हिमाचल: आपदा के बाद कैसा प्रबंधन? सूखे पेड़ लील रहे जिंदगियां पर नहीं फिक्र, इस जिले में हुई सबसे ज्यादा मौतें
हिमाचल प्रदेश में सूखे और खतरनाक पेड़ों के कारण हो रही मौतों पर प्रशासन की लापरवाही उजागर हुई है। कुल्लू जिले में चार अध्यापिकाओं की मौत जैसी घटनाओं क ...और पढ़ें

जिला कुल्लू के आनी में सूखा पेड़ गिरने के कारण हुआ हादसा।
HighLights
कुल्लू में सूखे पेड़ गिरने से चार अध्यापिकाओं की मौत।
वन विभाग ने चिन्हित खतरनाक पेड़ नहीं काटे।
हिमाचल में 2018 से 10 मौतें पेड़ों के गिरने से।
नवनीत शर्मा, धर्मशाला। ‘कितना सक्रिय अधिकारी है, यह है असली अधिकारी…, अधिकारी को ऐसा ही होना चाहिए...।’ ऐसा, उन अधिकारियों के बारे में कहा जाता है जो आपदा आने पर, हादसा होने पर सक्रियता दिखाते हुए रोशनी में आते हैं। मान लीजिए कि आपदा आई है, रास्ता बंद है तो कीचड़ वाले रास्ते पर जूतों समेत या जूतों के बिना उनका चित्र इंटरनेट मीडिया की आकाशगंगा में चमकता है। क्योंकि ऐसे अधिकारी आपदा प्रबंधन या उत्तर आपदा प्रबंधन में विशेष रुचि लेते हुए दिख रहे हैं, इसलिए जनता का आकलन गलत नहीं होता।
क्या यह कम है कि महोदय फील्ड में उतरे हैं। लेकिन जिन अधिकारियों ने पूर्व आपदा प्रबंधन ही ऐसे किया कि दुर्घटना हुई ही नहीं, उनके काम को कौन गाए? उनके पास न इंटरनेट मीडिया का चित्र, न कोई रील… यह तो वही हुआ- राहों की जहमतों का उन्हें क्या सबूत दूं/ मंजिल मिली तो पांवों में छाले नहीं रहे।
आधा जला हुआ सूखा पेड़ बना हादसे का कारण
पाठक को अधिकार है पूछने का कि उपरोक्त भूमिका बांधने का तर्क क्या है। तर्क की खोज में निकलें तो दिखाई देते हैं उन चार अध्यापिकाओं के घर, जो कुल्लू जिले के आनी में स्कूल से घर लौट रही थीं...आधा जला हुआ, सूखा हुआ पेड़ वाहन पर गिरा...वाहन नीचे गिरा और चारों ने दम तोड़ दिया। दो घायल हुईं और चालक भी। यह होने की देर थी कि शोक से आकृष्ट होने की संस्कृति वाले इस परिवेश में तंत्र से लेकर व्यक्ति तक ‘ओह...बहुत बुरा हुआ...च्च्च्चच...हादसा है जी, क्या कर सकते हैं… उन्हें शांति मिले..’ आदि गूंजने लगा।
हादसे के बाद जांच की बात
वन मंडलाधिकारी कहते हैं, ‘ऐसे पेड़ चीन्हे तो गए थे, ये क्यों नहीं कट सके, इसकी जांच की जाएगी।’ तथ्य यह है कि जांच ऐसा शब्द है जिसे ठीक से जांचे जाने की बहुत आवश्यकता है। यह पेड़ न एक दिन में जला होगा, न ऐसा पेड़ एक ही होगा...न यह अदृश्य था कि आते जाते, दराटी चमकाते किसी जंगलाती गार्ड या रेंजर को दिखा नहीं होगा…, सरकार ने तो इसी वर्ष हिमाचल प्रदेश भूमि संरक्षण अधिनियम संशोधित किया है जिसके तहत हर मंडल में चीड़ के 500 सूखे पेड़ों को काटा जा सकता है।
खतरनाक पेड़ों को हटाने के लिए वन मंडलधिकारी को विशेष परिस्थिति में तत्काल निर्णय करने का अधिकार है। सवाल यह है कि यह सब है तो फिर ऐसे वृक्ष संरक्षण का क्या करें जिसमें वे पेड़ भी नहीं कटते जो अंधड़ का इशारा पाते ही सांसों पर गिर सकते हैं?
