'आजादी से पहले वंदे मातरम् था राष्ट्रीय गान', हिमाचल के राज्यपाल बोले- किस स्तर पर साजिश के तहत बदला; चिंतन जरूरी
हिमाचल के राज्यपाल कविन्द्र गुप्ता ने कहा कि आजादी से पहले वंदे मातरम् ही राष्ट्रीय गान था और इसे किस साजिश के तहत बदला गया, इस पर चिंतन की जरूरत है। ...और पढ़ें

शिमला में प्रदर्शनी का अवलोकन करते हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल कविन्द्र गुप्ता व अन्य।
HighLights
राज्यपाल ने कहा, वंदे मातरम् आजादी से पहले राष्ट्रीय गान था।
शिमला में वंदे मातरम् और सरदार पटेल पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी।
130 साल पुराने ग्रामोफोन पर बजाया गया वंदे मातरम्।
जागरण संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल कविन्द्र गुप्ता ने कहा, आजादी से पहले वंदे मातरम् ही राष्ट्रीय गान था। किस स्तर पर साजिश के तहत इसे बदला गया, इस पर चिंतन की जरूरत है। इतिहास से छेड़छाड़ नहीं होती तो अन्य गीतों की तरह उन्हें भी यह पूरा याद होता। यह बात उन्होंने वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने और सरदार पटेल की जयंती पर भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (एडवांस्ड स्टडी) शिमला में शुक्रवार को आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आरंभ करते हुए कही।
इस दौरान उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन का वीडियो संदेश दिखाया गया। उपराष्ट्रपति ने शिमला आना था, लेकिन मौसम प्रतिकूल होने से वीरवार को दौरा रद हो गया।
वंदे मातरम् आजादी के आंदोलन की सबसे बड़ी प्रेरणा
राज्यपाल ने कहा कि संगोष्ठी सरदार पटेल की संवैधानिक दृष्टि, प्रशासनिक दर्शन, सहकारी संघवाद की अवधारणा तथा समकालीन राष्ट्रीय एवं वैश्विक चुनौतियों के संदर्भ में उनकी प्रासंगिकता का विश्लेषण करने का प्रयास करेगी। संगोष्ठी में देशभर से इतिहासकार, शोधकर्ता और शिक्षाविद भाग ले रहे हैं। वंदे मातरम् केवल गीत नहीं, देश की आजादी के आंदोलन की सबसे बड़ी प्रेरणा रहा है। इसके सही इतिहास को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता है।
सरदार पटेल व वंदे मातरम् पर शोध हों
वंदे मातरम् और सरदार पटेल की विरासत पर शोध होने चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां तथ्यों से परिचित हो सकें। इतिहास को सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करना समय की आवश्यकता है और इस विषय पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।
काव्य संग्रह का विमोचन
उन्होंने वंदे मातरम् पर आधारित काफी टेबल बुक, दर्शन आफ राधाकृष्णन : इटरनल एंड टेंपोरल’ विषयक संगोष्ठी कार्यवाही और डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन पर आधारित बहुभाषी काव्य संग्रह का विमोचन किया। साथ ही ‘वंदे मातरम् : एक यात्रा’ प्रदर्शनी का अवलोकन किया।
प्रदर्शनी की परिकल्पना एवं क्यूरेशन शोधकर्ता एवं लेखक अखिलेश झा ने की है, जबकि रश्मिता झा ने सह क्यूरेटर व श्रेयसी झा ने शोधकर्ता के रूप में योगदान दिया है।
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प्रदर्शनी में वंदे मातरम्, स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्र निर्माण से जुड़े दुर्लभ ग्रामोफोन रिकार्ड, अभिलेखीय दस्तावेज और ऐतिहासिक सामग्री प्रदर्शित की है। निदेशक प्रो. हिमांशु कुमार चतुर्वेदी ने बताया कि संगोष्ठी में वंदे मातरम्, स्वतंत्रता आंदोलन और सरदार पटेल की राष्ट्र एकीकरण की अवधारणा पर विभिन्न अकादमिक सत्र आयोजित होंगे।
130 साल पुराने ग्रामोफोन में बजाया वंदे मातरम्
एडवांस्ड स्टडी में वंदे मातरम् 130 साल पुराने ग्रामोफोन में बजाया गया। इसे अखिलेष झा व उनकी पत्नी रश्मिता ने संभाल कर रखा है। इनके पास इसके पुराने रिकार्ड भी हैं, जिनके मुताबिक वंदे मातरम् भारत का राष्ट्रीय गान था। आजादी के पहले तक के रिकार्ड इन्होंने प्रदर्शनी में दिखाए। सेंटर फार ग्रामोफोन एंड एलाइड स्टडीज के संस्थापक अखिलेश झा ने दावा किया कि दुर्लभ ग्रामोफोन रिकार्ड और अभिलेखीय दस्तावेज इस बात के प्रमाण हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वंदे मातरम् को देशवासियों ने राष्ट्रीय गान के रूप में स्वीकार किया था।
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