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    खाना मांगने पर बेटी की हत्या, गुजरात हाई कोर्ट ने मां को दी जमानत

    Updated: Thu, 06 Aug 2026 10:50 PM (IST)

    गुजरात हाई कोर्ट ने अपनी दो साल की बेटी को खाना मांगने पर पीट-पीटकर मार डालने के आरोप में एक मां को जमानत दे दी है। ...और पढ़ें

    गुजरात हाई कोर्ट ने खाने के लिए बेटी की हत्या करने वाली मां को दी जमानत

    गुजरात हाई कोर्ट ने खाने के लिए बेटी की हत्या करने वाली मां को दी जमानत

    HighLights

    1. हाई कोर्ट ने बेटी की हत्या की आरोपी मां को जमानत दी।

    2. कोर्ट ने भुखमरी को मानवीय गरिमा और सामाजिक विफलता बताया।

    3. घटना को समाज के लिए नए संकल्प के तौर पर देखा जाए।

    डिजिटल डेस्क, अहमदाबाद। गुजरात हाई कोर्ट ने उस महिला को जमानत दे दी है, जिस पर अपनी दो साल की बेटी को खाना मांगने पर पीट-पीटकर मार डालने का आरोप है।

    कोर्ट ने कहा कि यह दिल दहला देने वाली घटना है। भुखमरी केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है। यह मानवीय गरिमा, न्याय और जमीर का भी मामला है।

    विगत सप्ताह दिए गए अपने आदेश में जस्टिस हसमुख डी. सुथार की कोर्ट ने कहा कि जब भुखमरी किसी मां को ऐसे कदम उठाने पर मजबूर करती है तो यह विफलता किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समाज की होती है।

    भुखमरी को बताया सामाजिक विफलता

    कोर्ट ने कहा कि इस दुखद घटना को इस बात के नए संकल्प के तौर पर देखा जाना चाहिए कि किसी भी मां या बच्चे को भुखमरी का सामना न करना पड़े।

    कोर्ट ने तीन बच्चों की मां लखीबेन सोलंकी की जमानत अर्जी मंजूर कर ली। उसे मार्च 2026 में अपनी बेटी को पीट-पीटकर मार डालने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

    अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपित महिला ने अपनी बेटी ईशा की पिटाई तब की थी, जब वह खाना मांग रही थी और वह इससे चिढ़ गई थी।

    कोर्ट ने कहा कि यह घटना केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय और नैतिकता से जुड़े बुनियादी सवाल खड़े करती है। अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि हमारा मानना है कि सामाजिक न्याय इस सिद्धांत पर आधारित है कि हर इंसान को भोजन, आश्रय, स्वास्थ्य सेवा और गरिमा जैसी बुनियादी सुविधाएं मिलनी चाहिए।

    जब भुखमरी किसी मां को ऐसे कदम उठाने पर मजबूर करती है तो यह विफलता किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समाज की होती है।

    इस संदर्भ में कोर्ट ने पन्नालाल पटेल के गुजराती उपन्यास "मानवीनी भवाई" आदि का भी जिक्र किया जिसमें अत्यधिक भूख और सामाजिक पतन के मनोवैज्ञानिक डर को दर्शाया गया है।

    (समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)

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