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पेड़ चिह्नित कर काटना भूला विभाग
फिर पता चला कि कुल्लू में ही 357 खतरनाक पेड़ चीन्हे थे वन विभाग ने। उन्हें काटना भूल गया वन निगम। यह कार्य याद रहे, स्मरण शक्ति बढ़े, इस प्रयोजन के लिए किस मद के अंतर्गत सामूहिक बादाम आवंटन योजना लाई जा सकती है, यह शासक और प्रशासक ही जानें। वर्ष 2018 से लेकर 2025 तक कुल्लू जिले में पेड़ गिरने से 10 मौतें हो चुकी हैं। क्या त्रासदी है कि एक भी मौत सबक में नहीं बदली।
अधिकारी ही क्यों, जिन्हें आपदा की आहट सुनाई और दिखाई देती है, उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं। जिस प्रदेश में इन दिनों कौन सी जाति का उम्मीदवार, किस खेमे का, किस बेल का, इधर का या उधर का की चर्चा स्थानीय निकाय चुनाव के कारण प्रबल है, वहां चार अध्यापिकाओं की मौत कोई विषय है?
सरकारी नौकरी झारखंड या छत्तीसगढ़ के व्यक्ति को न मिल जाए… या यह कर्मचारी अमुक दल का हितैषी है, इसलिए इसे दूर पटका जाए...जैसे अनुत्पादक एवं असांस्कृतिक विमर्श में तल्लीन रहने वाला परिवेश उन पेड़ों को नहीं देख पाता जो उस पर गिर सकते हैं।
जिस राज्य में एहलमी बीट, तारा देवी बीट में कटान चर्चा में रहा हो, जहां होशियार सिंह जैसे वनरक्षक भरी जवानी में पेड़ों के सरोकारों के काम आए हों, वहां यह अति है कि अधजले और सूखे पेड़ किसी को नहीं दिखते। शिमला में तो नगर निगम की ट्री कमेटी ही तय करती है कि किसे कटना है और किसे रहना है। खतरा बने 400 पेड़ों को काटने की अनुमति मिल चुकी है किंतु कोई काटे तब न।
अखिल भारतीय सेवाओं में यह पंक्ति जोड़ देनी चाहिए कि असली प्रशासन पूर्व आपदा प्रबंधन में है, आपदा जब आ गई तब तो प्रबंधन का अर्थ प्रतिक्रिया है, जिसे अमेरिका रिस्पांस कहता है जबकि भारत में उसे सहायता… राहत एवं बचाव अभियान कहा जाता है।
...कुछ पेड़ आयु भी छीनते हैं
विरोधाभास कितना सघन है कि कई जंगलों में अच्छे घास की अपेक्षा में आग लगाने पर प्रशासनिक या सामाजिक स्तर पर कोई प्रतिबंध नहीं, लेकिन जो पेड़ मानव जीवन के लिए खतरा बने हैं, उन्हें काटने से पर्यावरण संरक्षण बाधित होता है। सब अर्जियां ऐसी हूक बन कर सरकारी कार्यालयों में विशेष गंध वाली फाइलों में चुपचाप सुला दी जाती हैं, जहां से लौट कर कोई अनुगूंज नहीं आती। बचपन में सड़कों के किनारे वन विभाग के अमुक मंडल के सौजन्य से पढ़े गए संदेश गलत नहीं थे कि वनों से वायु, वायु से आयु। यह तो उपायुक्त या डीएफओ कार्यालय से बाहर जाकर ही पता चलेगा कि कुछ पेड़ आयु भी छीनते हैं।