हिमाचल की जेलों में अब पुस्तकें कम करेंगी कैदियों की सजा, पुलिस के कारागार विभाग ने खरीदीं 435 किताबें
हिमाचल प्रदेश की जेलों में 'अक्षर से आत्मबोध' कार्यक्रम शुरू हुआ है, जिसके तहत कैदी प्रेरक पुस्तकें पढ़कर और उनकी समीक्षा लिखकर अपनी सजा कम करवा सकते ...और पढ़ें

हिमाचल प्रदेश की जेलों में पुस्तकें कैदियों की सजा कम करवाएंगी। प्रतीकात्मक फोटो
HighLights
'अक्षर से आत्मबोध' कार्यक्रम से कैदियों को मिलेगी सजा में छूट।
प्रेरक पुस्तकें पढ़कर समीक्षा लिखने पर होगा सकारात्मक बदलाव।
यह पहल कैदियों के पुनर्वास और व्यक्तित्व विकास में सहायक।
चैतन्य ठाकुर, शिमला। हिमाचल प्रदेश की जेलों में अब कैदियों के सुधार की नई इबारत लिखी जाएगी। प्रदेश सरकार ने जेलों को केवल सजा काटने की जगह नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण और आत्मचिंतन का केंद्र बनाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। कारागार एवं सुधार सेवा विभाग ने 'अक्षर से आत्मबोध' (रेमिशन बाय रीडिंग) कार्यक्रम आरंभ किया है। इसके तहत बंदी अच्छी और प्रेरक पुस्तकें पढ़ेंगे, इनकी समीक्षा करेंगे। यदि उनके व्यवहार में सकारात्मक बदलाव दिखाई देगा तो जेल मेनुअल के रेमिशन नियमों के तहत सजा में कानूनी छूट भी मिल सकेगी।
योजना के तहत बंदियों को उनकी रुचि और आवश्यकता के अनुसार नैतिक मूल्यों, भारतीय कानून, संविधान, महापुरुषों की जीवनियां, आध्यात्मिक साहित्य और व्यक्तित्व विकास से जुड़ी पुस्तकें उपलब्ध करवाई जाएंगी। प्रत्येक पुस्तक पढ़ने के बाद बंदी को निर्धारित प्रारूप में उसका सारांश या समीक्षा लिखकर जमा करनी होगी।
समीक्षा का मूल्यांकन जेल अधिकारियों और शिक्षाविदों की समिति करेगी। यदि समिति समीक्षा और बंदी के आचरण से संतुष्ट होती है तो उसे रेमिशन के लिए पात्र माना जाएगा।
435 पुस्तकें खरीदी
कारागार विभाग ने इस पहल को लागू करने के लिए नेशनल बुक ट्रस्ट से शुरुआती चरण में 435 पुस्तकें खरीदी हैं। इनमें प्रेरणादायक साहित्य, कानूनी अधिकारों से संबंधित पुस्तकें, आध्यात्मिक ग्रंथ और रोजगारपरक कौशल विकसित करने वाली पुस्तकें शामिल हैं। केंद्रीय कारागार कंडा (शिमला) व जिला जेल सोलन में इस व्यवस्था के सकारात्मक परिणाम मिलने के बाद अब इसे प्रदेश की सभी केंद्रीय जेलों और उप जेलों में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा।
पढ़ने की आदत डालने का यह भी उद्देश्य
विभाग का मानना है कि जेल में लंबे समय तक रहने के दौरान कई बंदी अवसाद, अकेलेपन और नकारात्मक सोच से घिर जाते हैं। ऐसे में पढ़ने की आदत न केवल उनके मानसिक तनाव को कम करेगी, बल्कि उनमें आत्मविश्वास, संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना भी विकसित करेगी। इससे रिहाई के बाद उनके दोबारा अपराध की ओर लौटने की संभावना कम होगी।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य जेलों में सुधारात्मक वातावरण तैयार करना है ताकि बंदी सजा पूरी करने के बाद समाज की मुख्यधारा में सम्मानपूर्वक जीवन शुरू कर सकें। प्रदेश की जेलों में इसे लागू किया जा रहा है।
-अभिषेक त्रिवेदी, महानिदेशक, हिमाचल प्रदेश कारागार एवं सुधार सेवा विभाग।
यह भी पढ़ें: अस्पताल पहुंचे मरीज का उसी दिन होगा MRI और सीटी स्कैन, CM सुक्खू ने चमियाणा में 3-टेस्ला मशीन का शुभारंभ किया