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    CJI सूर्यकांत की नसीहत, दूषित भाषा का प्रयोग करने से पहले मां-बहन व बेटी के सम्मान का भी ध्यान रखें; कर्तव्य न भूलें

    By Mukesh Kumar Edited By: Rajesh Sharma
    Updated: Sun, 15 Mar 2026 02:53 PM (IST)

    सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मंडी में कहा कि बोलने के अधिकार के साथ मौलिक कर्तव्यों का भी ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने अभद्र भाषा के प् ...और पढ़ें

    HighLights

    1. CJI सूर्यकांत ने मौलिक कर्तव्यों पर ध्यान देने को कहा।

    2. अभद्र भाषा से बचें, दूसरों के सम्मान का ध्यान रखें।

    3. न्यायिक परिसर अस्पताल की तरह न्याय और राहत दें।

    जागरण संवाददाता, मंडी। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मंडी में न्यायिक परिसर के शिलान्यास के बाद संगोष्ठी में कहा कि हम बोलने के अधिकार के नाम पर अपने मौलिक कर्तव्य को भूल जाते हैं। हमें अपने अधिकार के साथ दूसरों के मान सम्मान और कर्तव्य का भी ध्यान रखना होगा। मंडी में मौलिक कर्तव्य पर आयोजित गोष्ठी व विधिक साक्षरता शिविर में न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने मौलिक कर्तव्यों का पाठ पढ़ाया।

    न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि मैं हिमाचल प्रदेश लीगल सर्विस अथॉरिटी को बधाई देता हूं, जिन्होंने मौलिक कर्तव्य पर यह कार्यक्रम रखा। क्योंकि मौलिक कर्तव्यों को लागू करने के लिए बहुत व्यवस्था नहीं है।

    मौलिक कर्तव्य का भी रखें ध्यान

    मैंने किसी को प्रश्न किया कि आप अभद्र भाषा में टीवी, पोडकास्ट, कोई भी चैनल में कोई भी कार्यक्रम देखते हैं और अपने मां-बेटी और बहन के मान सम्मान का भी ध्यान नहीं रखते, और फिर कोई प्रश्न करे तो आप कहते हैं कि आपका मौलिक अधिकार है। बोलने का अधिकार है। यह विडंबना है कि बोलने के अधिकार के नाम पर हम यह ध्यान नहीं रख रहे कि हमारा मौलिक कर्तव्य भी है। 

    कुछ लोग करते हैं दूसरों के अधिकारों का हनन

    सीजेआई ने कहा कि मौलिक अधिकारों के लिए देश ने लड़ाई लड़ी है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर संविधान बनने तक। अंग्रेजों को भेजना ही मकसद नहीं था। भारत के लोगों को न्याय मिले। कई लोग अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा के नाम पर दूसरे के अधिकारों का हनन करते हैं। इसलिए कर्तव्य की बात आई। आज कर्तव्य हमारे संविधान का हिस्सा है। इसलिए हमारे जिम्मेदारी है उसकी पालना करें।

    मौलिक कर्तव्य के बारे में जागृत करना जरूरी

    हिमाचल में यह कार्यक्रम होना इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि प्रदेश प्रकृति के सबसे नजदीक है। इस प्रदेश में लोगों, शासन और न्यायिक व्यवस्था को मौलिक कर्तव्य के बारे में जागृत नहीं किया तो यह प्रदेश अपने सौंदर्य का नुकसान न कर दे। यह बेहतर कार्य किया है। इसमें पैरालीगल वालंटियर ग्रामीण स्तर तक लोगों को जागरूक कर सकते हैं। आज की इस संगोष्ठी के बाद मैं उम्मीद करूंगा कि जिला स्तर, उपमंडल स्तर पर भी ऐसे कार्यक्रम हों, इससे हिमाचल प्रदेश पूरे देश के लिए एक मिसाल बनेगा और जागृति का माहौल पूरे देश में आएगा।

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    न्यायिक परिसर बने मानवता की मिसाल

    न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने न्यायिक व्यवस्था को न्यायिक उपचार का पाठ भी पढ़ाया। उन्होंने कहा कि मैंने 14 नवंबर को रांची में कहा था कि न्यायिक व्यवस्था को अस्पताल की तरह काम करना चाहिए। न्यायिक परिसर ईंट, मिट्टी और सरिये से बनने वाला भवन न बनकर रह जाए, बल्कि मानवता की मिसाल बने। जिस तरह से एक अस्पताल में जब कोई मरीज जाता है तो एक छोटे कर्मचारी से लेकर बड़ा डाक्टर तक उसको उपचार देकर राहत देने में लग जाता है। उसी तरह न्यायिक परिसर में आने वाला हर व्यक्ति भी न्याय और राहत की उम्मीद होती है तो अस्पताल की तरह ही हमारी व्यवस्था को भी उसका सहयोग करना चाहिए, ताकि उसे राहत मिल सके। जैसे-जैसे सुविधाएं बढ़ेंगी वैसे-वैसे न्याय व्यवस्था और मजबूत होगी।

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