फिल्म का आइडिया बहुत ही दिलचस्प है, लेकिन इसके बावजूद मूवी काफ ...और पढ़ें

    रोस्टर मूवी रिव्यू/ फोटो- Jagran Graphics

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    स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। कई बार कहानियां कागजों पर रोचक लगती हैं, लेकिन परदे पर उस तरह से साकार नहीं हो पाती है। यही हाल टोस्‍टर का भी है। फिल्‍म का आइडिया दिलचस्‍प है, लेकिन ठीक से रोस्‍ट नहीं हो पाई है।

    महाकंजूस रमाकांत की दिलचस्प कहानी है 'टोस्टर' 

    मुंबई में सेट कहानी का आरंभ महाकंजूस रमाकांत (राजकुमार) द्वारा एक कब्र खोदने से होता है। उसके बाद कहानी कुछ सप्‍ताह आगे आती है। स्‍थानीय नेता आमरे (जितेंद्र जोशी) का अतंरंग वीडियो चरसी ग्‍लेन (अभिषेक बनर्जी) बना लेता है। वह नेता को ब्‍लैकमेल करके पैसा वसूलने की तैयारी में है। वहीं बोरीवली में रहने वाला रमाकांत ऐसी कालोनी में रहता है जहां अधिकतर बुजुर्ग लोग हैं। उसकी कंजूसी का आलम यह है कि टेस्‍टर परफ्यूम को बड़े से डिब्‍बे में पैक करके तोहफे में देने में गुरेज नहीं करता। 

    मकान मालकिन डिसूजा (सीमा पाहवा) के यहां  नाश्‍ता करने बेझिझक पहुंच जाता है। उसकी पत्‍नी शिल्‍पा (सान्‍या मल्‍होत्रा) टीवी पर क्राइम पेट्रोल सरीखा शो होशियार हिंदुस्‍तान देखने की शौकीन है और उसकी कंजूसी से परेशान है। कराटे में ब्‍लैक बेल्‍ट शिल्‍पा अपनी गुरुजी की बेटी की शादी में करीब पांच हजार रुपये का टोस्‍टर तोहफे में देती ह, पर शादी टूट जाती है। रमाकांत टोस्‍टर वापस मांगने जाता है। पता चलता है कि उन्‍होंने सारे तोहफे अनाथालय को दान दे दिए हैं। बाद में यही टोस्‍टर  रमाकांत के साथ आमरे की जिंदगी में परेशानी का कारण बनता है। अब रमाकांत और आमरे उससे कैसे जूझते हैं कहानी इस संबंध में है।

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    सेकंड हाफ में मात खा गए निर्देशक

    टोस्‍टर की कहानी  परवेज शेख ने लिखी है, जबकि इसका स्क्रीनप्ले उनके साथ अक्षत घिल्डियाल और अनघ मुखर्जी ने लिखा है। घिल्डियाल के संवाद फिल्म में हल्के-फुल्के हंसी के क्षण लाते हैं। विवेक दास चौधरी निर्देशित फिल्‍म का फर्स्‍ट हाफ तेजी से आगे बढ़ता है और बीच-बीच हल्‍के फुल्‍के कॉमेडी के पल लाता है। हालांकि सेकेंड हाफ में कहानी फिसलती है। उसमें आए ट्विस्‍ट और टर्न रोमांच को बरकरार नहीं रख पाते हैं।

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    अर्चना पूरण सिंह अभिनीत मालिनी का पात्र शुरुआत में दिलचस्‍प लगता है, लेकिन बाद में अनावश्‍यक रुप से खिंचा हुआ लगता है। क्‍लाइमैक्‍स भी अपेक्षा के अनुरुप  दिलचस्‍प नहीं बन पाया है। फिल्‍म का प्रमुख किरदार शहर भी होता है। टोस्‍टर में मायानगरी का अहसास सिर्फ पुलिस ऑफिसर (उपेंद्र लिमाए) के मराठी बोलने से होता है। बाकी फिल्‍म में मुंबई कहीं महसूस नहीं होती। बेहतर होता है कि कहानी को किसी छोटे शहर में स्‍थापित किया जाता।

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    इन सितारों की परफॉर्मेंस है लाजवाब

    कलाकारों में हिट : द फर्स्‍ट केस के बाद राजकुमार राव और सान्‍या मल्‍होत्रा की जोड़ी फिर साथ आई है। कंजूस की भूमिका में राजकुमार राव लुभाते हैं। वह उसके पल-पल बदलते मनोभावों को बहुत सटीकता से व्‍यक्‍त करते हैं। सान्या मल्होत्रा शिल्पा के रूप में अपनी मासूमियत और उत्साह के साथ स्वाभाविक लगती हैं। 

    कमजोर लेखन की वजह से सफेद बालों में मालिनी के उतार-चढ़ाव को अर्चना पूरण सिंह सही से संभाल नहीं पाती हैं।  उपेंद्र लिमाए पटकथा के दायरे में उसे संभालने का प्रयास करते हैं। सीमा पाहवा, अभिषेक बनर्जी मेहमान भूमिका में हैं। फिल्म की निर्माता और अभिनेता राजकुमार राव की पत्नी पत्रलेखा फिल्म के सिर्फ एक दृश्य में आती हैं, लेकिन कहानी में कुछ जोड़ती नहीं हैं। कुल मिलाकर टोस्‍टर अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती।

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