'सार्वजनिक रास्ते पर रुकावट पैदा करना सामाजिक अपराध', मंडी कोर्ट ने तीखी टिप्पणी के साथ खारिज की याचिका
मंडी जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने सार्वजनिक रास्ते पर अवरोध उत्पन्न करने को सार्वजनिक उपद्रव करार दिया है। अदालत ने एसडीएम सदर के आदेश को बरकरार रखते हु ...और पढ़ें

मंडी कोर्ट ने सार्वजनिक रास्ते पर कब्जे को लेकर सख्त टिप्पणी की है। प्रतीकात्मक फोटो
HighLights
सार्वजनिक रास्ते पर अवरोध उत्पन्न करना सार्वजनिक उपद्रव।
मंडी कोर्ट ने एसडीएम सदर के आदेश को बरकरार रखा।
पुलिस को तत्काल रास्ता बहाल करने का निर्देश दिया।
जागरण संवाददाता, मंडी। सार्वजनिक रास्ते पर किसी भी प्रकार का अवरोध उत्पन्न करना एक सार्वजनिक उपद्रव है, जिसे कानूनन स्वीकार नहीं किया जा सकता। जिला एवं सत्र न्यायाधीश मंडी की अदालत ने उपमंडल दंडाधिकारी (एसडीएम) सदर के आदेश को चुनौती देने वाली एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण व्यवस्था दी।
अदालत ने माना कि ग्रामीणों की सुविधा के लिए बने मार्ग को रोकना पूरी तरह गैर-कानूनी है। यह विवाद सदर तहसील के तहत चौहट्टा (मेहर) गांव का है।
भाई ने दी थी शिकायत
शिकायतकर्ता कृष्ण चंद ने आरोप लगाया था कि उनके सगे भाई राजेंद्र कुमार और उनकी पत्नी निर्मला देवी ने साल 2017 में मनरेगा और ग्रामीणों के सहयोग से बने चार पहिया वाहनों के मुख्य मार्ग को गड्ढा खोदकर और पत्थर रखकर अवरुद्ध कर दिया था। इस कारण ग्रामीण, बीमार लोगों और स्कूल जाने वाले बच्चों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा था।
एसडीएम कोर्ट के निर्देश को दी सत्र न्यायालय में चुनौती
इससे पहले, एसडीएम सदर ने मामले की गंभीरता को देखते हुए थाना प्रभारी (एसएचओ) पद्धर को निर्देश दिए थे कि वह 15 दिनों के भीतर सड़क से अतिक्रमण हटाकर उसे ग्रामीणों के लिए दोबारा सुगम बनाएं। राजेंद्र कुमार ने इस आदेश को सत्र न्यायालय में चुनौती दी थी।
मां ने सड़क के लिए दान की थी भूमि
याचिकाकर्ता का तर्क था कि जिस खसरा नंबर 513 का नोटिस उन्हें दिया गया, वहां कोई सड़क नहीं है और वह उनकी निजी भूमि है। सत्र न्यायाधीश ने राजस्व विभाग (तहसीलदार) की रिपोर्ट और गवाहों के बयानों का गहन अध्ययन करने के बाद पाया कि सड़क खसरा नंबर 840/511 पर बनी है, जिसे भाइयों की माता जानकी देवी ने स्वेच्छा से सड़क निर्माण के लिए दान किया था।
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संयुक्त भूमि पर नहीं जता सकते विशेष हक
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि चूंकि उक्त भूमि संयुक्त है, इसलिए कोई भी एक हिस्सेदार इस पर अपना विशेष मालिकाना हक नहीं जता सकता। केवल नोटिस में खसरा नंबर की मामूली तकनीकी त्रुटि होने से सार्वजनिक असुविधा और अतिक्रमण का मुख्य सच नहीं बदल जाता। अदालत ने याचिका को योग्यताहीन पाते हुए खारिज कर दिया और पुलिस को तुरंत प्रभाव से रास्ता बहाल करने के आदेश को बरकरार रखा।