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    फोरलेन प्रभावित का मुआवजा रहेगा बरकरार, मंडी जिला कोर्ट ने NHAI की याचिका खारिज की

    By Hansraj Saini Edited By: Rajesh Sharma
    Updated: Thu, 30 Jul 2026 04:09 PM (IST)

    मंडी जिला अदालत ने कीरतपुर-मनाली फोरलेन परियोजना से जुड़े एक मामले में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) की याचिका खारिज कर दी है। ...और पढ़ें

    मंडी कोर्ट ने फोरलेन प्रभावित के पक्ष में फैसला दिया है। प्रतीकात्मक फोटो

    मंडी कोर्ट ने फोरलेन प्रभावित के पक्ष में फैसला दिया है। प्रतीकात्मक फोटो

    HighLights

    1. मंडी कोर्ट ने NHAI की याचिका खारिज की।

    2. फोरलेन प्रभावित भू-मालिक का मुआवजा बरकरार रहेगा।

    3. आर्बिट्रेटर द्वारा बढ़ाया गया मुआवजा मान्य हुआ।

    जागरण संवाददाता, मंडी। कीरतपुर-मनाली फोरलेन परियोजना से जुड़े एक मामले में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआइ) को जिला अदालत से बड़ा झटका लगा है। जिला न्यायाधीश मंडी की अदालत ने आर्बिट्रेटर (मंडलायुक्त) द्वारा प्रभावित परिवार के बढ़ाए गए मुआवजे को चुनौती देने वाली एनएचएआइ की याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत के इस फैसले से प्रभावित भू-मालिक का बढ़ा हुआ मुआवजा बरकरार रहेगा। 

    शुरुआत में 38 लाख मुआवजा तय किया

    मंडी जिले की औट तहसील के तहत टकोली निवासी बंसी लाल की भूमि और मकान (संरचना संख्या 102) का फोरलेन निर्माण के लिए अधिग्रहण किया गया था। शुरुआत में सक्षम प्राधिकारी ने चार दिसंबर 2019 को मकान का मुआवजा 38,81,000 रुपये तय किया था। इस राशि को अपर्याप्त मानते हुए भू-मालिक ने आर्बिट्रेटर-कम-मंडलायुक्त, मंडी के समक्ष अपील की। 

    आर्बिट्रेटर ने बढ़ाया मुआवजा

    आर्बिट्रेटर ने सात अगस्त 2023 को अपना फैसला सुनाते हुए मकान का मुआवजा बढ़ाकर 40,04,312 रुपये कर दिया और साथ ही 9 से 15 प्रतिशत की दर से ब्याज देने का भी आदेश पारित किया। 

    एनएचएआई का कोर्ट में तर्क

    इस फैसले के खिलाफ एनएचएआइ ने मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत जिला अदालत का दरवाजा खटखटाया। एनएचएआइ का तर्क था कि आर्बिट्रेटर ने बिना पर्याप्त साक्ष्यों के मनमाने ढंग से प्लिंथ एरिया रेट की गणना की है और नए भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के तहत गलत तरीके से ब्याज तय किया है। 

    भू मालिक की दलील

    वहीं, भू-मालिक की ओर से दलील दी गई कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों के अनुसार भवन के मूल्य में कोई भी कटौती नहीं की जानी चाहिए और उन्हें इससे भी अधिक मुआवजा मिलना चाहिए था। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकार्ड का बारीकी से अध्ययन करने के बाद अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न दिशा-निर्देशों का हवाला दिया। 

    जिला न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि धारा 34 के तहत अदालत के पास आर्बिट्रेटर के अवार्ड (फैसले) के गुण-दोष की समीक्षा करने या उसे संशोधित करने के अधिकार बेहद सीमित हैं। अदालत केवल तभी हस्तक्षेप कर सकती है जब फैसले में कोई स्पष्ट खामी या गैर-कानूनी बात हो। चूंकि मुआवजा सार्वजनिक हित में तय किया गया है और यह लोक नीति के खिलाफ नहीं है, इसलिए अदालत ने एनएचएआइ की अपील को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया।

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