रेजांगला युद्ध का वो सच जिससे कांप उठा था चीन! गोलियां खत्म हुईं तो लाठी, पत्थर और जूतों से लड़े भारतीय वीर
रेजांगला युद्ध के बलिदानी हवलदार निहाल सिंह ने 1962 के युद्ध की भयावह कहानी साझा की, जहां भारतीय सैनिकों ने सीमित संसाधनों के बावजूद चीनी सेना का डटकर ...और पढ़ें
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रेजांगला युद्ध के बलिदानी हवलदार निहाल सिंह ने 1962 के युद्ध की भयावह कहानी साझा की। इमेज एआई
HighLights
हवलदार निहाल सिंह रेजांगला युद्ध के जीवित बचे नायक।
भारतीय सैनिकों ने 1300 चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतारा।
गोला-बारूद खत्म होने पर लाठी, पत्थर, जूतों से लड़ी जंग।
जागरण संवाददाता, रेवाड़ी। जब देश में थी दिवाली, वो खेल रहे थे होली, जब हम बैठे थे घरों में, वो झेल रहे थे गोली’ ''ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी’ गीत की यह पंक्तियां आज भी सुनते ही देशप्रेम भावना हर किसी में उमड़ने लगती है। यह गीत रेजांगला पोस्ट पर चीनी सैनिकों के साथ लड़े गए युद्ध पर बना है।
इस युद्ध में भारतीय सेना के 114 जवान बलिदानी हो गए थे। सिर्फ तीन ही जिंदा बचे थे। इन्हीं बचे हुए दस जवानों में से एक हैं गांव चिमनावास के रहने वाले हवलदार निहाल सिंह। अपनी वीरता के लिए सेना मेडल हासिल करने वाले हवलदार निहाल सिंह ने जिंदा बचने के बाद रेजांगला युद्ध की तस्वीर सामने रखी तो सुनकर रोंगटे खड़े हो गए थे।
चीन ने अचानक बोला हमला
13 कुमाऊ रेजीमेंट में चार्ली में मेजर शैतान सिंह कंपनी कमांडर थे। हवलदार निहाल सिंह कंपनी कमांडर के पास ही तैनात थे और उनके पास लाइट मशीन गन थी। निहाल सिंह ने बताते हैं कि अक्टूबर में उनकी बटालियन को पहले लेह में लाया गया और इसके बाद नवंबर में रेजांगला पोस्ट पर भेज दिया गया।
18 नवंबर को चीन की तरफ से हमला बोल दिया गया। मेजर शैतान सिंह की अगुआई में चार्ली कंपनी के जवानों ने चीनी आक्रमण का मुंहतोड़ जवाब दिया।
चार्ली कंपनी के पास बेहद सीमित संसाधन थे और हमला करने वाली चीनी सेना के पास आधुनिक हथियार थे। उनकी संख्या भी तीन हजार के करीब थी। भारतीय सेना के जवानों ने उनका पहला हमला नाकाम कर दिया, लेकिन कुछ समय बाद चीनी सैनिकों ने बमबारी शुरू कर दी।
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चीनी आक्रमण तेज हो चुका था। चार्ली कंपनी के पास मौका था पीछे हटकर अपनी जान बचाने का, लेकिन हम सभी जवानों ने कहा कि वे जान दे देंगे, लेकिन पीछे नहीं हटेंगे।
चीनी सैनिकों को दिया चकमा
निहाल सिंह बताते हैं कि दोनों तरफ से गोलियां चल रही थीं। जवानों ने गोलियां खत्म हो जाने पर चीनी सैनिकों को पत्थरों से मारना शुरू कर दिया। इसी दौरान हवलदार निहाल सिंह के दोनों हाथों में गोली लग चुकी थी। वह लहूलुहान होकर जमीन पर पड़े थे। चीनी सेना के जवानों ने उन्हें बंधक बना लिया और अपने साथ उठाकर पहाड़ से नीचे ले गए।
रात में किसी तरह से चीनी सैनिकों को चकमा देकर वह उनके कब्जे से निकले। सारी रात दुश्मनों से बचते हुए पहाड़ पर चढ़ाई करते रहे। 19 नवंबर को वह अपने बेस कैंप में पहुंचे।
बेस कैंप पहुंचने के बाद मुझे मालूम हुआ कि युद्ध में उनके 114 जवान बलिदानी हो गए, लेकिन उन्होंने चीन के 1300 सैनिकों को मार डाला। चीनी सेना पीछे हट गई थी। बहादुरी के लिए हवलदार निहाल सिंह को बाद में सेना मेडल दिया गया।
गोलियां खत्म होने पर लाठी, पत्थर और जूतों के सहारे चीनी सैनिकों का किया मुकाबला
निहाल सिंह के अनुसार, भारतीय जांबाजों ने 1300 चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था। हमारे महज दस जवान ही जिंदा बच पाए थे। गोला-बारुद खत्म होने पर भारतीय सैनिकों ने लाठियों, पत्थर और जूतों को हथियार बनाया और कई चीनी सैनिकों को मौत की नींद सुला दिया।