PF-ESI जमा नहीं, फिर भी जारी रहा भुगतान! बोकारो में 700 से अधिक आउटसोर्सिंग कर्मियों का मामला गरमाया
बोकारो में स्वास्थ्य विभाग और राइडर एजेंसी के बीच आउटसोर्सिंग कर्मियों के पीएफ-ईएसआई जमा न करने को लेकर विवाद गहरा गया है। ...और पढ़ें

बोकारो सदर अस्पताल। (फाइल फोटो)
HighLights
राइडर एजेंसी ने 700 से अधिक कर्मियों का पीएफ-ईएसआई नहीं जमा किया।
स्वास्थ्य विभाग ने बिना सत्यापन एजेंसी को करोड़ों का भुगतान किया।
700+ कर्मियों के PF-ESI पर सवाल, अधिकारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में।
जागरण संवाददाता, बोकारो। झारखंड के बोकारो जिले में जिले में वर्ष 2018 से दिसंबर 2025 तक स्वास्थ्य विभाग समेत कई सरकारी विभागों में आउटसोर्सिंग के जरिए मैनपावर उपलब्ध कराने वाली राइडर नामक एजेंसी व स्वास्थ्य विभाग के बीच विवाद चल रहा है।
आरोप है कि एजेंसी ने करीब सात सौ से अधिक आउटसोर्सिंग कर्मियों का भविष्य निधि (पीएफ) और कर्मचारी राज्य बीमा (ईएसआई) की राशि नियमित रूप से जमा नहीं की, जबकि विभागीय स्तर पर उसके बिलों का भुगतान लगातार होता रहा।
सूत्रों के अनुसार विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से बिना आवश्यक सत्यापन के भुगतान किए जाते रहे। मामला तब उजागर हुआ जब तत्कालीन उपायुक्त विजया जाधव ने अनियमितताओं पर संज्ञान लेते हुए एजेंसी के कार्य का री-टेंडर कराने का निर्णय लिया।
इसके बावजूद एजेंसी की ओर से राज्य स्तर तक पैरवी होती रही। अंततः दिसंबर 2025 से यह कार्य कमांडों व जी-अलर्ट नामक नई एजेंसी को सौंप दिया गया। हालांकि श्रम विभाग द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतनमान भी नहीं दिया जा रहा है।
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सात करोड़ के बकाये पर विवाद, कार्रवाई पर सवाल
राइडर एजेंसी का दावा है कि स्वास्थ्य विभाग पर उसका करीब सात करोड़ रुपये बकाया है, जबकि विभाग अब एजेंसी से पीएफ और ईएसआई जमा करने का प्रमाण मांग रहा है। मामला फिलहाल न्यायालय में लंबित है।
सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि एजेंसी ने वर्षों तक कर्मचारियों का सामाजिक सुरक्षा अंशदान जमा नहीं किया तो उसके विरुद्ध अब तक कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की गई। सामान्य नियमों के अनुसार आउटसोर्सिंग एजेंसी पहले अपने संसाधनों से कम से कम दो माह का वेतन, पीएफ और ईएसआई का भुगतान करती है और उसके बाद सत्यापन के उपरांत विभाग भुगतान करता है।
इसके बावजूद करोड़ों रुपये का भुगतान होना विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। श्रम विभाग की निष्क्रियता भी चर्चा का विषय बनी हुई है, क्योंकि कर्मचारियों के हितों की निगरानी के बावजूद अब तक किसी व्यापक जांच की जानकारी सामने नहीं आई है।
नई एजेंसी पर भी पुराने हालात के आरोप
जिले में वर्तमान में करीब आधा दर्जन आउटसोर्सिंग एजेंसियां विभिन्न विभागों में कार्य कर रही हैं। इनमें एवर ग्रीन सहित कुछ एजेंसियां समय पर वेतन भुगतान कर रही हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग और ग्रामीण विकास विभाग में कार्यरत कई आउटसोर्सिंग कर्मियों को छह-छह माह तक वेतन नहीं मिलने की शिकायत है।
कर्मचारियों का कहना है कि नई एजेंसी के आने के बाद भी पारदर्शिता की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। अब तक स्वास्थ्य विभाग के सभी आउटसोर्सिंग कर्मियों को पीएफ नंबर उपलब्ध नहीं कराए जा सके हैं। विभाग ने यह भी सार्वजनिक नहीं किया है कि विभिन्न पदों के लिए एजेंसियों को किस आधार पर कितना भुगतान किया जा रहा है।
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बेरोजगारी और नौकरी जाने के डर से अधिकांश कर्मचारी खुलकर शिकायत भी नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि यदि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो आउटसोर्सिंग व्यवस्था में कर्मचारियों के वेतन और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े सवाल लगातार बने रहेंगे।